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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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ये प्याला जिसने पिया, वही अमर हो गया

Posted On: 3 Aug, 2017 social issues में

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सभी महान धर्म मनुष्य के अमरत्व को उसके कर्मों से जोड़ते हैं, शरीर से नहीं। देह का यह दर्शन हमेशा से अतिमानवीय फंतासी का हिस्सा रहा है। इस संसार में हर कोई अमर होना चाहता है। लोग अमरत्व प्राप्त करने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं। मगर इस अमरता के करीब पहुंचकर भी शरीर की नश्वरता को स्वीकार करना ही होता है। कहते हैं कि अमरत्व की चाह सृष्टि में किसे नहीं होती, परन्तु सार्थक लक्ष्य के बिना जीवन निस्सार है। प्राचीन काल से ही अमरता की कल्पना हमेशा लोगों को लुभाती रही है। कोई भी व्यक्ति मृत्यु का वरण नहीं करना चाहता। जब से मानव इस धरा पर आया है, तभी से वह अमरत्व की खोज में है।
देखा जाये तो हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार, अमर देवताओं ने कितने अवतार पृथ्वी पर लिए, लेकिन उन्हें शरीर छोड़कर जाना ही पड़ा। परन्तु विचारणीय यह है कि क्या हमें अमरत्व चाहिए? और यदि चाहिए भी तो क्या हम इस अमरत्व का सदुपयोग कर पाएंगे? सदुपयोग न कर पाने कि स्थिति में हमें इस नश्वर संसार में अधिक रहकर क्या करना, जहाँ प्रतिपल सब कुछ छीजता ही जा रहा है, चाहे वह काया हो या अपने से जुड़ा कुछ भी। मनुष्य अपनों के बीच अपनों के कारण ही जीता और सुखी रहता है। ऐसे अमरत्व का क्या करना, जो अकेले भोगना हो। संवेदनशील मनुष्य संभवतः यही चाहेगा और यदि कोई कठोर ह्रदय व्यक्ति ऐसा जीवन पा भी ले, तो क्या वह सचमुच सुखोपभोग कर पायेगा या दुनिया को कुछ दे पायेगा।

आपने गौतम बुद्ध के बारे में अवश्य सुना होगा या किसी और ऐसे व्यक्ति के बारे में जिसने मानव जाति की भलाई के लिए बहुत काम किया हो। गौतम बुद्ध ने एक राजा होते हुए भी अपना राज्य और धन-दौलत त्याग दिया था। उनकी महानता उनके मौन में थी। उनकी महानता उनकी ध्यानमग्नता और उनकी करुणा में थी। मेरे विचार से हमारे श्रेष्ठतम कर्मों से मृत्योपरांत ही अमरता प्राप्त होती है। अगर जीवन में मानवीय गुणों का संचार न हो तो जीवन मृत्यु के समान हो जाता है। उस पर अलक्षित और दिशाहीन जीवन अगर अंतहीन हो जाय, तो जीव अपने इस अंतहीन जीवन से पीड़ित होने लगता है। इसलिए सर्वप्रथम हमें अमरत्व के झूठे विचार को त्याग देना चाहिए। दूसरा हमें अपनी समझ को शांत करना चाहिए,  तीसरा, हमें ह्रदय की संतुष्टि की खोज करनी चाहिए।

मनुष्य मोह माया के बंधन में ऐसे जकड़ जाते हैं, यानी हमें ये नस्वर संसार इतना पसंद आ जाता है कि हम हर संभव प्रयास से जीवन को बनाये और संजोये रखना चाहते हैं। इसलिए हमारी दूसरों पर निर्भरता बढ़ती है और यह निर्भरता मन में कृपणता एवम् खिन्नता के भाव पैदा करती है। देखा जाये तो सांसारिक जीवन के दोनों पहलू “जीवन और मृत्य” ये शाश्‍वत आनंद और अमरत्व की इच्छा से सम्बंधित हैं। जीवन को सुखी उसकी दीर्घता नहीं, बल्कि उसके सकारात्मक सोच और कार्य ही बना पाते हैं, यह हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए।

भारतीय संस्कृति में परशुराम, व्यास, बलि, कृपाचार्य, विभीषण और अश्वत्थामा ऐसे महापुरुषों के चरित्रों से भरी पड़ी है, जिन्हें  अमरता का वरदान प्राप्त है। परन्तु इन अमर चरित्रों के इस अंतहीन जीवन के कष्ट और पीड़ा के बारे में शायद ही किसी ने विचार किया हो। यह एक कटु सच्चाई है कि गौतम बुद्ध अमर हो गए, कबीर अमर हो गए, भगत सिंह अमर हो गए, इसलिए नहीं कि उनकी आत्मा जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर परमात्मा के साथ मिलकर अब भी यहीं कहीं चक्कर काटती है। बल्कि इसलिए कि लाखों-करोड़ों लोग अब भी उनको याद करते हैं। सत्य यही है कि अपने अच्छे कर्मों के द्वारा दूसरों के दिमाग में जिसने जगह बना ली वही अमर हो गया।

अमरत्व की बात करें तो सत्कर्मों का प्याला जिसने पिया, वही अमर हो गया। बस फर्क इतना है कि छोटी अमरता वो होती है, जिसमें आपके हित-मित्र जान-पहचान वाले आपको याद रखते हैं। महान अमरता वो होती है, जब वे लोग भी आपको याद रखते हैं, जो आपको निजी तौर पर नहीं जानते। जो पूरे देश के लिए सराहनीय होता है।

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