sach ka aaina

अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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पति बेचारा कवच का मारा “एक आइना”

Posted On 14 May, 2016 में

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पति बेचारा कवच का मारा “एक आइना”

कमल सिंह की शादी को 6 साल हो गए थे l कमल अपनी पत्नी सुचेता को बेहद प्यार करता था दुनिया की हर चीज़, वो उसके क़दमों में डालना चाहता था l सुचेता की हर बात को ध्यान पूर्वक सुनता और उस पर अमल करता था, दिन भर थक हार कर आया कमल सुचेता को रोज़ घुमाने ले जाता, उसकी हर छोटी से छोटी इक्षा का ख्याल रखता था, लेकिन सुचेता ने कभी कमल को अहमियत नहीं दी l उसके ख्वाब बहुत ऊँचे थे वो स्वतंत्र रहना चाहती थी, उसका सपना था एक ऐसा घर हो जहाँ सिर्फ कमल हो जिसके साथ वो एक आजाद परिंदे की तरह उड सके l और इसीलिए वो आये दिन अपने सास ससुर से झगड़ा करने लगी थी l कमल सिंह एक सॉफ्टवेयर इंजीयर था जो नोयडा में पोस्टेड था l सुचेता ने अपने पिता से राय लेकर अपनी जॉब के लिए एप्लाई कर दिया, जिससे उसकी नौकरी लग गई l जिसके तहत सुचेता पिछले 2 सालों से मायके में रह रही थी, कारण वो एक प्राइमरी स्कूल में टीचर थी और उसकी पोस्टिंग उसके मायके जबलपुर में थी l शादी के बाद नौकरी लगने से उसने अपना तबादला जबलपुर अपने मायके करवा लिया था l सुचेता अपनी सारी ज्वैलरी व सामान भी ले गई थी l जब कमल की शादी हुई थी तब सुचेता नौकरी नहीं करती थी, तब भी सुचेता उससे और उसके माता पिता से झगड़ती थी और आज भी, जब भी वो नोयडा आती तो घर में कोहराम मचा देती l यूँ ही आये दिन अपने पति को प्रताड़ित करती थी घर के छोटे मोटे काम को लेकर सास के साथ गाली गलौज और ससुर की इज्जत ना करना उसकी रोज की दिनचर्या हो गई थी l कमल को जेल भिजवाने की धमकी और  छोटे छोटे घरेलू विवाद को वो दहेज प्रताड़ना का नाम देती थी, इस तरह इस कानून का वो नाजायज फायदा उठा रही थी l जबलपुर जाने के बाद तो सुचेता ने हद ही कर दी, हर महीने में एक आध बार आकर पति को धमकी देना कि अगर तुम अपने परिवार को छोड़कर मेरे साथ नही रहोगे, तो तुम्हारे खिलाफ मुकदमा दायर कर दूंगी तुम्हारा पूरा परिवार अन्दर करवा दूंगी l बेचारा कमल डर जाता और चुप रहना ही बेहतर समझता l हर बार कमल उसे जबलपुर छोड़ने जाता और लेने भी जाता इस कारण उसके ऑफीशियल कार्य पर भी असर पड़ रहा था l
सुचेता कहती थी आप नौकरी छोड़ दो और जबलपुर आकर मेरे माँ बाप के पास रहो लेकिन, कमल सिंह की अपने माता पिता के प्रति भी जिम्मेदारियां हैं जिन्हें वो नकार नहीं सकता था, क्यूंकि वो अपने माता पिता का अकेला पुत्र था l वो अपने माता पिता के साथ नोयडा मैं निवास करता था l कमल सिंह के 58 वर्षीय ससुर, जो कि पेशे से एक बड़े व्यापारी थे, ने दहेज प्रताड़ना कानून 498ए की धमकी देकर पिछले 5 सालों से कमल सिंह और उसके परिवार वालों को व्यथित कर रखा था l कमल सिंह के ससुर भी यही चाहते थे कि दामाद कमल सिंह आकर उनका व्यापार संभाल ले l इन सारी उलझनों से व्यथित कमल सिंह के सामने कोई चारा नजर नही आ रहा था l एक दिन दुखी मन से वो अपनी माँ की गोद में सर रखकर बोला, माँ अगर मैं कहीं दूर चला जाऊं तो तुम और पापा मेरे बिना रह लोगे l माँ एकदम घबरा गई और बोली, ना पुत्रर ना, ऐसा नहीं कहते, तुम देखना समय रहते सब ठीक हो जायेगा l बहू को मैं समझाउँगी l तीनों लोग जबलपुर गए, बहू को समझाने के लिए, लेकिन सुचेता के पिता ने पुलिस में कम्प्लेन कर दी, कि ये तीनों मुझसे दहेज़ मांग रहे हैं और मेरी बेटी को धमका रहे हैं l पुलिस आई, कमल बार बार यही कहता रहा, मैंने इसको कभी दुःख नहीं दिया, इन्स्पेक्टर साहेब माना कि, महिलाओं के पास 498ए दहेज़ एक्ट का कवच है, लेकिन हम पुरुष हैं हमें भी जीने का अधिकार है l पुलिस ने समझा बुझाकर आपसी समझौते से बात को रफा दफा कर दिया, लेकिन ये बात कमल के मन को घर कर गई l नोयडा पहुंचकर कमल ने चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली l सभी लोग सकते में थे कि इतना शांत और न्यायप्रिय शख्स ऐसा कैसे कर सकता है जिसकी ऊँची आवाज़ भी किसी ने न सुनी हो, वो व्यक्ति पत्नी को कैसे दुःख दे सकता है l वो कहते हैं कि ……….

जिन्दगी तेरी तामीर में, हम बरसों रहे बिखरते
तुझे जिससे मिले ख़ुशी, हम वही पनाह लेते हैं
तुम हमें कोसती रहो, जमाने भर में “सूचि”
चलो हम मौत को हस के, गले लगा लेते हैं……..

जहाँ तक मेरा मानना है कि, जो व्यक्ति अपनी माता को प्रेम और उसकी पूजा कर सकता है वो व्यक्ति किसी महिला को कभी कष्ट नहीं दे सकता है l और कमल अपनी माँ और अन्य महिलाओं का बहुत आदर करता था l इसीलिए उसने सुचेता की हर गलती को अनदेखा किया और खुद जीवन का अंत चुन लिया l
इस तरह की वारदातों को देखकर मुझे लगता है कि सामाजिक व नैतिक मूल्यों में आए बदलाव के चलते ‘प्रेम’ और ‘विवाह’ की परिभाषा ही बदल गई है। विवाह अब ‘दायित्व’ के निर्वहन का नाम नहीं, बल्कि अधिकारों की प्राप्ति का युद्धक्षेत्र बनता जा रहा है l दहेज़ लेना और देना दोनों ही गैरकानूनी है तो फिर केवल दहेज़ माँगने वाले ही क्यों जेल में बंद किये जाते हैं?  फिर देने वाले सामने खुलकर क्यूँ नहीं आते हैं l हमारे देश में हर वर्ष हजारों निर्दोष  पति, यानि कि पुरुष लिगं भेदभाव पूर्ण कानूनों के कारण आत्महत्या करते हैं,
देखा जाये तो भारत में असली प्रताड़ना तो पुरुष झेल रहे हैं
l दहेज प्रथा के नाम से धारा ‘498ए’ का दुरूपयोग महिलाएं व्यापक पैमाने पर कर रहीं है l आज महिलाए तरह – तरह के हथकंडे अपना कर पुरुषों को अपना शिकार बना कर कानून का गलत स्तेमाल कर रही हैं इन महिलाओं की प्रताड़ना से तंग आकर ज्यादातर पुरुष आत्महत्या कर ले रहे हैं l दहेज मांगना, बलात्कार, अपहरण आदि के फर्जी आरोप लगाकर पुरुषों का शोषण कर रहीं है l महिलाओं का ये कृत्य अत्यधिक निंदनीय है कानून को चाहिए ऐसी महिलाओं के साथ कठोर कार्यवाही करें l
गौरतलब हो कि 498ए दहेज़ एक्ट या घरेलू हिंसा अधिनियम को केवल आपकी पत्नी या उसके सम्बन्धियों के द्वारा ही निष्प्रभावी किया जा सकता है आपकी पत्नी की शिकायत पर आपका पूरा परिवार जेल जा सकता है चाहे वो आपके बुढे माँ बाप हों, अविवाहित बहन, भाभी चाहें वो (गर्भवती क्यूँ न हों) l ये कानून आपकी पत्नी द्वारा आपको ब्लेकमेल करने का सबसे खतरनाक हथियार है l
इस देश के कानून एकतरफा और अन्यायपूर्ण हैं, सत्य तो ये है कि अगर यह आत्महत्या, कमल सिंह की बजाय उसकी धर्मपत्नी सुजाता ने की होती, तो कमल सिंह सहित उसका पूरा परिवार जेल में चक्की पीस रहा होता। लेकिन, चूँकि आत्महत्या एक पति ने की है,  इसलिए कोई कार्यवाही नहीं हुई l हर साल दहेज़ के झूठे मामलों में हजारों पुरुष आत्महत्याएं कर लेते हैं और उनकी तरफ से आवाज उठाने वाला कोई नहीं होता l
विदित हो कि सेक्शन ‘498 ए’ को दहेज के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लागू किया गया था न कि मासूम व निर्दोष लोगों को फांसने के लिए। जो महिलाएं अपने पतियों को अपने मायकेवालों के साथ मिलकर दहेज़ के झूठे आरोपों में फसा देती है उन्हें ये सोचना चाहिए कि ये कानून उनकी रक्षा के लिए बना है, ना कि निर्दोष को सजा दिलाने के लिए l इस तरह के मामले देखकर उन महिलाओं के प्रति मेरा दिल घृणा से भर जाता है जो इस तरह का अनैतिक कार्य करके समाज को गलत आइना दिखा रहीं हैं l क्या सरकार इस तरह के गंभीर मामलों की कभी सुध लेगी ? क्या छद्म महिला सशक्तिकरण की जो बयार चल रही है, वो थमेगी ? अगर नहीं तो समाज में महिलाओं की छवि गर्त में धूमिल ही नजर आएगी l जीवन की आपाधापी में पत्नी के द्वारा तिल का ताड़ बनाये जाने वाले घरेलू मुद्दे अदालतों के चक्कर काटते काटते पुरुषों को आत्महत्या के लिए उकसाते है l क्यूंकि अदालत की दहलीज पर पहुंचकर उनके रिश्ते एक ऐसा नासूर बन जाते हैं जो फूटने पर सड़ांध ही फैलाते हैं l आईपीसी की धारा ‘498 -ए’ के दुरुपयोग के तहत दर्ज मामला गैर जमानती और दंडनीय होने के कारण और भी उलझ जाता है। इस क़ानून में एक गुनाहगार को सजा दिलाने के लिए हजारों बेक़सूर लोगों को फंसाना आम बात हो गई है l आत्मसम्मान वाले व्यक्ति के लिए यह काफ़ी घातक हो गया है, जब तक अपराध का फ़ैसला होता है जेल में रहते-रहते वह इस तरह खुद को बेइज्जत महसूस करता है, कि आत्महत्या करना ही उसे एक मात्र उपाय दिखता है, लेकिन अगर हिम्मत और समझदारी से काम लिया जाये तो हर समस्या का निदान है, इसलिए आत्महत्या का ख्याल आते ही ये द्रण निश्चय करें, कि अगर समस्या है तो हल अवश्य होगा और मुझे इसका हल ढूँढना है l आपका मुसीबतों से दूर भागना अपने परिवार को मुसीबत में डालना है, मजबूत बने और डटकर सामना करें, क्यूंकि अगर जीवन है तो उतार चढ़ाव तो आते रहेंगे l
ये सत्य है कि इस तरह के कानून में परिवर्तन की आवश्यकता है l मैं सरकार से सिर्फ इतना पूछना चाहती हूँ कि “अगर शादीशुदा महिलाओं की आत्महत्या के पीछे पुरुष हैं, तो शादीशुदा पुरुषों की आत्महत्या के पीछे कौन है” ? है आपके पास कोई जवाब, अगर नहीं तो इस तरह के कानून में परिवर्तन कीजिये l
और अब अंत में दहेज़ को लेकर प्रताड़ित उन पुरुषों से मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि आत्महत्या करना कोई विकल्प नहीं, ऐसा करके, आप अपने माँ-बाप और घर परिवार को अपूर्णीय दुःख देकर चले जाते है। ऐसा करके आप अपने अपनों को दुःखो और समस्याओं के भंवर में इतना कमजोर कर देते हैं कि पूरे परिवार के सोचने समझने की शक्ती क्षीण हो जाती है आप ये क्यूँ नहीं समझते, जब हर वर्ष हजारों पुरुषों के आत्महत्या करने पर भी सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता, तो क्या आपके आत्महत्या करने से पड़ेगा? अगर नहीं, तो क्यों आप यह स्वीकार नहीं करते कि, इन सब समस्याओं का एक मात्र उपाय, केवल और केवल अपनी लड़ाई को जीतकर, विरोधियों को झूठा व गलत साबित करके ही किया जा सकता है  और जीवित रहकर किया जा सकता है।
अगर देश में इस तरह की घटनाओं को रोकना है तो सरकार को महिलावादी शक्तियों को दरकिनार कर, कानूनों में परिवर्तन अवश्य करना ही चाहिए l

एक कविता “पति बेचारा कवच का मारा”

हाँ मैं एक पति हूँ, अगर मैं एक पति हूँ
तो मुझे अपनी तेजतर्रार पत्नी से डरना चाहिए
और डरना इसलिए चाहिए कि कहीं वो
मुझ पर 498ए दहेज एक्ट ना लगवा दें

मैं उससे डरूं……

ताकि वो अपनी घटिया सोच मुझ पर थोप सके
मुझसे मेरे माँ बाप से अलग रहने की कहे
और मैं अपने माँ बाप को छोड़ दूँ
उसकी उचित अनुचित हर बात मानू
और अन्दर ही अन्दर जलता रहूँ
लेकिन फिर भी मैं मुस्करा कर कहूँ….
कि, हाँ मैं एक पति हूँ एक अदद पत्नी का पति
आओ पत्नी साहिबा मुझे यूज करो l… …..“प्लीज़ यूज़ मी”………..

और पत्नी कुटिल मुस्कान से बोले की “मैं आजाद हूँ”
ऐ पति नामक खिलौने तुम औकात में रहना
क्यूंकि मेरे पास
498ए दहेज एक्ट का कवच है

जिससे हम महिलाएं तुम पति नामक प्राणी को
वश में कर सकती हैं अपनी ऊँगली पर नचा सकतीं हैं

इसलिए 498दहेज़ एक्ट नामक कवच से डरते हुए

मुझे उन् सारे नियमों, कायदों का अंधानुकरण करना ही है

जिन्हें बनाया गया है सिर्फ हम पतियों के लिए

इसलिए मुझे चुप रहना है और पत्नी के हर जुल्म सहना है

बिना सवाल पैदा किये हुए और मैं मुस्कराकर कहूँगा…...”मुझमें सहने की छमता है”
…..


सुनीता दोहरे
प्रबंध सम्पादक
इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज

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