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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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मैं एक वैश्या हूँ और विश्वास कीजिए मैं अभी तक कुंवारी हूँ …”एक कहानी”

Posted On 4 Apr, 2016 में

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“मैं एक वैश्या हूँ और विश्वास कीजिए मैं अभी तक कुंवारी हूँ …….. एक कहानी

वेश्यावृत्ति क्या है, वेश्यावृत्ति की परिभाषा क्या है । –  पैसों के लिए शरीर को किसी ऐसे व्यक्ति को सौंपना जिसे हम पसंद नहीं करते। इस क्रिया में आनंद नहीं है – उस व्यक्ति के लिए तो बिल्कुल नहीं जो अपना शरीर सौंपता है.
कोई भी शौक़ से वेश्या नहीं बनती। ग़रीबी, मजबूरी औऱ दबंगों की वजह से उन्हे देह का धंधा करना पड़ता है। तमाम तरह की पीड़ाओं को झेलकर ही वो देह का सौदा करने पर मजबूर हुई है। इसलिए कोई भी उसे वेश्या न माने।
समाज के लोग वेश्याओं को घृणित नजरों से देखते हैं, लेकिन फिर भी समाज को चलाने वाले कई बाशिंदे इनके पास जाकर माथा जरूर टेकते हैं। देखा जाये तो आज नेक, ईमानदारी, सचरित्रता और नैतिकता का युग नहीं, बल्कि बेईमानों, गैरजिम्मेदारों, ऐयाशों और कामचोरों जैसे अव्यवस्थाओं से भरा दूषित समाज का है। एक ओर मिनिस्टर, कमिश्नर, कलेक्टर, व्यवसायी, अध्यापक, नेताओं और बड़े-बड़े स्टॉकिस्टों ये सभी सुरा और सुन्दरी, भ्रष्टाचार, डकैती, घूस, नग्न नृत्य आदि का पोषण करते आ  रहे है।  नेता, अभिनेता और धर्माचार्य भी इस धंधे को चला रहे हैं। आप ये तो मानते ही होंगे कि स्त्री हो या पुरुष, काम हर स्वस्थ शरीर की भूख है। चाहे न चाहे दोनों को एक दूसरे के पास काम पूर्ति हेतु आना ही पड़ता है। कहते हैं कि विवाहित जीवन में सेक्स का बहुत बड़ा महत्त्व होता है कि इसी चट्टान के मारे कितने सारे घर बनते हैं और बने हुए घर टूट भी जाते है। मज़बूरी में बनी एक वैश्या जो रात को ग्राहक का इंतजार कर रही हो, उसका दर्द और परेशानियां आप कैसे समझ सकते हैं। अंधेरी रात में मखमली बिस्तर में सोने के बजाय इन लोगों ने यह रास्ता क्यों चुना ? वे मजबूरी में या स्वेच्छा से पैसों की खातिर अपना शरीर बेचती हैं, हम सब भी मजबूरी में या स्वेच्छा से पैसों के लिए अपना समय, अपना हुनर, अपनी सेवाएं, यहां तक कि अपना ईमान बेचते हैं। दोनों में कोई फर्क नहीं है सिवाय इसके कि वेश्याओं को यह सभ्य समाज नीची नज़रों से देखता है और हम और आप जैसों को इज़्जत से l वेश्‍यावृत्ति भले ही समाज की कुरीति में गिनी जाती है, लेकिन मुश्किल समय में इसी कुरीति के घर ने रुक्मणी का साथ दिया था । एक बार अगर कोई औरत इस दलदल में फंस गई तो इसका यहां से बाहर निकल पाना मुश्किल होता है। वहीं सालों से रहने वाली औरतों ने देह व्यापार को ही जिंदा रहने का और इस जगह पर जिंदगी बिताने की मंजिल समझ ली है। औरत चाहे वैश्यावृति करे या वेश्याओं के नजदीक रहे, लेकिन समाज उन्‍हें घृणित नजरों से ही निहारता है l यहाँ हर महिला की अलग ही कहानी होती है। इन वेश्‍याघरों के अंदर का नजारा देखकर शायद आपकी आंखें भर आए। यहां काम करने वाली वेश्याएं अपने बच्‍चों को भी अपने साथ यहीं पर रखतीं हैं। समाज की विसंगतियों से दूर इन महिलाओं के अपने ही मासूमों के सामने खुलेआम अपने जिस्‍म का सौदा करना कितना कठिन होता होगा। जरा आप आंख बंद करके सोचिए । अनेक मजबूरियों से उपजी पीड़ा भरी कथाएं वेश्याओं की कथाओं में मिलती हैं l एक ऐसी ही घटना से आपको अवगत कराना चाहती हूँ l……..
यूं ही आधे अधूरे ख्वाबो की खेती हैं ज़िन्दगी,
पूरे होने की चाह में चल रही है ऐ मौत तेरी बंदगी l

शाम की ढलती धूप में मीतू एकटक खुले आसमान को निहारे जा रही थी l मीतू एक ऐसा किरदार है जिसने अपने महबूब को टूट कर प्रेम किया है l रोज़ ढलती शाम उसे बैचेन कर देती है l मीतु को गुलाब के पुष्पों से बेहद प्यार है वो अक्सर अकेले में उनसे बातें करती रहती है l सुर्ख लाल गुलाब को अपने हांथों में लेकर मीतु बुदबुदाते हुए बोली !
विजय ! तुम तो कहते हो कि “जिस्म की छुअन के बिना रूह की छुअन बेमानी है”
लेकिन मैं कहती हूँ कि इश्क पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी की तरह है जो सूरज की सुनहरी धूप में नहाई हुई है और उस पर गिरती स्वेत, चमकदार बर्फ जो अद्भुत और अनछुई है जिसकी कल्पना मात्र से मन खिल जाता है l जिसमें जिस्म की छुअन से ज्यादा मन की छुअन महसूस होती है l सुनो विजय, मैंने तो तुम्हारे नाम की सुन्दरता और मधुरता को ही अपना महबूब मान लिया है जब से तुम मेरी दुनियां में आये हो, तबसे मैंने इस धरती की हर उस चीज से प्रेम किया है l जिसे तुम प्रेम करते हो और जो तुमसे जुडी है l ये चारों तरफ बिखरी हरियाली मेरे मन को प्रफुल्ल्ति करती है मैंने इस हरियाली से प्रेम किया है, ऐ खिलते हुए सुर्ख गुलाब ! अगर मैं सच कहूँ तो, जब मेरे महबूब के नैनो में प्रेम उतरता है तो इस पूरी कायनात में बसंत उतर आता है l
दूर आकाश में उड़ते हुए परिंदे ऐसे लगते हैं मानो यूँ कह रहे हो “आओ इस आकाश को अपनी बांहों में समेट लें कितना खुलापन और सुकून है इस नीले आसमान में”
कभी धरती के आंचल में समां जाएँ, कभी अपनी महबूब के नैनों में उतर जाएँ l
एक आह सी भरते हुए मीतू चहलकदमी करने लगी l अचानक आँखों के आगे कुछ धुंधली यादे करवटें बदलने लगीं l सोचते सोचते मीतू की आँखों में आंसू छलक आये, दुपट्टे के कोने से आँखों को पोंछती हुई मीतू अपनी पिछली जिन्दगी के पन्ने पर्त् दर पर्त् पलटती चली गई l
मीतू के पिता नहीं थे लेकिन, मीतू की माँ रुक्मणी ने मीतू को शुरू से ही हॉस्टल में रखकर पढाया था l मीतू को रुक्मणी कभी भी छुट्टियों में घर नही बुलाती थी, बल्कि हर साल की छुट्टी में उसको लेकर वो किसी पहाड़ी इलाके में घूमने चली जाती थी, ताकि मीतू रुक्मणी के काम बारे में कुछ जान ना पाए l रुक्मणी मीतू की हर इक्षा को पूरा करने की भरसक कोशिश करती l कभी भी उसे कोई कमी महसूस नही होने देती l कभी कभी रुक्मणी सोचती कि……..
क्यूँ रब ने मेरी खबर ना ली, काँटों पे हर पल सोये हम
जब जब हुई ईद, दिवाली और खिली जब रंग से होली
हमने हर रिश्ते को नंगा देखा, और फफक के रोये हम
मैं बावरी रोती घूमी, हे रब क्यूँ इन सबकी लगे है बोली….
….
मीतू की पढ़ाई पूरी होने के बाद मीतू को सत्तर हजार रूपये महीने की सैलरी वाली अच्छी  नौकरी भी मिल गई थी मीतू जिद करने लगी, कि माँ इस बार घर चलेंगे l रुकमनी ने लाख समझाया पर मीतू की जिद के आगे रुक्मणी की एक ना चली l और मीतू अपनी माँ के साथ घर चल दी l स्टेशन से घर पॉंच किलोमीटर की दूरी पर था दोनों ने ऑटो किया और पहुँच गई l ऑटो ड्राइवर ने रूपये लेते वत कहा कि क्यूँ रुक्मणी क्या बेटी को भी वही करवाओगी जो तुम कर रही हो ? रुक्मणि कट कर रह गई कुछ ना सूझा, तो बोली !
फ़ालतू की बकवास मत करो अपने काम से काम रखो l रूपये देने के बाद रुक्मणी ने सोचा बेटी आई है थोडा सामन ले लूँ l इसलिए वो दुकान पर गई, सामान देते समय दुकानदार बोला ! रुक्मणी बिटिया को यहाँ क्यूँ लाई हो, इसे तो अपने धंधे से दूर ही रखना l इस एरिये में भेडिये आते हैं कहाँ तक छुपा के रख पाओगी l जल्दी ही भेज दो l तब तक पीछे से एक आदमी बोला क्यूँ रुक्मणी कितने लोगी इसके, एक सेठ है एक घंटे की अच्छी कीमत मिल जाएगी l रुक्मणी को काटो तो खून नही, ऐसी हालत हो गई थी रुकमणी की l तब तक मीतू सब समझ चुकी थी कि माजरा क्या है l उसने माँ से कहा ! “माँ यहाँ से चलो”…
रुकमणी नजरे नीची किये चुपचाप चली जा रही थी और मीतू एकदम झील की तरह शांत l मीतू ने देख सुनकर भी अनदेखा कर दिया था, जैसे कुछ हुआ ही ना हो l
घर आकर वो माँ “रुकमणी” से बोली l माँ मैंने जो सुना है क्या वो सही है ?
रुक्मणी फफक फफक कर रो पड़ी l और बोली ! हाँ मैं एक वेश्या हूँ,
बेटी मेरा भी घर था तेरे पापा तेरी दादी दादा के साथ हरिद्वार गंगा मैया के दर्शन को गए थे एक रोड एक्सीडेंट में सबकी मृत्यु हो गई थी, तब तू मेरे पेट में 1 महीने की थी, इसलिए तेरे पापा मुझे नहीं ले गए थे l काश मैं भी चली जाती उनके साथ, तो आज इतने दुःख ना झेले होते l
तेरे चाचा ने घर से बेघर कर दिया, कहाँ जाती कोई ठिकाना ना था l मायके के नाम पर एक छोटी बहिन थी जो अपने परिवार में व्यस्त थी l खाने को कुछ भी ना था, कहीं कोई काम ना मिला, एक सेठ के यहाँ घर देखभाल का काम मिला, तो वही सेठ नीच निकला, मैंने अपनी इज्जत गँवा दी रोते रोते सडक पर जा रही थी, एक आदमी औरत ने अपने घर में पनाह दी, बाद में पता चला कि वो एक कोठा है जहाँ तन का कारोबार होता है l वहां मैं साफ़ सफाई और 14 लोगों का खाना बनाने का काम करती आ रही हूँ l मेरी मेहनत से खुश होकर मालकिन ने एक खोली दे दी, जिसमें मैं रहने लगी l तेरे पैदा होने के बाद मैं तुझमे ऐसी रम गई, कि आगे का कुछ सोचा नही l लोग मुझे भी तवायफ समझने लगे, क्यूंकि मैं रह ऐसी जगह पर रही थी जहाँ जिस्मों का व्यपार होता था l दिन बीतते गए मैंने सोचा जब तू बड़ी होगी, तो तेरे साथ यहाँ से चली जाउंगी l मैंने यहाँ दुनिया का अजब दस्तूर देखा है बेटी ! जो ऊँचे ऊँचे मंचों पे चढ़कर नारियों के हक के लिए चिल्लाते हैं, वही सफेदपोश यहाँ अक्सर इन वेश्याओं के क़दमों में गिरे नजर आते हैं l अपने आपको और तुझे पवित्र रखने के चक्कर में मैंने बहुत कुछ सहा है l इतना सहने पर भी दर्द का एक आंसू न गिरा, लेकिन आंसू उस दिन बह निकले थे, जब बेटी तूने मेरी कोख से जनम लिया था l दिल ये सोच कर सिहर गया कि ये नन्ही परी जैसे-जैसे बड़ी होगी वैसे वैसे दुनिया की वहशी नज़रें इस पर पड़ेंगी l यही सोच कर मैंने ममता का गला घोंट दिया और तुझे इस शहर से दूर पढने भेज दिया l
सिसक सिसक कर रुक्मणी आज सब कुछ कह देना चाहती थी इसलिए बोले जा रही थी l बेटा, अब  अपने कई ख्वाबों के पूरे और कुछ अधूरे छोड़ने वाली जिंदगी की लम्बी पारी खेलने के बाद भी यह लगता है कि जैसे उपलब्धि के नाम पर पास में सिर्फ शून्य ही शेष रह गया है l पर जब दूसरे नजरिये से देखती हूँ, तो मेरी बेटी ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है जो मेरे जीने की बजह है l अगर तुमने मुझे गलत समझ लिया, तो मेरे पास शून्य ही शेष रहेगा l
बेटी ने माँ के गले से लग गई और बोली ! माँ तुम तो महान हो, तुमने मेरे कैरियर वो उडान दी है, जिसकी उम्मीद उन हालातों में कभी कोई कर नहीं सकता, तुमने मेरे लिए कितने दुःख झेले हैं, मुझे इस दलदल से दूर रखा, मेरी जिन्दगी बना दी और खुद जलतीं रही इस आग में l अब और नहीं माँ l अब आपकी बेटी सक्षम हो गई है अपनी माँ का ख्याल रखने के लिए l यहाँ की हर याद मिटा दो हर दर्द को भूल जाओ और मेरे साथ चलो l अपना सब कुछ पीछे छोड़कर रुक्मणी और मीतू नए शहर में रहने आ गये l जिन्दगी अच्छी खासी चल रही थी इसी बीच एक नवयुवक ने मीतू की जिन्दगी में प्रवेश किया l मीतु उसे बेईतहाँ प्रेम करती थी, रुक्मणी ने भी सोचा अब मीतू की शादी कर देते हैं l रुक्मणी ने विजय को घर मिलने के लिए बुलाया और अपनी बेटी के रिश्ते की बात की l विजय बोला, माँ ! मैं अपने परिवार वालों से बात करके उन्हें बुला लेता हूँ l विजय भी अपने माँ बाप से शादी की बात करने घर चला गया था.
विजय के माँ बाप आये l उन लोगों ने मीतू को पसंद भी कर लिया, लेकिन रुकमणी को देखकर विजय के पिता के होश उड़ गए उस समय सबके सामने तो विजय के पिता ने कुछ ना कहा, लेकिन मीतू और विजय को बात करने के लिए बाहर भेजकर विजय के पिता रुक्मणी से बोले ! तुम रुक्मणी हो ? रुक्मणी कुछ कह ना सकी, धीरे से सर हिला दिया और अपने आंसुओं का गला घोंट लिया l रुक्मणी डर से थर थर काँप रही थी, अपनी बेबसी पर वो रो भी नहीं सकती थी, क्यूंकि विजय के पिता ही वही सेठ थे जिसने उसकी इज्जत लूटी थी l कुछ बोलती है तो, बेटी की खुशियाँ छिनती हैं l इतना लाचार तो उसने अपने आपको कभी महसूस नही किया था l
विजय के पिता बोले “तुम तो एक वैश्या हो, मेरे बेटे से तुम्हारी बेटी की शादी नहीं हो सकती l”
रुक्मणी की सहन शक्ति समाप्त हो चुकी थी वो बिफर कर बोली, सुनो सेठ ! “वैश्या शब्द तो फिर भी अच्छा है तुम अपने घिनौने मुंह से इस नाम को अपवित्र ना करो l वैश्या शब्द इस समाज के लिए और तुम्हारे लिए एक गाली अवश्य होगा, लेकिन ये हमारे लिए समय की एक कैद थी, एक अवस्था थीl एक वो अवस्था जहाँ हम हारे हुए, डरे हुए और  कैद थे l जहाँ जीवन एक पहाड लगता है और मजबूरी अस्तित्व का दूसरा नाम है l हर कदम जहाँ परतंत्र है और समर्पण जीवन की पहली और अंतिम शर्त होती है l
सेठ जी ! ये तो सूना ही होगा कि “मौत जिंदगी का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है l ईश्वर ही जानता है शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मैंने पवित्रता की सीमा नहीं लांघी, लेकिन मृत्यु के बाद तो शरीर अपवित्र हो ही जाता है l अगर कोई जलाए न, तो सड़कर मिटटी ही बन जाता है और ऊपर जाने के बाद आज तक तो कोई वापिस लौट कर आया नहीं, इसलिए बंदगी करना ही सही है और हम आज तक अपने पेट के लिए बदगी ही कर रहे हैं l मुझे उन्ही वैश्यायों ने पनाह दी थी जब में भूख से बिलख रही थी और जब तूने मुझे किसी लायक नही छोड़ा था l आज तू अपने बेटे से नजर नहीं मिला सकता l देख ऊपर वाले का खेल, वो तेरे कर्म यही पर दिखा रहा है जिसको तूने दर दर भटकाया था आज उसी की बेटी तेरे सामने सवाल बनकर खड़ी है l
विजय और मीतू को आता देख दोनों चुप हो गए l सब इस तरह से व्यवहार करने लगे जैसे कुछ हुआ ही ना हो l थोड़ी देर में सब चले गए l माँ बेटी दोनों ने शांति से चाय पी और अपने अपने काम में लग गई लेकिन, मीतू की नजरे मोबाइल पर ही टिकी थीं l वो सोच रही थी, कि अभी तक विजय का फोन क्यूँ नही आया l
एकाएक सन्नाटे को चीरती हुई मोबाइल की आवाज़ ने दिल धड़का दिया मीतू ने झपटकर फोन उठाया और बोली… विजय तुमने इतनी देर क्यूँ लगा दी फोन करने में ?
मोबाइल के स्पीकर से आवाज़ आ रही थी मीतु तुम मेरे लायक नही हो, तुम्हारा खानदानी पेशा मुझे पता चल गया है, मुझे तुम भूल जाओ…. मैं तुमसे शादी नही कर सकता l मैं भी तुम्हे भूलने की कोशिश करूँगा l
एक झन्नाटेदार थप्पड़ सा लगा मीतू के विश्वास को l भयंकर चीत्कार करती हुई वो कटे पेड़ सी सोफे पर गिर पड़ी l माँ तुम कहाँ हो ?
मीतू धीरे धीरे बुदबुदा रही थी अगर तुम कहते हो तो, “हाँ मैं एक वैश्या हूँ, “हाँ मेरी मां वैश्या थी, हाँ मैं वैश्या की बेटी हूँ, लेकिन मैं एक देवी की तरह पवित्र हूँ, विश्वास कीजिए मैं अभी तक कुंवारी हूँ……..
रुक्मणी दौड़ कर आई अपनी बेटी की हालत देखकर वो बेहोश हो गई l
सोफे पर उसका एक हाँथ सीने पर रखा हुआ था दूसरा नीचे झूल रहा था और साथ ही झूल रहा था उसकी बेटी का भविष्य अँधेरे में l रुक्मणी के चेहरे की कैफियत एक सच्चाई बयां कर रही थी l उसकी प्रार्थना उसकी मन्नतें सब निराशा के भंवर में डूब गई थीं, उसकी बेटी का विश्वास पतझड़ के पत्तों की तरह झड गया था सूखे पेड़ की क्या अहमियत होती है वो बखूबी जान गई थी l

सुनीता दोहरे
प्रबंध सम्पादक
इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज़

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
April 11, 2016

सुनीता दोहरे जी अच्छी भावपूर्ण कहानी लिखी है आपने । यह एक ऐसा विषय है जिस पर बहुत कुछ सोचा जाना अभी शेष है ।

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 12, 2016

    आदरणीय एल.एस. बिष्ट् जी सत्य कहा आपने l आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

Rajiv Kumar Ojha के द्वारा
April 9, 2016

सुनीता जी ऍ आपको साधुवाद ! आपने बहुत सुन्दर लिखा है ,सफेदपोशों के दोहरे चरित्र को बेनकाब किया है। रुक्मणी के अंतर्मन की हृदयस्पर्शी व्यथा को कहानी के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की है। आपकी इस बात से मैं सहमत हूँ की “वे मजबूरी में या स्वेच्छा से पैसों की खातिर अपना शरीर बेचती हैं, हम सब भी मजबूरी में या स्वेच्छा से पैसों के लिए अपना समय, अपना हुनर, अपनी सेवाएं, यहां तक कि अपना ईमान बेचते हैं। दोनों में कोई फर्क नहीं है”

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 10, 2016

    आदरणीय Rajiv Kumar Ojha ji सर , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 10, 2016

    आदरणीय डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंग ji सर , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

vaidya surenderpal के द्वारा
April 7, 2016

बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी कहानी।

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 10, 2016

    आदरणीय vaidya surenderpa ji सर , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
April 7, 2016

सुनीता जी बहुत ही मार्मिक वर्णन …| संस्कार वान हर नारी यही सोचती है………….मेरी बगिया के फूल तुम सदा ही खिलना ,जिन राहों पर चली थी मैं तुम उन पै ना चलना ,तेरा ना हो मेरे जैसा हाल …………ओम शांति शांति

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 10, 2016

    आदरणीय papi harishchandra ji सर , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

sadguruji के द्वारा
April 7, 2016

आदरणीया सुनीता दोहरे जी ! एक बहुत अच्छी कहानी की प्रस्तुति हेतु आपका बहुत बहुत अभिनन्दन ! आज भी हमारे समाज में ऐसा हो ही रहा है ! अब कोई किसी से सच्चा प्रेम नहीं करता है ! हर तरफ बस स्वार्थ, दौलत के पीछे भागमभाग और हर समय मन में उठने वाली भोग-विलास की भावना लोंगो के दिलों पर हावी है ! सादर आभार !

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 10, 2016

    आदरणीय sadguruji सर , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

jlsingh के द्वारा
April 5, 2016

कहानी रूप में अति संवेदनशील है, पर हो सकता है ऐसे वाकये होते होंगे. इस संसार में कुछ भी संभव है आदरणीया आपने एक संवेदनशील मुद्दे को उठाया है. ईश्वर ने औरत को कमजोर बनाया है. मर्द क्यों नहीं बदनाम होते?

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 5, 2016

    आदरणीय jlsingh सर , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

Shobha के द्वारा
April 5, 2016

प्रिय सुनीता जी बहुत दर्दीली दास्तान ही लिखूंगी अंदर तक आपके लिखने के ढंग से हिल गई|

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 5, 2016

    आदरणीय Shobha दीदी, आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम l

pkdubey के द्वारा
April 5, 2016

आदरणीया सादर आभार ,बहुत अद्भुत कहानी ,पर जिस्म से रूह तक की यात्रा करना बहुत कठिन है,बहुत अनुभव एवं तपस्वी गुरु की कृपा से ही यह संभव है -तभी तो कबीर दास जी ने कहा -|| सीस देय जो गुरु मिले ,तो भी सस्ता जान ||

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 5, 2016

    pkdubey जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर नमस्कार l


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