sach ka aaina

अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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आखिर मैं कब तक चुप रहूंगी….

Posted On 26 Apr, 2016 Junction Forum में

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आखिर मैं कब तक चुप रहूंगी….

तुम सब मुझे परत दर परत वस्त्र विहीन किये जा रहे हो, और मैं मौन हूँ और अगर मैं मौन हूँ तो क्यूँ हूँ ? कभी जानने की कोशिश की है, नही ना l मैंने अपने कलेजे से लगाकर तुम सबको पाला है तुम्हारी हर जरूरतों को पूरा किया है अपने शरीर में दौड़ने वाली हर रग से अपना खून निचोड़ कर दिया है, लेकिन तुम सब इतने स्वार्थी हो गए हो, कि मुझी को नोचकर मिटा रहे हो मैंने तुमसे बिना कुछ लिए, अपना सर्वस्य नियोछावर किया है l इंसान यानि मानव, सबसे विवेकशील प्राणी, सभी प्रकार के प्रदूषणों की जड़ है। इस धरती नामक ग्रह पर निवास करने वाले साढ़े छ: अरब इंसान। प्रकृति के बनाये हुये सबसे विवेकशील प्राणी, जिसने अपने विवके से दूसरे जीव जंतुओं का तो जीना हराम कर ही दिया है और प्रकृति की भी नाक में भी दम कर रखा है । कहाँ कहाँ नहीं इंसानों ने गंदगी फैलाई है । चाहे वह माउंट ऐवरेस्ट हो या फिर प्रशांत महासागर । लेकिन कुदरत से इंसानों की छेड़खानी के चलते ये सिलसिला अब पलटने को है। धरती माता चीख चीख कर बता रही है कि ग्लोबल वार्मिंग यानि गर्म होती धरती को रोकने का वक्त आ गया है। वर्ना वो दिन भी आ सकता है जब हिमालय की बर्फ गल गल कर खत्म होने लगे और पूरी धरती पानी में डूबने लगे।
धरती माता अपने इन पुत्रों की करतूतों को देख कर सोचती होंगी कि हे मानव तेरी वजह से आज न जाने कितने जीव-जन्तु, पक्षी और वनस्पतियाँ या तो खत्म हो चुके हैं या फिर लुप्त होने के कगार पर हैं । तू मेरी इस कोख से जन्म न लेता तो ही ठीक था । ये दुनिया तेरे बिना ज्यादा सुंदर और शांत होती l कहते हैं कि धरती बहुत व्यापक शब्द है और इसी धरती में भयावह से भयावह भूकम्प आते हैं धरती में जल, हरियाली, वन्यप्राणी, प्रदूषण और इससे जु़ड़े अन्य कारक भी शामिल हैं। इस धरती की हवा अनमोल है यहाँ की इस हवा में पनपने वाले हर जीव की आत्मा में एक अनोखी सुगंध है l आदिकाल मे मानव को प्रकृति पुत्र कहा जाता था क्योंकि अपने जीवन निर्वाह हेतु वह पूरी तरह से  धरती की इस प्रकृति पर ही निर्भर था। प्रकृति मानव की सुरक्षा के लिए दैव निर्मित कवच था तो मानव ने इसकी रक्षा हेतु अपने आपको उसके पहरेदार के रूप मे माना था । धीरे धीरे मानव जगत मे ज्ञान का विस्तार होता गया और इस ज्ञान के कारण मानव धरती का रक्षक होने के बजाय भक्षक हो गया । कहते हैं कि जब हम धरती के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा करते है तो हम अपने अस्तित्व को भी खतरे मे डालते है क्यो कि यही हमारा एकमात्र निवास स्थल है। हम सबकी धरती मां ने अपने कोख से फल फूल, अन्न, जल, वायु आदि को जन्म दिया, वो इसलिए, ताकि सारे मानव जगत को पालती पोसती रहे। उन पर अपना सब कुछ न्यौछावर करती रहे l कहते हैं कि इस धरती के हर एक भाग में ईश्वर निवास करते हैं इसकी पथरीली चोटियाँ, वो रेतीला किनारा, हरे भरे मैदान, घने जंगलों का कुहासा, तपते सूखे रेगिस्तान, मनमोहक मैदान, लहलहाती शस्य श्यामला फसलें, पहाड़ों से उतर कर मैदानों की धरती को सींचती बहती सदानीरा नदियां, कलकल निनाद करते झरने और तट से टकराती विशाल सागर की लहरों का गर्जन सारी धरती पर जीवन का स्पंदन,  यह सब हमें विरासत में मिली है ये सभी मानव जात की स्मृति और अनुभवों में रचे बसे हैं l इसलिए यह धरती ईश्वर को परमप्रिय है, और इस धरती का तिरस्कार जो भी करेगा, तो उसे धरती का प्रकोप देखना ही पड़ेगा l जिस धरती को माता मानकर पूजने का उपदेश वेदों और ऋषियों ने दिया था वही धरती समाज में रहने वाले प्राणियों की करनी से बुरी स्थिति में है l देखा जाये तो प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण धरती का मूल स्वरूप बिगड़ता जा रहा है। हरियाली घट रही है और जलस्रोत सिकुड़ रहे हैं। हमारी धरती, विशाल अन्तरिक्ष में एक छोटी सी बिंदु के सामान है इसके अलावा कहीं औए पर जीवन नही पाया गया है केवल धरती में ही ऐसी क्षमता है जहाँ जीवन को कायम रखा जा सकता है। हमारी धरती माँ हमारे द्वारा दिए गये जख्मों को तब तक सहती है जब तक कि अति नहीं हो जाती और एक समय ऐसा आता है जब भूकम्प, ज्वालामुखी या बाढ़ के माध्यम से वो अपनी आवाज उठाती है l इन आपदाओं के पीछे छिपे अर्थ को समझने की कोशिश की जाये तो वास्तव में ये व्यथित धरती माँ का दर्द ही है जो कभी भूकम्प बनकर सब कुछ हिला देता है तो कभी ज्वालामुखी बनकर फटता है और कभी बाढ़ के रूप में पीड़ित पृथ्वी की अश्रुधारा निकल पड़ती है l भूजल दोहन और गगनचुंबी इमारतों के खड़े होने से लगातार भूकंप आने लगे हैं। सूखा और बाढ़ के रूप मे पृथ्वी लोगों के हस्तक्षेप का विरोध कर चेतावनी देने लगी है। प्रकृति के साथ बढ़ते हस्तक्षेप से अब धरती पर ही संकट बढ़ता जा रहा है। भोग के जिस मार्ग पर हम चले पड़े हैं, उसमें पृथ्वी का विनाश ही विनाश लिखा है आज इस धरती के महत्व को लोग नहीं समझ रहे हैं। हरियाली उजाड़ने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। कारखानों से निकलने वाले कार्बन और हानिकारक गैसों के चलते ओजोन परत पर खतरा बढ़ रहा है।
ये सत्य है कि धरती हम सबकी है यानि कि साझी है, इसलिए इसके सुख और दुःख भी साझे हैं तो फिर इसकी बर्बादी के दुख भी सबको एक साथ ही बांटने होंगे। धरती हमें विरासत में भरी पूरी मिली थी परंतु हमने खुद तक सीमित होकर इसके खुशहाल भंडार खुद लुटाए हैं। प्रकृति समेत हर क्षेत्र में शोषण और दोहन अस्वीकार्य कृत्य हैं और धरती के मामले में भी मनुष्य ही दोषी है। शहरीकरण का बढ़ता दायरा, बड़े बड़े कल कारखाने की स्थापना, कृषियोग्य भूमि के दायरे का बढ़ना, जिससे वन और वृक्षों की लगातार होती कटाई से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है l ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से लेकर सुनामी जैसे भयानक  तूफ़ान के  लिए मनुष्य ही ज़िम्मेदार है. धरती पर ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं कहते हैं कि प्रकृति के विविध रूप हैं। प्रकृति के सौम्य और आकर्षक रूप के अलावा इसका एक वीभत्स चेहरा भी है जिसे हम प्राकृतिक आपदाओं के नाम से जानते हैं। जैसे ज्वालामुखी विस्फोट, सूखा और समुद्री तूफान, भूकंप, सूनामी, चक्रवात, भूस्खलन, बाढ़, हिमघाव, वनाग्नि, जैसी प्राकृतिक आपदाएं व्यापक तबाही का कारण बनती हैं। भूकंप का केंद्र वह स्थान होता है जिसके ठीक नीचे प्लेटों में हलचल से भूगर्भीय ऊर्जा निकलती है। इस स्थान पर भूकंप का कंपन ज्यादा होता है। कंपन की आवृत्ति ज्यों ज्यों दूर होती जाती है इसका प्रभाव कम होता जाता है। फिर भी यदि रिक्टर स्केल पर 7 या इससे अधिक की तीव्रता वाला भूकंप है तो आसपास के 40 किमी के दायरे में झटका तेज होता है। लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि भूकंपीय आवृत्ति ऊपर की तरफ है या दायरे में। यदि कंपन की आवृत्ति ऊपर को है तो कम क्षेत्र प्रभावित होगा। भूकंप से विश्व भर में प्रतिवर्ष हजारों व्यक्तियों की मौत होने के साथ ही अरबों खरबों रुपयों की सम्पत्ति भी नष्ट हो जाती है रिक्टर स्केल पर भूकंप की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 8 रिक्टर पैमाने पर आया भूकंप 60 लाख टन विस्फोटक से निकलने वाली ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है।
ज्यादातर भूकंप रूपांतरित या फिर अभिकेंद्रित सीमाओं पर होती है। रूपांतरित सीमाओं पर दो प्लेट एक दुसरे से घिसकर जाते हैं। इस घर्षण के कारण दो प्लेट के सीमा पर तनाव उत्पन्न होता है। यह तनाव बढते बढते ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जब भूगर्भीय पत्थर इस तनाव को झेल न पाने के कारण अकस्मात टूटते हैं। तनाव उर्जा का यह अचानक बाहर आना ही भूकंप को जन्म देता है।
अगर भूकंप की गहराई उथली हो तो इससे बाहर निकलने वाली ऊर्जा सतह के काफी करीब होती है जिससे भयानक तबाही होती है। लेकिन जो भूकंप धरती की गहराई में आते हैं उनसे सतह पर ज्यादा नुकसान नहीं होता।
कार्बन डाईऑक्साइड गैस की मात्रा बढ़ने से वातावरण प्रदूषित हो रहा है। इससे तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। कंक्रीट के जंगल बढ़ने से वाटर रिचार्ज कम हो रहा है। जल दोहन बढ़ने से ग्राउंड वाटर लेबल लगातार गिर रहा है। कीटनाशकों और रसायनों के बढ़ने से उर्वरा शक्ति घट रही है। ऐसे में धरती के अंदर उथल पुथल शुरू हो गई है भूगर्भ में प्लेटों में खिंचाव आने से लगातार भूकम्प आने लगे हैं पृथ्वी के स्वरूप में आ रहे बदलाव से कभी भी बड़ा संकट आ सकता है अगर ग्लेशियरों की स्थिति में बदलाव आया तो धरती नहीं बचेगी। इसके लिए सामाजिक संगठनों को शासन प्रशासन के साथ मिलकर अभियान चलाना होगा l इसके लिए तत्काल जागरूक होने की जरूरत है। पृथ्वी अपने साथ हो रहे हस्तक्षेप को ज्यादा सहन करने की स्थिति में नहीं है। अब लोगों को हरियाली और जल संचय बढ़ाने के लिए तत्काल खड़ा होना होगा और साथ ही हमें प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित करना होगा। सच पूछिए तो आज धरती को बचाने के लिए एक व्यापक मुहिम की जरूरत है। धरती को बचाने का आशय है इसकी रक्षा के लिए पहल करना। क्यूंकि न तो धरती को लेकर कभी सामाजिक जागरूकता दिखाई गई और न राजनीतिक स्तर पर कभी कोई ठोस पहल की गई। धरती पर जीवन की हलचल को बनाए रखने के लिए हमें इन जीवों की रक्षा करनी होगी तभी यह प्यारी और निराली धरती कहलाएगी।  हमारी सभ्यता के विकास के साथ शहर बढ़ते गये, जीवों के घर उजड़ते गये, कारखानों, फैक्ट्रियों, मोटरकारों ने हवा में जहरीला धुँआ उगल उगल कर उसे दूषित कर दिया है शहरों में हवा सांस लेने लायक नहीं रही। हवा में हर रोज लाखों टन विषैला धुआं घुल रहा है। विषैली गैस कार्बन डाइआक्साइड के बढ़ने से गर्मी बढ़ती जा रही है क्योंकि इसकी परत आसमान से गर्मी को पृथ्वी की ओर वापस भेज देती है। यही ‘ग्लोबल वार्मिंग’ यानी वैश्विक तपन है। इस कारण कल ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी। नदियों में बाढ़ आएगी। सागरों में पानी बढ़ेगा और सागरतटों के शहर डूब जाएंगे।
हमारी पृथ्वी एक क्रियाशील ग्रह है और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्लेट विवर्तनिकी ने अतीत और वर्तमान की सभी भौगोलिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। वास्तव में यह संकेत करता है कि पूरी धरती की सतह लगातार परिवर्तित हो रही है। क्यूँ ? क्यूंकि विकास के नाम पर हमने इसका चप्पा चप्पा निर्माणों से भर दिया है और धीरे धीरे इसमें कुछ रखने या बनाने की जगह नहीं बचेगी हम लोगो ने अपनी जरुरतो को पूरा करने के लिये अपनी धरती, वायू, पानी सब को बर्बाद कर दिया है और करते जा रहे है । यदि परिस्थितियों में सुधार नहीं होता है तो आने वाले समय में जीवन के लिए अनिवार्य वनस्पति और परिस्थितियां ही शेष नहीं रह जाएंगी। इससे वैश्रि्वक अस्थिरता का माहौल बन जाएगा। और प्राकृतिक संपदा का जरूरत से ज्यादा दोहन भविष्य में पृथ्वी ही नहीं मानव जाति के विनाशकारी अंत का कारण साबित होगा।
अब समय आ गया है कि सब यह तय करें कि हमारी आवश्यकतायें क्या हैं और परम आवश्यकतायें क्या हैं। हमें प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी जीवन शैली में बहुत बड़ा परिवर्तन लाना होगा और साथ ही यह भी समझना होगा कि समय की दौड़ में हम प्रकृति के साथ साथ चलें, नही तो हमारी सुंदर धरती बंजर और बेजान हो जायेगी l पृथ्वी और उसके पर्यावरण को बचाने के लिए विश्वभर में सभी लोग ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाएँ, पॉलीथीन का प्रयोग तुरंत बंद करें l संयम और सादगी को अपनाते हुए खानपान संतुलित रखें, पानी की एक एक बूँद कीमती है ऐसा सोचकर ही पानी का उपयोग करें और पानी को बचाने का हर संभव उपाय करें.

सुनीता दोहरे
प्रबंध संपादक
इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज़

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashasahay के द्वारा
May 5, 2016

सार्थकऔर सामयिकवैश्विक समस्या पर प्रकाश डालता हुआ आलेख। अत्यधिक उपयोगी।

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 6, 2016

    आदरणीय ashasahay जी, आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम

Shobha के द्वारा
May 4, 2016

अति सुंदर भावना प्रधान लेख सुनीता जी

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 4, 2016

    आदरणीय Shobha दी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 29, 2016

    आदरणीय डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी, मेरे विचारों को आज की बुलेटिन मुद्दे उछले या कि उछले जूते – ब्लॉग बुलेटिन में शामिल करने के लिए आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
April 28, 2016

सुनीता जी. आपने बिगड़ते पर्यावरण पर गहराई से प्रकाश डाला है.परन्तु देखा गया है की आम व्यक्ति इन सब से अंजान ही बना रहता है वह स्वयं कोई भी सावधानी रखने को तैयार नहीं है.

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 28, 2016

    आदरणीय SATYA SHEEL AGRAWAL ji आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
April 27, 2016

मनुष्य बहुत भूखा होता है उसकी महत्वाकांक्षाएं कभी भी पूरी नहीं होती हैं | संतोषी होना उसका स्वभाव नहीं होता । मां तो मां होती है वह सब कुछ सहती रहती है तभी तो ओम शांति शांति होती है

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 28, 2016

    आदरणीय PAPI HARISHCHANDRA ji आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l


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