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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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बोझ बनते रिश्ते और सूखती संवेदनाएं….

Posted On 10 Aug, 2017 Social Issues में

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बोझ बनते रिश्ते और सूखती संवेदनाएं….

अभी हाल ही की बात है नाम “आशा साहनी” उम्र 80 साल, एक करोड़पति महिला की इतनी दर्दनाक मौत जो रूह को कंपा दे l कारण भी ऐसा जिसके सुनते ही दिल काँप जाये और एकबारगी ये सोचने पे मजबूर करे कि क्या ये दिन देखने के लिए लोग औलाद के लिए दर-दर भटकते है, औलाद न होने पर मन्नते मुरादे मांगते है l धिक्कार है ऐसी संतानों पर, ऐसी औलाद होने से बेऔलाद रहना अच्छा l बड़े ही शर्म की बात है कि इस तरह के लोग कई-कई नौकर रख लेते हैं, कुत्ते भी पाल लेते हैं। लेकिन, माँ बाप को बोझ समझते हैं l ये कैसा बेटा है शर्म आ रही है ऐसे बच्चों पर, सच में हम अपनी सभ्यता को भूल चुके हैं, आखिर कहाँ है हम ? और कहाँ जा रहा है हमारा समाज। पैसा कमाने की अंधी दौड़ या फिर बूढ़े माँ बाप को बोझ समझ कर उन्हें अकेला छोड़ देने वाले लोग विचार अवश्य करें, कि वो भी उस अवस्था में जायेंगे। उस माँ पर क्या गुज़री होगी, कैसे तड़फ-तड़फ कर दिन काटे होंगे उस बूढ़ी और शरीर से लाचार हो चुकी बेबस माँ ने l चित्र में कंकाल उस माँ का है जो अपने पत्थर बने बेटे की लौट आने की आस लिए पल-पल मौत की ओर बढ़ती और तड़पती हुई कंकाल बन गयी पर बेटे ने उसकी सुध ना ली l जिस माँ ने खुद गीले में सोकर अपने बच्चे को सूखे में सुलाया और रात-रात भर जागकर उसे पाला उंगली पकड़कर उसे चलना सिखाया वही उसे तब छोड़ कर चला जाता है जब वो बिल्कुल असहाय निराश्रित और कमज़ोर होती है । सोचो अगर उस माँ ने भी अपने असहाय शिशु को अपनी किसी महत्वकांक्षा के चलते ऐसे ही मरने के लिए छोड़ दिया होता तो क्या वो आज इस दुनिया में होता ?
खैर आपको अवगत कराते हैं उस व्यथा से जिससे मैं व्यथित होकर इतना कडुआ मैं लिख रही हूँ l……
80 साल की आशा साहनी मुंबई के पॉश इलाके में 10 वी मंजिल पर एक अपार्टमेंट में अकेले रहती थी। उनके पति की मौत चार साल पहले हो गयी। अकेले क्यों रहती थी? क्योंकि उनका अकेला बेटा अमेरिका में डॉलर कमाता था। बिजी था। उसके लिए आशा साहनी डेथ लाइन में खड़ी एक बोझ ही थी। उसकी लाइफ फारमेट में आशा साहनी फिट नहीं बैठती थी।
बेटे ने अंतिम बार 23 अप्रैल 2016 को अपनी मां को अमेरिका से फोन किया था। तब फोन पर बात करते हुए मां ने कहा था कि बेटा “अब अकेले घर में नहीं रह पाती हूं। अमेरिका बुला लो। अगर वहां नहीं ले जा सकते हो तो ओल्ड एज होम ही भेज दो l अब अकेले रहना बहुत मुश्किल है ।
बेटे ने कहा- बहुत जल्द आ रहा हूँ ।
23 अप्रैल 2016 के बाद मां को बेटे ने फोन करने की आवश्यकता नही समझी क्यूंकि 2017 की अगस्त में उसको अमेरिका से आना l किसी टूर टाइम प्रोग्राम के चलते वो 6 अगस्त को मुंबई आया था। बेटे ने अपना फर्ज निभाते हुए,आशा साहनी पर उपकार करते हुए उनसे मिलने का वक्त निकालने का प्रोग्राम बनाया। उनसे मिलने अंधेरी के अपार्टमेंट गया । बेल बजायी। कोई रिस्पांस नहीं। लगा, बूढी मां सो गयी होगी। एक घंटे तक जब कोई मूवमेंट नहीं हुई तो उसने लोगों को बुलाया। पता चलने पर पुलिस भी आ गयी। गेट खुला तो सभी हैरान रह गये । आशा साहनी की जगह बेड के नीचे उसकी कंकाल पड़ी थी। शरीर तो गल ही चुका था, कंकाल भी पुराना हो चला था। जांच में यह बात सामने आ रही है कि आशा साहनी की मौत कम से कम 8-10 महीने पहले हो गयी होगी। यह अंदाजा लगा कि खुद को घसीटते हुए गेट खोलने की कोशिश की होगी लेकिन, बूढ़ा शरीर ऐसा नहीं कर सका। लाश की दुर्गंध इसलिए नहीं फैली क्योंकि दसवें तल्ले पर उनके अपने दो फ्लैट थे । बड़े और पूर्णतः बंद फ्लैट से बाहर गंध नहीं आ सकी।
शर्म से डूब मरने वाली बात है कि बेटे ने अंतिम बार अप्रैल 2016 मे बात होने की बात ऐसे कहीं मानो वह अपनी मां से कितना रेगुलर टच में था। जाहिर है आशा साहनी ने अपने अपार्टमेंट में या दूसरे रिश्तेदार से संपर्क इसलिए काट दिया होगा कि जब उसके बेटे के लिए ही वह बोझ थी तो बाकी क्यों उनकी परवाह करेंगे। आखिर वह परमात्मा में विलीन हो  गईं। उन्हें अंतिम यात्रा भी नसीब नहीं हुई। अन्दर से इतनी दुखी मानो बेटे से ये कह रही हो “जाओ खुश रहो बेटा तुम्हे मुझे कांधे पर भी नही उठाना पड़ेगा शायद तुम मेरा बोझ उठाते तो थक जाते l
कुल मिला कर डॉलर कमाते बेटे को अपनी मां से बस इतना सा लगाव था कि उसके मरने के बाद अंधेरी/ओशिवारा का महंगा अपार्टमेंट उसे मिले। जाहिर है इसके लिए बीच-बीच में मतलब कुछ महीनों पर आशा साहनी की खैरियत ले लेना भी उसकी मजबूरी थी। अंदर की इच्छा नहीं। हाँ, कुछ डॉलर को रुपये में चेंज कराकर जरूर बीच-बीच में भेज दिया करता था वो बेटा। बेटे ने माँ को अरसे से फोन नहीं किया और अपने बच्चों के साथ खुश रहा यूएस में। ये देखकर लगता है कि आज के युग में व्यक्ति को जो मिला उससे संतुष्टि नहीँ, जो नहीं मिला, उसे पाने की लालसा में जीवन से अपनी अमूल्य निधि जो माता –पिता के रूप में मिली है उसी से हाँथ धो बैठता है l “कुछ घरों में मैंने ये भी देखा है कि सास ससुर की सेवा बहुएं नहीं करतीं लेकिन, बेटा करता है क्योंकि उसके माँ बाप हैं। तो स्थिति को थोडा बदल कर देखिये कि आपके माँ बाप का अगर आपकी भाभी नहीं करेगी तब कैसा महसूस होगा l लेकिन, यहाँ तो इस घटना का जिम्मेदार स्वयं बेटा ही है l”
देखा जाये तो दिल्ली-मुम्बई में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिनके पास कई बँगले और फ्लैट्स हैं  बच्चे विदेश में हैं और माँ-बाप यहाँ उनके लिए जायदाद की रखवाली कर रहे.
हमें आवश्यकता है इस घटना से शिक्षा लेने की कि यदि हम अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर विदेश भेजने का सपना देखते रहेंगे तो हर फ्लैट में प्रतिदिन कोई न कोई आशा साहनी की तरह मिलेगा।
पाश्चात्य सभ्यता की और भागते रहें अपनों को छोड़कर तो आगे-आगे और भी बहुत कुछ देखने को मिलेगा। बुढ़ापा सबके ऊपर आता है, परेशानी सबको होती है, कष्ट भी सबको होते हैं किसी को कुछ कम और किसी को कुछ ज्यादा। बुढ़ापे में असमर्थता की चिड़चिड़ाहट हो सकती है जिससे शब्दों की सीमा ही पार हो जाय l  परंतु याद रखिये बुढ़ापे में वो खीझ असमर्थता ने उत्पन्न की है वरना ये वही माँ बाप हैं जिन्होंने जन्म दिया है और अनगिनत कष्ट सहे हैं तुम्हे पालने के लिए.
आखिर हम सब ये किस राह पर निकल पड़े हैं? जहाँ सिर्फ डॉलर ही कमाये जा सकते हैं रिश्ते नहीं, पैसों की अंधी दौड़ में हमने रिश्तों को कब का जमींदोज कर दिया है…बचा सको तो अब भी बचा लो ऐसे ही पल-पल मौत के मुँह में जाने वाले किसी अपने को…नहीं तो ये वक़्त ये दुनिया और खुद का मन भी आहत होगा खुद अपने आप पर ही और फिर कभी चैन-ओ-सुकूं से जी ना पाओगे माता-पिता से किये इस धोखे के बोझ को लेकर.
देखा जाए तो यह सामाजिक क्षरण की ऐसी घटना है जिसने समाज शास्त्रियों को भी सोचने को विवश कर दिया है l  देश के अपराध आंकड़े बताते हैं कि देश में बड़ी संख्या में वृद्धजन खासकर बड़े शहरों में असुरक्षित जीवन गुजारते हैं वरिष्ठ नागरिकों की सबसे बड़ी तकलीफ इनसे किसी की बात नहीं होना है जीवन के अंतिम काल में बोलने को भी तरसने वाले इन बुजुर्गों की तकलीफ को कोई समझना ही नहीं चाहता क्योंकि सब अपने आप में व्यस्त हैं. अपने बुजुर्ग माँ-बाप को वृद्धाश्रम में भेजना प्राण को देह से अलग करने के समान है ऐसा विचार तभी आ सकता है जब हम स्वभाव से सरल और तरल हो l शुष्कता असंवेदनशीलता की निशानी है, जबकि संवेदनशील होना तरलता की l  सात्विक गुणों के समावेश के लिए पारिवारिक संस्कारों का होना अति आवश्यक है इसलिए हमें समाज में तेज़ी से हो रहे नैतिक मूल्यों के हनन को रोकना होगा.

सुनीता दोहरे
प्रबंध सम्पादक

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