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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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ये मेरी कंचन काया इसीलिए तो बनी है.... एक कहानी !!!

Posted On: 25 Jun, 2016 में

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hi

ये मेरी कंचन काया इसीलिए तो बनी है…. एक कहानी !!!

जब ईश्वर ने मां की रचना सृष्टि को चलाने के लिए की थी, उसी समय माँ की कोख में निश्छल प्रेम ने जन्म लिया था, और आज भी माँ का अपने बच्चों के प्रति प्रेम एक गंगा की तरह पवित्र हैl
वैदेही प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की मालकिन थी उसके तीन बेटे थे l अपने छोटे छोटे बच्चों में वो दिन भर उलझी रहती l सारा दिन यूँ ही बीत जाता l बच्चों को स्कूल भेजना, जाते ही काम निपटाना, फिर उनके स्कूल से आते ही उन्ही रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो जाना l उसे अपने पति के दिनभर के कार्यों से कोई मतलब नहीं था l धीरे धीरे पति भी समझ चुका था कि, बच्चे छोटे हैं इसलिए उनकी देखभाल में थक जाती है, बेचारी आराम भी नहीं कर पाती l ये सब देखते हुए पति अभिषेक चुप ही रहता l वैदेही से कोई काम नहीं कहता और अपने सारे काम वो खुद कर लिया करता था l  वैदेही ने बच्चों की व्यस्तता वश अपने पति की जमापूंजी और जमीन जायदाद की कभी जानकारी नहीं ली और ना ही अभिषेक ने वैदेही को कभी बताने की जरुरत समझी l

वैदेही का बड़ा बेटा 15 साल का हो चुका था पढ़ाई के साथ साथ वो अपनी माँ का बहुत ख्याल रखता था l पिता के ऑफिस से आने के पहले निक्कू अपने स्कूल का सारा काम निपटा लेता था और अपने छोटे भाइयों की देखभाल में माँ की मदद भी कर देता था l वैदेही को कुछ दिनों से अभिषेक का बर्ताव कुछ अलग अलग सा लग रहा था l जैसे ऑफिस देर से आना, आते ही छत पर चले जाना, देर तक फोन से ना जाने किससे बातें करते रहना उसकी रोज की दिनचर्या हो गई थी l आजकल वो अपने मोबाइल में लॉक भी लगाने लगा था l फोन की घंटी बजते ही लपक कर फोन उठाता था l वैदेही ने कई बार कहा कि, अभिषेक तुम बदल रहे हो क्या बात है l क्या कोई परेशानी है l वो हंसकर टाल देता l वैदेही के घर से चंद कदम की दूरी पर श्रीवास्तव जी रहते थे जो अभिषेक के ऑफिस में ही काम करते थे l ये दोनों लोग साथ ही ऑफिस जाया करते थे इसीलिए वैदेही अभिषेक के बारे में जानने के लिए उनके घर चली गई l
वैदेही ने श्रीवास्तव जी से पूंछा कि, भाई साहेब ! आजकल अभिषेक कुछ बदले बदले से नजर आते हैं क्या ऑफिस में कोई बात हुई है l
श्रीवास्तव जी बोले … अरे नहीं भाभी ऐसी तो कोई बात नहीं है…. आपको ये क्यूँ महसूस हुआ l वैदेही बोली….  अभिषेक आजकल ऑफिस से देर से आते हैं और आते ही वो फोन पर लग जाते हैं, मैं जब भी उनको चुपके से देखती हूँ, तब तो वो फोन पर किसी से बड़े प्यार से बात कर रहे होते  हैं लेकिन, मेरे सामने आते ही वो उस शख्स को जोर जोर से डांटने लगते हैं l कहते हैं अगर ऑफिस का काम नही करना है तो छोड़ दो वरना, मैं तुम्हे सस्पेंड कर दूंगा l मेरी ये समझ नहीं आता कि, आखिर माजरा क्या है l
श्रीवास्तव जी ने कहा ! हाँ ये बात तो सही है कि, पहले वो ऑफिस मेरे साथ ही जाता था लेकिन, आजकल वो मेरे बिना ही चला जाता है l ऑफिस में भी एकांत तलाशता है बड़ी अजीब सी बात है कि उसका व्यवहार पहले जैसा नहीं रहा l यही कोई छह महीने पहले मेरी शाली रिंकी का भी तबादला यही हो गया है मैं उससे भी बात करके पूछूँगा क्यूंकि, कभी कभी अभिषेक रिंकी के साथ ही ऑफिस चला जाता है l हो सकता हो रिंकी अभिषेक की प्रोब्लम जानती हो l भाभी जी आप चिंता न करें, मैं अभिषेक से बात करता हूँ फिर आपको बताता हूँ l
वैदेही आश्वत होकर वापस अपने घर चली आई l लेकिन उसका किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था l अब वो अभिषेक की हर हरकत पर नजर रखने लगी l लेकिन अभिषेक से उसने कुछ नहीं कहा उसका नतीजा ये हुआ कि, अभिषेक दिन व दिन वैदेही को नजरअंदाज करने लगा l वैदेही टूटकर रह जाती l अब तो ये रोज का कार्य हो चुका था कि, अभिषेक रात 11 बजे आता उसके बाद छत पर रात के 1 बजे तक फोन पर लगा रहता, फिर आकर सो जाता, सुबह 8 बजे सोकर उठता तो अपना फोन भी बाथरूम में ले जाता l ठीक साढ़े नौ बजे नाश्ता करके ऑफिस के लिए निकल जाता l इस बीच वो वैदेही से सिर्फ उतनी बात करता जो बच्चों से सम्बन्धित होती थी l बाकि वैदेही से उसका कोई लेना देना नहीं होता था l
रात का और दिन का खाना अभिषेक बाहर ही खाने लगा था l उस दिन तो हद ही हो गई थी जब, अभिषेक ने अपना सोने का कमरा गेस्ट रूम को बना लिया था l अब तो उसे छत पर जाने की भी अवश्यकता नहीं थी क्यूंकि, गेस्ट रूम को वो अन्दर से बंद कर लेता और देर रात तक फोन पर बिजी रहता l एक दिन वैदेही के सब्र का बाँध टूट गया उसने जोर जोर से दरवाज़ा खटखटाया और बोली, तुम दरवाज़े को अन्दर से क्यूँ बंद कर लेते हो, आखिर ऐसा क्या काम करते हो जो, आपको दरवाज़ा बंद करने की जरूरत पड़ जाती है l अभिषेक गुस्से से आगबबूला हो गया और बोला, तू और तेरे बच्चे मुझे चैन से सोने भी नहीं देते l मुझे ज्यादा परेशान करोगी तो मैं घर छोड़कर चला जाऊंगा l अभिषेक की ये बात सुनकर वैदेही अवाक रह गई l वो सोचने लगी, अभी तो मैंने कुछ भी नहीं कहा, सिर्फ पूंछा ही तो था l तो फिर, इनको इतनी उंची आवाज़ में और इतनी बड़ी बात क्यूँ कहनी पड़ी l क्या मैं सच में गलत थी, क्या मुझे दरवाज़ा खटखटाना नही चाहिए था ? निढाल क़दमों से वैदेही अपने कमरे में आ गई l वो जैसे ही अपने कमरे की चौखट तक पहुंची, तो सुनती क्या है कि टिंकू जो कि, उसका सबसे छोटा बेटा है वो निक्कू से अपनी तोतली भाषा में कह रहा था कि, निक्कू भैया, पापा इतनी जोल जोल से मम्मी को क्यूँ डांट लहे हैं l पापा को लोक दो दल्दी से नहीं तो, मम्मी लो जाएगी l तो दूसरे नंबर का बेटा तुरंत बोला….तू चुप रह टिंकू, तुझे नही पता है, तो मत बोला कर l मुझे पता है वो क्यूँ डांट रहे हैं मम्मी को क्यूंकि, पापा की एक नई गर्लफ्रेंड बन गई है मैंने उनकी गर्लफ्रेंड को श्रीवास्तव अंकल के घर जाते हुए देखा था l पता है भैया, वो पापा की कार से श्रीवास्तव अंकल के घर के सामने उतरी और पापा को जोर का हग किया और जाते जाते ये भी बोली… जानू ! आई लव यूँ सो मच l और घर के अन्दर चली गई l पापा उसे देर तक अन्दर जाते हुए देखते रहे l मैंने जल्दी से अपनी गेंद उठाई और घर भाग आया l उन्होंने मुझे देख नहीं पाया था वरना, मैं उस दिन बहुत पीटा जाता l भैया अगर पापा ने मम्मी को छोड़ दिया तो हम सब स्कूल भी नही जा पायेंगे l सबसे छोटा टिंकू बोला, अले चुप लह l स्कूल स्कूल कलता लहता है मुझे तो दूध भी नही मिलेगा पीने को, और तुम सब्जी लोटी कैसे खाओगे l ये कहकर टिंकू रोने लगा l निक्कू तुरंत बोला, टिंकू रोना बंद करो और तुम दोनों मेरी बात ध्यान से सुनो l देखो चीकू तुम दोनों ये बात किसी से नहीं कहोगे, यहाँ तक की मम्मी से भी नहीं कहोगे, समझे l वरना मम्मी बहुत रोएगी l क्या तुम मम्मी को रोते हुए देख सकते हो, नहीं l तो फिर भूल जाओ, मैं सब ठीक कर दूंगा l  अगर पापा मम्मी में झगड़ा हुआ और पापा ये घर छोड़कर चले गये तो फिर, मैं मेहनत करूँगा और तुम्हारे लिए दूध भी लाऊंगा l बस चीकू किसी तरह 5 या 6 साल और निकल जाएँ तब तक मेरी पढाई पूरी हो जाएगी मेरी नौकरी लग जाएगी, फिर मम्मी को कोई दिक्कत नही होगी l तब तक हमें हिम्मत से काम लेना होगा और मम्मी को अपने कामों में उलझाना होगा ताकि, मम्मी कभी भी  पापा की गलतियों को देख ना पायें और उन दोनों में झगड़ा न हो l
वैदेही ये सब सुनकर सन्न रह गई l वो अंजान बन कमरे में आई l अपने तीनों बच्चों को सीने से लगाकर तड़फ उठी, फिर बोली, चलो बच्चों ! सब लोग सो जाओ l सुबह सबको स्कूल जाना है कि नहीं l बच्चे सो गए लेकिन खुद वो नहीं सो पाई l वैदेही व्यथित मन लिए हर करवट पर कराह जाती l वो सोच रही थी कि अब उसे कोई डर नहीं क्यूंकि, आज उसे अपना 15 साल का बेटा बहुत बड़ा नजर आ रहा था l किसी भी वेदना के क्षणों में संतान का निश्‍छल प्‍यार, किसी भी स्‍त्री के लिये दैवीय वरदान से कम नहीं हुआ करता। वैदेही के लिए भी उसके बच्चों का प्यार किसी वरदान से कम नही था l जब से उसने अपने बेटों की बातें सुनी थीं तब से वैदेही ने अभिषेक से कुछ भी कहना और सुनना बंद कर दिया था l क्यूंकि उसने सोच लिया था कि, उसके बच्चों के कथन में सौ प्रतिशत सच्चाई है l अगर सच में अभिषेक ने हम सबको छोड़ दिया तो मैं बच्चों को पढ़ा कैसे पाऊँगी, और अब इस उम्र में कोई जॉब भी तो नहीं मिलेगी मुझे l उसने इसको ही अपनी नियति मान लिया.
अभिषेक जरा भी नही बदला, उलटे अब तो उसे पूरी आज़ादी मिल चुकी थी l एक दिन वही हुआ जिसका वैदेही को डर था l रिंकी जो कि, श्रीवास्तव जी की शाली थी और अभिषेक की गर्लफ्रैंड थी l एक शाम को वो दोनों एक साथ घर आये l वैदेही को देखकर रिंकी ने उसे नमस्ते किया फिर, गेस्ट रूम में जाकर बैठ गई वैदेही चाय बनाकर दे गई लेकिन, वैदेही ने कुछ कहा नहीं l रत का 11 बज गया लेकिन, रिंकी अपने घर नहीं गई l दोनों दरवाज़ा बंद कर सो गए l सुबह अभिषेक रिंकी का सामान श्रीवास्तव जी के घर से अपने कमरे में ले आया l दोनों पति पत्नी की तरह रहने लगे.
रिंकी रोज शाम को अभिषेक से कहती कि, चलो न किसी रेस्टोरेंट मैं चलकर खाना खाते हैंl और अभिषेक पलट कर यही कहता कि, देखो रिंकी दोपहर को तो बाहर खाते ही हैं अब शाम को तो घर में बना लिया करो l रोज बाहर का खाना खाकर मेरी तबियत भी खराब रहने लगी है l तुम समझती क्यूँ नहीं ? तुमने खुद सुना था मुझे डाक्टर ने बहार का खाना खाने को बिलकुल मना कर दिया है l मैं भी रोज की तरह अभिषेक का खाना बना देती और मेज़ पर लगाकर अपने बच्चों के साथ कमरे में आ जाती l अभिषेक चुपचाप मेज़ पर लगा खाना खा लेता और फिर रिंकी को रेस्टोरेंट ले जाता l इसी तरह दिन कटने लगे अक्सर रेस्टोरेंट में रिंकी के साथ उसका भी कुछ न कुछ खाना हो जाता जिससे वो बीमार रहने लगा था.
वैदेही को उड़ती उड़ती ये खबर मिली थी कि, रिंकी ने ऑफिस के किसी नए आने वाले इम्प्लाई से प्रेम कर लिया है और अब उसकी कमाई पर ऐश कर रही है l लेकिन उसने अभिषेक को कुछ नहीं बताया था l पेट में तकलीफ होने के कारण उसे ऑफिस से आये दिन छुट्टी लेनी पड़ती थी l जिस दिन अभिषेक नहीं जाता उस दिन रिंकी अकेली ही ऑफिस जाती और देर रात लौटकर आती l रिंकी की इस बात से नाराज अभिषेक एक दिन छुट्टी का बहाना बनाकर देर से ऑफिस जाता है लेकिन, वहां जाकर पता चलता है कि, रिंकी उसी कम्पनी के नए इम्प्लाई के साथ छुट्टी लेकर घूमने गई है l एक दो लोगों से पता चला कि, रिंकी रोज़ ही शाम को अक्सर उसके साथ घूमने जाती है l ऑफिस के लोग दबी जुबान में रिंकी के लिए अपशब्द भी बोलने लगे थे उस दिन तो हद ही हो गई, जब ऑफिस के एक कर्मचारी ने रिंकी को चरित्रहीन तक कह दिया था l अभिषेक इस बात से परेशान होकर घर आता है l अभिषेक का उदास चेहरा देख वैदेही समझ जाती है कि, आज अभिषेक को रिंकी की असलियत पता चल गई है l वैदेही चाय का कप उसके पास रखकर चली जाती है l वैदेही अभिषेक से कुछ भी बोलने से पहले, निक्की की बात याद रखती, इसलिए वैदेही कुछ नही बोलती l वो सब कुछ चुपचाप सहन कर रही थी l वैदेही अन्दर ही अन्दर टूट चुकी थी l उसे उस पल का इन्तजार था जब उसके बेटे की जॉब लगेगी इसी आस में वो इतना दर्द सह रही थी.
एक घर में रहने के कारण वैदेही और अभिषेक का अक्सर आमना सामना हो ही जाता l वैदेही जब भी अभिषेक को देखती तो वो नजरें चुराकर हट जाता l लेकिन वैदेही की आँखों में अभिषेक को बेहद दर्द नजर आता, लेकिन अभिषेक बेबस था उसने जो गलती की थी उसकी सजा झेल रहा था.
अभिषेक ये समझ चुका था कि, रिंकी एक अय्याश किस्म की लड़की है जिसे नए नए लोगों के साथ बाहर घूमना पसंद है l किसी अमीर आदमी को फ़साना और उसके रुपयों पर ऐश काटना उसका धंधा बन चुका है l इसलिए अभिषेक ने रिंकी से बात करना कम कर दिया और रुपया देना भी बंद कर दिया l जिससे अभिषेक और रिंकी के बीच झगड़े होने लगे l एक दिन अभिषेक ने उसे कह ही दिया कि रिंकी तुझे मैं नहीं, मेरा रुपया चाहिए था तुझे हर दो साल में एक नया मर्द चाहिए l जो तेरी रुपयों की हवस पूरी कर सके l ये सुनकर रिंकी बौखला गई थी और बोली हाँ, मुझे हर साल नया मर्द चाहिए लेंकिन, तुमसे मतलब l तुम तो मुझे रुपया देते नहीं हो तो मैं, तुम पर अपनी काया क्यूँ लुटाऊं l ये मेरी कंचन काया इसीलिए तो बनी है ये किस दिन काम आएगी l अभी तो मुझे होश आया है जब तक मैं जवान हूँ l बटोर लेने दो मुझे जितना जी चाहे l ये सुनकर अभिषेक तिलमिला गया था लेकिन चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया l उस दिन उसने पूरी रात रोकर छत पर काटी थी l
वैदेही को कमरे में झगडे की आवाज़े खूब सुनाई देती l लेकिन वो उन दोनों के बीच कुछ नहीं बोलती l एक दिन वैदेही को रात में छत पर किसी के चलने की आवाज़ सुनाई दी l उसे लगा कि कहीं कोई चोर तो नहीं l ऐसा सोचकर वो अभिषेक को जगाने के लिए उसके कमरे के बाहर गई, तो देखती है कि रिंकी किसी अजनबी के साथ बात कर रही है पर, अभिषेक वहां नहीं है l और कॉरिडोर की लाईट भी जल रही थी l सीढियों को चढ़ते हुए जब वो छत पर पहुंची तो देखती है कि, अभिषेक बेतहाशा रोये जा रहा था l उसे रोता देख वैदेही से रहा नहीं गया l उसने पूछ ही लिया कि, अभिषेक क्या हुआ l क्या आपकी तबियत खाराब है ? आप रो क्यूँ रहे हैं l चलिए नीचे चलते हैं l वैदेही अभिषेक को नीचे लेकर आ गई l वो देखती क्या है कि, रिंकी उस व्यक्ति के सीने से लिपट कर कुछ बुदबुदा रही थी l वैदेही का खून खौल गया गुस्से में उसने सिर्फ इतना ही कहा कि, रिंकी तुम अपना सामान उठाओ और यहाँ से चलती बनो l मुझे सुबह तुम्हारा चेहरा नहीं दिखाई देना चाहिए l ये कहते हुए वैदेही अभिषेक को बच्चों के पास ले गई और सर दर्द की दवा देकर, वही उसे सुला दिया l खुद जमीन में बिस्तर बिछाकर सो गई l वैदेही सुबह जब सोकर उठी तो देखती है कि, रिंकी आपना सामान लेकर जा चुकी थी l रिंकी और अभिषेक का प्रेम मात्र दो साल में ही हवा हो चुका था l
अभिषेक ने ऑफिस जाना छोड़ दिया था क्यूंकि, उसी जगह पर रिंकी भी जॉब करती थी जहाँ अभिषेक करता था l ऑफिस ना जाने की बजह से अभिषेक की तनख्वाह भी कट गई थी l बच्चों की फीस भी भरनी थी l इस बजह से वैदेही विचलित हो उठी l जोड़ तोड़ करके के वैदेही ने अभिषेक का तबादला दूसरी ब्रांच में करवा दिया और अभिषेक को समझा बुझाकर ऑफिस भेजने लगी l अब अभिषेक ऑफिस से जल्दी घर आ जाता था घर आते ही उसे शाम की चाय तैयार मिलती l चाय पीने के बाद वो घर की सब्जी और सामान लेकर आता, फिर टिंकू और चीकू को पढाता उसके बाद न्यूज़ देखकर खाना खाता और सो जाता l उसकी दिनचर्या अब सुधर चुकी थी l वैदेही मन ही मन सोचती कि, अभिषेक अब ठीक होने लगा है, उसका स्वास्थ्य भी अब ठीक रहने लगा है, मेरे बच्चे भी अब खुश रहते हैं l बच्चों की सुलभ मुस्कान देखकर वैदेही अन्दर से बहुत खुश होती और कहती l हे ईश्वर तेरा लाख लाख शुक्र है कि, समय रहते सब ठीक हो गया l मुझे और कुछ नहीं चाहिए l मेरे बच्चों के चेहरे की रौनक और उनके ओठों की हंसी इसी तरह बरकरार रखना l
इसी तरह अभिषेक और बच्चों की देखभाल करते हुए कई साल गुजर गये l लेकिन वैदेही ने अभिषेक को कभी अपने करीब नहीं आने दिया l एक घर में रहते हुए भी वे अजनबियों की तरह रहते थे लेकिन, वैदेही ने अभिषेक की हर सुख सुविधा का ख्याल रखते हुए उसकी खूब सेवा की l
बच्चे बड़े हो गए थे l बड़ा निक्कू बैंक में मैनेजर बन गया था l चीकू आईआईटी करके प्राइवेट कम्पनी में एक अच्छे पद पर था और सबसे छोटा टिंकू सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था l वैदेही ने अपना सारा ध्यान अपने बच्चों को आगे बढ़ाने में लगा दिया था l उसने कभी अपने सुख के बारे में नहीं सोचा था.
अभिषेक जब वैदेही की सहजता और सरलता और हिम्मत को देखता तो ठगा सा रह जाता l उसे अपने अन्दर एक गिल्टी सी महसूस होने लगी थी l एक दिन अभिषेक ने वैदेही के पास जाकर कहा कि, वैदेही सुनो ! कल बच्चे दिवाली की छुट्टी में घर आ जायेंगे l इस बार हम सभी लोग दिवाली एक साथ मनाएंगे l उनके आने से पहले मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ l प्लीज़ जरा मेरे साथ छत पर चलो l वैदेही सम्मोहित सी अभिषेक के साथ छत पर चली गई l अभिषेक ने वैदेही का हाँथ पकड़कर कहा कि, वैदेही मैं तुम्हे छत पर इसलिए लाया हूँ कि, ये चाँद और तारे इस बात के गवाही रहेंगे l मैं इस पवित्र चन्द्रमा और इन मासूम तारों की कसम खाकर कहता हूँ कि अब कोई गलती नहीं करूँगा मुझे मांफ कर दो l वैदेही प्लीज़ पहले वाली वैदेही बन जाओ l जो सजा मुझे देना चाहो दे दो मैं ख़ुशी ख़ुशी उसे पूरी करूँगा लेकिन, मुझे मांफ कर दो l तुम्हारा अन्दर ही अन्दर टूटना मुझसे देखा नही जाता l तुम मुझे मांफ नहीं करोगी तो मैं घुट घुट कर मर जाऊंगा l
वैदेही एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की मालकिन थी l उसे वक्त के अच्छे बुरे की पहचान थी l उसे ये पता था कि, परिस्थितियों की धूप और धूल कुछ रिश्तों को धुंधला कर देती है, क्योंकि हर रिश्ते को फलने फूलने के लिए स्नेह की छाया, समर्पण की खाद, दीये की तरह जलकर रिश्तों को उजाला देने और त्याग बलिदान की शपथ होनी चाहिए l यूँ ही नही रिश्ते सजीव होते हैं l वैदेही ने रिश्ते को सँभालने के लिए बहुत त्याग किया था l
वैदेही अभिषेक की बातें सुनकर फूट फूट कर रो पड़ी l रोते हुए बोली, अभिषेक तुमने पहले भी अग्नि के समक्ष फेरे लेकर यही कसम खाई थी l उस कसम का क्या हुआ l क्यूँ आज फिर एक झूठी कसम खाने को मजबूर हो रहे हो l उसके सब्र का बांध टूट चूका था, उसकी सिसकियों से एक ही आवाज़ आ रही थी कि, अपनी लाख कोशिशों के बाद भी अभिषेक मैं तुम्हे अपना नहीं पा रही हूँ l मेरे शब्‍दकोष में अब क्षमा शब्द बचा ही कहां था ? वो तड़फ कर बोली, अभिषेक तुमने तो मेरा सब कुछ रिक्त कर दिया, जिससे मेरे अंदर की भावना कुम्‍हला सी गयी है, अब मेरा घुटता जीवन मेरे शब्दों में प्रतिबिंबित हो रहा है l हाँ अभिषेक मैं मरते दम तक तुम्हारे और बच्चों के साथ रहूंगी l इसी आँगन में मेरा दम निकलेगा l क्यूंकि एक सच्ची भारतीय नारी अपने पिया के घर डोली में बैठकर आती है और जब पिया के घर से जाती है तो अर्थी में सजकर जाती है.
मैंने जिन बच्चों को जन्म दिया है उनकी जिन्दगी बनाने का फ़र्ज़ भी मेरा ही है l यही सोचकर मैंने इतना दर्द झेला है आज मेरे बच्चे उस मुकाम पर हैं जहाँ मैंने उन्हें ले जाने की कल्पना की थी l हाँ अभिषेक हम तुम और बच्चे सब एक साथ रहेंगे एक ही घर में रहेंगे लेकिन, अभिषेक ये भी एक कटु सत्य है कि मैं तुम्हे कभी अपना नही पाऊँगी l
आज वैदेही ने अपने बच्चों के भविष्य को सवारने के लिए अपने औरत होने के कद का अहसास पुरूष दंभ को कराया था, उसने अपने अस्तित्व की परिभाषा ईजाद की थी उसके बच्चे ही अब उसका  अस्तित्व हैं l और इसके लिए वैदेही ने वर्षों तपस्या की थी, वैदेही दुनिया को ये बताने में कामयाब रही, कि एक औरत किस तरह सभी तरह की प्रताड़नाओं को झेलती हुई, अपने मूल्यों और आदर्शों के बीच अपने अस्तित्व को मंजिल प्रदान करने में कामयाब रहती है ।

सुनीता दोहरे
प्रबंध सम्पादक
इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज़

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