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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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शराबबंदी का खुलकर विरोध कर रही महिलाएं सरकार के लिए अनेकों प्रश्न चिन्ह छोड़ रहीं हैं.....

Posted On: 1 Jun, 2017 में

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शराबबंदी का खुलकर विरोध कर रही महिलाएं सरकार के लिए अनेकों प्रश्न चिन्ह छोड़ रहीं हैं…
अपने हक के लिए लड़ती महिलाओं से डरिये, क्योंकि यह महिलाएं अगर एक साथ खड़ीं हो गयी तो किसी भी पार्टी को पटखनी देने का माद्दा रखती हैं…..
मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश में शराब माफियाओं, भ्रष्ट नेताओं व अफसरों की साठ-गाँठ ने यहाँ की  जम्हूरियत के दिलों दिमाग में असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर उसके विश्वास की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी हैं l योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से महिलाएं सोचतीं थी कि कम से कम यूपी में अब उनकी आबरू सुरक्षित रहेगी l फगवा धारी जो खुद एक शांतप्रिय व्यक्तित्व के मालिक हैं वो उत्तर – प्रदेश में कभी अशांति नही होने देंगे l महिलाओ के सम्मान में योगी शराबबंदी करवा कर महिलाओं को रोज रोज की प्रताड़ना से मुक्ति दिलाएंगे लेकिन, ऐसा नहीं हुआ l
अगर लखनऊ की बात करें तो खुर्रम नगर से पिकनिक स्पॉट रोड को लेकर चलते हुए आप मुंशी पुलिया की तरफ चलिए इस बीच रास्ते में आपको कई शराब की दुकाने मिल जाएँगी ये काफी घनी आबादी वाला क्षेत्र है घनी बस्ती, मंदिर और स्कूल पास होने के बावजूद भी शराब की दुकानें खुलने से शराबियों की आवाजाही एवं जमावड़ा यहां बना रहता है, जिससे बच्चों के साथ महिलाओं को भी परेशानी उठानी पड़ती है ।
मौजूदा सरकार अगर शराब को लेकर विचार करे तो अकेले उत्तर प्रदेश के लखनऊ में ही सड़कों पर हर कोस-दो-कोस के फ़ासले पर शराब की दुकानें नज़र आ जाएंगी जो ठंडी-चिल्ड बीयर और देसी शराब धड़ल्ले से बेचती हैं l आज हालात ये है कि रात गये घर लौटते गली-गली में खुल गयी शराब की दुकानों पर खड़ी भीड़, शराब के नशे में लड़खड़ाते, चिल्लाते लोंग नजर आ जायेंगे, लेकिन वही राशन या दवा की दुकान आपको ढूंढने से नहीं मिलेगी l इन हालातों को देखते हुए सरकार द्वारा इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए l
मुझे ये बात सोचने पर मजबूर करती है कि सरकार को स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों के बजाय क्या वाक़ई शराब की दुकानों की इतनी आवश्यकता है ? या फिर आवाम के साथ महज धोखा.
सरकार ये बखूबी जानती है कि देश की भ्रष्ट व्यवस्था और दारुबाजों का खामियाजा छोटे बच्चे, बूढ़े मां बाप और संषर्ष करती पत्नी को झेलना पड़ता है l नशेड़ी क्षणिक आनन्द के लिए अपने सम्पूर्ण जीवन को विनाश की ओर धकेल देता है l हकीकत यही है कि शराब से सबसे ज्यादा नुकसान महिला और बच्चों को हो रहा है शराब ने कई घरों को उजाड़ा है, शराब माफियाओं ने कई परिवार तबाह किए हैं। देखा जाये तो यहाँ ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी की पूरी कमाई शराब को समर्पित कर दी है उनके घर में चूल्हा भले ही न जले, भूख से उनके बच्चे भले ही तड़फ रहे हों लेकिन ग्लासों की खनक पे सीधी बोतलें टकरातीं हैं l ये बात शराबी भी बखूबी जनता है कि शराब से न सिर्फ पीने वाला बल्कि उसके आसपास के लोग और खासतौर से घर की महिलाएं और बच्चे भी प्रभावित होते हैं l शराब केवल स्वास्थ्य, चरित्र और धन का ही नुकसान नहीं करती बल्कि, इसका सबसे ज्यादा खामियाजा शराबी इन्सान की पत्नी और उसके बच्चों को भुगतना पड़ता है। जहां शराब की वजह से महिलाओं पर घरेलू हिंसा सड़क पर छेड़छाड़ बढ़ रही है महिलाएं शराब बंद करने के लिए इतना संघर्ष कर रही हैं वहीँ पर महिलाओं की इस जटिल समस्या को मद्देनजर रखते हुए क्या समाज की एक महिला का आबकारी मंत्री बनना उचित है ?  अब ऐसे में महिलाएं न्याय पाने की बात तो छोडो अपनी व्यथा कहने की स्थिती में भी नही है l नशेड़ी पतियों से पीड़ित महिलाएं गरीब, वंचित, उपेक्षित, मुस्लिम और आदिवासी महिलाएं हैं ये वो महिलाएं हैं जो अपने निठल्ले और शराबी पति से अपनी जवान हो रही बेटी की हिफाजत करना चाहतीं हैं, ये वो महिलायें हैं जो अपने नशेड़ी पति की गालियों, लात घूंसों को रोजाना सहती हैं, दर्द से कराहती उनकी चीखें किसी अँधेरे कुएं में दफ़न हो जातीं हैं l रोज–रोज की चिक चिक से व्यथित महिलाओं में शराब की दुकानों को लेकर इतना आक्रोश है कि पुलिस भी कुछ नहीं कर रही l
जो महिलाएं अपनी आवाज को मुखर कर शराब माफियाओं से ना डरते हुए आन्दोलन कर रहीं हैं उन्हें किसी का डर नहीं, क्यूंकि जिस दर्द को वो झेल रहीं है वो दर्द माफियाओं के डर से कहीं ज्यादा है l वे शराब का ठेका बंद करने के लिए रात दिन पहरा देती हैं, शराब के ठेकेदारों से उलझती हैं, पुलिस से पिटती हैं लेकिन हार नहीं मानतीं l महिलायों के हौंसलों को देखते हुए मौजूदा सरकार को चाहिए कि इन महिलाओं से डरें क्योंकि यह महिलाएं अगर एक साथ खड़ीं हो गयी तो किसी भी पार्टी को पटखनी देने का माद्दा रखती हैं.
इतना सब देखते हुए मैं कहना चाहूंगी कि ये भी सत्य है कि आगे जहां भी चुनाव होंगे वहां शराबबंदी बड़ा चुनावी मुद्दा रहेगा, शराबबंदी का खुलकर विरोध कर रही वे महिलाएं सरकार के लिए अनेकों प्रश्न चिन्ह छोड़ रहीं हैं जिसका हल वक़्त आने पर मौजूदा सरकार के पास नहीं होगा l प्रशासन को चाहिए कि अंग्रेजी शराब की दुकानों को और देशी शराब के ठेकों को नगर से बाहर ऐसे स्थान पर सहमति दें जहां स्कूल, धर्मस्थल व बस्ती क्षेत्र न हो।
सरकार के हित और अहित को देखते हुए ये भी कटु सत्य है कि शराबबंदी को लेकर उठ रहे सवाल पूरे देश की राजनीति को हिलाकर और बदलकर रख सकते है l इसलिए सरकार का फर्ज बनता है कि जहां जहां भी शराब ठेकों का विरोध हो वहां वहां शराब के ठेके तत्काल प्रभाव से बंद कर दिए जाएं.
सुनीता दोहरे
प्रबंध संपादक
इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज़

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