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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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अपने दायित्वो को समझिये …..

Posted On 30 Mar, 2016 में

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अपने दायित्वो को समझिये

आज के माहौल में चारों और आग की लपटें ही लपटें हैं, और हम सब अपने आपको काठ के घरों में महफूज होने की सोच लिए जी रहे हैं हर दिन व्यक्ति ज्यादा क्रूर और हृदयहीन होता जा रहा हैं, रोज फेसबुक पर एक से एक वीभत्स तस्वीरें देखने को मिल जातीं है रूह काँप जाती है देखकर। अब तो अपने इंसान होने पर शर्म आती है एक ओर संसार को धर्म नामक कीड़ा खाए जा रहा है, दूसरी ओर से राजनीति की बर्बरता अवाम को नष्ट कर रही है एक अजीब सी निष्ठुर असंवेदनशीलता सामाजिक रिश्तों में उतरती जा रही है। लोग क्यों नहीं देख रहे कि वे खुद का ही नाश किये जा रहे हैं? आज के जमाने में सभ्यता एक भ्रम बनकर रह गयी है, हम कल भी एक जानवर थे आज भी एक जानवर ही हैं हमारा सारा ज्ञान सारी तकनीक खुद को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने का औजार मात्र भर हैं हम आज भी जानवरों की तरह अपने अस्तित्व की लड़ाई ही लड रहे हैं बस आधुनिक तकनीक ने शास्त्रों की मारकता बढ़ा दी है घर्म के नाम पर जो भी अनैतिक काम करने वाले की धूम मची हुई है वहीँ दूसरी तरफ जनता के हित के नाम जनता को ही लूटा जा रहा है सच तो ये है कि सच्चा घर्म और सच्ची राजनीति किसी कोने मे धकेल दिये गये है। स्वर्ग या नर्क दूसरी दुनिया में है या नही यह तो मैं नही जानती लेकिन हम इंसानो ने इस स्वर्ग नुमा धरती को नर्क मे तब्दील करने मे कोई कोर कसर नही छोड़ी है। जिस खुले अर्थतंत्र को हमने अपने विकास की रीढ़ बनाया है और जिससे गरीबी और बेरोजगारी के उन्मूलन की बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई थीं, वह इस समय के अर्थ विशेषज्ञों और स्वयं सरकारी तंत्र के जिम्मेदार लोगों के अनुसार क्रोनी कैपिटलिज्म’ या लंपट पूंजीवादों का पोषक है इसने हर स्तर पर आर्थिक असंतुलन, भ्रष्टाचार, परिवारवाद और विषमताओं को बढ़ाया है। अब सवाल ये उठता है कि क्या देश आपका नहीं है? या फिर राज्य आपका नहीं है? अब इस सवाल का संवैधानिक जवाब भले हां हो लेकिन इस भ्रष्ट राजनीति के चलते आप लोगों से इस बात का जवाब हाँ मनवाना आसान नहीं है क्योंकि जाति धर्म की राजनीति का जहर कुछ लोग इस कदर फैला रहे हैं कि उसके बीच से निकलता हर रास्ता विषैला लगने लगता है। भ्रष्ट अर्थतंत्र और भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र ने भ्रष्टाचार को प्रशासनिक तंत्र में पंचायत से लेकर केंद्रीय सचिवालय तक अपनी पैठ दिला दी है जिसके चलते वास्तविक सत्ता बेईमान और चोर-उचक्कों को हस्तांतरित कर दी गयी है, जिससे मेहनतकश ईमानदार लोगों का जीवन आपाद संकटग्रस्त हो गया है, क्या आपको नहीं लगता कि अब उस सर्वव्यापी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की कोई मुहीम छेड़ी जाये?
मैं गलत नहीं कह रही हूँ सब कुछ आपके सामने है पूरे देश सहित छोटे-बड़े शहर जिस तरह व्यापक अराजकता का शिकार हुए हैं, औरतों-बच्चियों के प्रति हिंसा और बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है, व्यापक हिंसक अपराधों के चलते आम जनजीवन असुरक्षित है, बिजली, पानी, सड़क और सामान्य जनसुविधाओं का संकट लगातार गहरा रहा है, तांत्रिकों, झूठे मक्कार बाबाओं जैसे घृणित व्यक्ति जो अपने आपको बाबा के नाम से बुलवाते हैं इन जैसे दुष्टों के चोले में ठगों की एक पूरी फौज आम लोगों को बरगला कर उनका आस्थाजन्य शोषण कर रही है,  ये पापी आवाम को धर्मभीरु- कायर-भाग्यवादी बनाकर उन्हें कर्मच्युत कर उनका जीवन नष्ट करने पर उतारू हैं और स्वयं अरबों-खरबों के खेल को खेल रहे है, मुझे नही लगता कि इस महामारी का कोई वास्तविक उपचार किये बिना इसे दूर किया जा सकता है। क्या हमने कभी अपने दायित्वों के बारे में कुछ सोचा है? नहीं न। लेकिन आज अपने दायित्यों के बारे में सोचने की आवश्यकता है यदि हम सब देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने लगें तो दुनिया की कोई ताकत हमारे सामने खड़ी नहीं हो सकती। हाँ में मानती हूँ कि ये सारी जिम्मेदारी सिस्टम की है लेकिन हमारे दायित्व क्या हैं? क्या समाज के लिए हमारा कोई सरोकार नहीं है? क्या हमारी यह सोच सही मानी जा सकती है कि अधिकार हमारे और कर्तव्य सिस्टम के? आप सभी लोग इस बात से भली भांति परिचित हैं कि भारत के अस्तित्व से जुड़े सवालों के जवाब में सिर्फ वादे और आश्वासन परोस दिए जाते हैं। जब न वादे पूरे होते हैं न आश्वासन, तो फिर नए सिरे से नए वादे, नए आश्वासन गढ़ लिए जाते हैं। इसलिए आगे आइये और एक नए भारत का निर्माण करने में अपना योगदान दीजिये जिस दिन हम अधिकारों और कर्तव्यों में सही तालमेल बिठा पायेंगे उसी दिन समाज की ज्यादातर समस्याएं अवश्य दूर हो जाएंगी। अगर आवाम जाग गयी तो सिस्टम दुरुस्त होते देर नहीं लगेगी। अगर अवाम हाँथ पर हाँथ धरे बैठी रहेगी तो सरकार क्या कोई भी कुछ नही कर सकता। इसलिए अपने दायित्वो को समझिये पूरे परिवार को समझाइये, उन भ्रष्ट व्यक्तियों को सबक सिखाइए जिन्होंने इस देश की गरिमा को धूमिल किया है और कर रहे हैं ।….

सुनीता दोहरे
प्रबंध संपादक
इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज़

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

juranlistkumar के द्वारा
April 2, 2016

एकदम सटीक चित्रण किया है आपने जैसे कि “एक ओर संसार को धर्म नामक कीड़ा खाए जा रहा है, दूसरी ओर से राजनीति की बर्बरता अवाम को नष्ट कर रही है एक अजीब सी निष्ठुर असंवेदनशीलता सामाजिक रिश्तों में उतरती जा रही है। लोग क्यों नहीं देख रहे कि वे खुद का ही नाश किये जा रहे हैं? आज के जमाने में सभ्यता एक भ्रम बनकर रह गयी है, हम कल भी एक जानवर थे आज भी एक जानवर ही हैं हमारा सारा ज्ञान सारी तकनीक खुद को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने का औजार मात्र भर हैं हम आज भी जानवरों की तरह अपने अस्तित्व की लड़ाई ही लड रहे हैं बस आधुनिक तकनीक ने शास्त्रों की मारकता बढ़ा दी है घर्म के नाम पर जो भी अनैतिक काम करने वाले की धूम मची हुई है वहीँ दूसरी तरफ जनता के हित के नाम जनता को ही लूटा जा रहा है  ! ” सच कहा आपने सुनीता दोहरे जी l

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    April 5, 2016

    juranlistkumar आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर नमस्कार l

    Govind Bharatvanshi के द्वारा
    April 6, 2016

    poorn sahmati aadarneeyaa !


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