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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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नारी हृदय की अंतहीन सीमारेखा

Posted On: 21 May, 2015 Others में

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sunita dohare

नारी हृदय की अंतहीन सीमारेखा…..

अगर पुरुष वर्ग ये समझने लगे कि मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर ना रिश्ते बनते हैं, ना  रिश्ते निभाए जाते हैं तो कुछ हद तक मानवीय मूल्यों को संवारा जा सकता है…..

जहाँ भावनाओं का जन्म ही नहीं होगा, वो समाज केवल विद्रोह को जन्म दे सकता है, आंदोलन  को नहीं, क्यूंकि कोमलता का अभाव जीवन में दुखों को संकलित करता है l
आज का आधुनिक समाज ये समझने लगा है कि गुण से रूप अधिक उत्तम है, धन ही सब कुछ है इसलिए धन से ही योग्यता हासिल की जा सकती है तो इसी सोच के चलते व्यक्ति व्यभिचार की और बढ़ जाता है, धन की धुन में समाज ये भूल जाता है कि जब योग्य व्यक्ति अपने गुण और शक्ति के आधार पर कुछ अर्जित नहीं कर पाता तो उस विद्वान् व्यक्ति का आंकलन उसकी बुद्धि की मापतौल पर दोषारोपण कर किया जाता है तो आप ही बताइए ऐसे में नवीन संरचना का जन्म  कैसे हो सकता है। जब नवनिर्माण नहीं तो नारी चाहे किसी भी समाज में हो वहां वो सम्मानित नहीं हो सकती l कहते हैं कि भारतीय दर्शन नारी को देवी मानता है, देवी के रुप में मंदिर में जगह देता है पर जब तक आम जीवन में नारी के साथ विषमताएँ रहेंगी, तो मंदिर की देवी केवल कहने की बात होकर ही रह जाती है l ये सत्य है कि नारी शक्ति स्वरूप साधना की सशक्त अवधारणा है। जिसमें प्रजनन एवं विकास दोनों ही समाहित हैं। नारी देवी स्वरूप है और इस देवी की शक्ति से हम सभी भली-भांति परिचित हैं। समझौता नारी का दूसरा नाम है। भारतीय नारी के त्याग और बलिदान की कहानियों से इतिहास भरा पड़ा है भारतीय नारी में सहनशीलता कूट कूट कर भरी होती है जिसके कारण वह ज्यादातर बिना शिकायत के अपना जीवन अपने पति, बच्चों व घरवालों की खुशी के लिए काट देती है। लेकिन आज नारी ही सबसे ज्यादा प्रताडि़त है क्यूँ ? क्यूंकि इस प्रताडऩा में नारी की सहजता समाई है,  पर जब उसकी सीमा समाप्त हो जाती है, तब उसके प्रचण्ड रूप को भी देखा जा सकता है, जहाँ विनाश की अवधारणा स्वतः जनित हो जाती है।
भारतीय समाज में नारी स्थान अनुपम है स्त्री के साथ भेद दृष्टि और लैंगिक असमानता के सैकड़ों संदर्भ समस्त धर्म, साहित्य और परम्परा में बिखरे पड़े हैं। कोई भी धार्मिक मान्यता इससे अछूती  नहीं है। सम्प्रदाय मानसिकता में जीने वाली परम्पराएं मानव के रूप में स्त्री को प्रतिष्ठित नहीं कर पायी हैं। जो सभ्य समाज नारी को देवी के रूप में पूजता है आज उसी सभ्य समाज से नारी को अपने आस्तित्व के लिए लडऩा पड़ रहा है, कहने को ये सभ्य समाज होने वाले आडंबरों में सर्वप्रथम ‘कन्या देवी’ का पूजन करते हैं लेकिन इसी पूजन करने वाले आडंबरी समाज में अपनी इन कन्या देवियों को जन्म से पहले ही उखाड़ फैंकने की पुरजोर कोशिश करते हैं। बेटी के नाम पर सौ-सौ कसमें खाने वाला समाज बेटी को उसकी मां की कोख में ही दफनाने में गुर्रेज नहीं करता l
हाँ मैं मानती हूँ कि आधुनिकता के नूतन आयामें का स्पर्श करने की अपनी संस्कृति के नैतिक मूल्यों, विशिष्टताओं को भुला देना कदापि अच्छा नहीं माना जा सकता और ना ही स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छन्दता, अश्लील वेशभूषा, सफेदपोशी नौकरी, शारीरिक श्रम न करना सांस्कृतिक व धार्मिक दायित्वों से उन्मुक्त होना न्याय संगत माना जा सकता है।
कहते हैं कि नारी परिवार की धुरी है। उस पर परिवार की स्थिति और अवस्थिति का चक्र निर्भर करता है उसको अपनी धुरी की साथर्कता दर्शानी है अपने होने का आधार प्रमाणित करना है कहा जाता है नारी से परिवार, परिवार से समाज और समाज से देश सशक्त बनता है। कार्य की सफलता के लिए भारतीय नारी सदैव ही आवश्यक मानी जाती रही है। अगर नारी आजाद है तो क्यूँ नारी अपने सम्मान को खो रही है, क्यूँ निर्माता वर्ग अपने उत्पाद को बेचने के लिए कम से कमतर होते जा रहे वस्त्रों में नारी वर्ग को चुनते है स्त्री विमर्श के नाम पर देह को परोसते हैं, समाज की कथित महिलायें देह व्यापार में क्यो जा रही है,  क्यूँ नारी के साथ बलात्कार हो रहे हैं, महिलाओं में आत्महत्या की प्रबृति क्यो बढ़ रही है, आज भी नारी दहेज़ की बजह से जिन्दा जलाई जा रही है, क्यूँ प्रताड़ना और उत्पीड़न नारी जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनते चले जा रहे हैं। क्यूँ मीडिया की चकाचौंध नारी देह का शोषण कर रही है, क्यूँ नारी संक्रमण की पीड़ा से गुजर रही है, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, बलात्कार जैसे घिनौने अपराधों में क्यूँ नारी की बलि दी जाती रही है ? क्या इन सवालों के जवाब आपके पास हैं या फिर देखकर अनदेखा करना हम सबकी नियति बन गई है l इन सभी सवालों के जबाब क्या ये सभ्य समाज दे सकता है या फिर इन सवालों के जवाब केंद्र सरकार, राज्य सरकार, जिला सरकार व पंचायतें दे सकती है l नहीं, इन सवालों के जवाब इनमें से किसी के पास नहीं है बस इन सभी प्रश्नों के जवाब आज प्रत्येक मानव को सोचने पर विवश अवश्य कर रहे हैं l
मुझे लगता है कि पुरूष निर्मित आधार तल पर खड़े होकर, स्वयं को उत्पाद मानकर, देह को आधार बना कर स्त्री विमर्श, नारी मुक्ति की चर्चा करना भी बेमानी सा लगता है इसलिए यहाँ मैं इस वर्ग को हटाकर अपनी बात कह रही हूँ सही मायने में देखा जाये तो पुरूष वर्ग के विरोध में खड़ी नारी शक्ति स्वयं को नारी हांथों में खेलता देख रही है l आज नारी योग्यताओं के शिखर पर जा कर भी, दहेज़ की बलि चढ़ी तो कभी, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, बलात्कार से छली गई तो कभी, परित्यक्ता बनी, तो कभी किसी के घर को उजाड़ने का कारण बनी, बजह अगर देखी जाये तो यही निकल कर सामने आती है कि स्त्री ने कभी पुरुष और पुरुष ने स्त्री पर जहाँ विश्वास नहीं किया वहाँ नारी ना श्रद्धा बनी ना पुरुष को ही मान सम्मान मिला।
आए दिन बढ़ती व्यावहारिकता, प्रदर्शनप्रियता, दिशाहीनता और संवेदनहीनता आज की मूल चिंता है। अब ऐसे हालातों में भारतीय नारी को अपनी आत्मशक्ति पहचानने की आवश्यकता है क्यूंकि इस संस्कृति व संस्कारों को केवल भारत की पूज्य नारियां ही अपनी आत्मशक्ति को जगाकर साहस, र्धेय, संयम, त्याग और तपस्या से ही जीवित रख सकती है । इसलिए कहते हैं कि मैं “नारी” …….

अपाहिज व्यवस्था का अध्ययन कर रही हूँ
मैं नारी हूँ नारी धर्म का पालन कर रही हूँ
नारी हूँ स्वयं को संवारने का जतन कर रही हूँ
हाँ फर्ज की दहलीज को नमन कर रही हूँ

सम्मान से जीना है जीने का जतन कर रही हूँ
हाँ मैं अपने सुखों को दुखों से अलग कर रही हूँ

ये जाति धर्म, गरीबी अमीरी समाज में चल रही है
इसे मिटाने की रात दिन, जद्दोजहद कर रही हूँ

तुम्हारी कसम को कसम से मनन कर रही हूँ
हाँ मैं फिर से सुबहो-ओ-शाम स्मरण कर रही हूँ

इन गहरे अंधेरों में रौशनी की जगन कर रही हूँ
रिश्तों को सुलझाने का फिर से प्रयत्न कर रही हूँ

चल छोड गम की बातें, क्यूंकि इसे मैं सहन कर रही हूँ
तुम्हारी थी तमन्ना, तो सुखों का यहाँ मैं हवन कर रही हूँ

तुम्हारे एहसास का तजुर्बा यूँ मिला, सर तक भीग गई हूँ
एक बार देख ले आके, तेरे आसुओं को मैं नमन कर रही हूँ

सुनीता दोहरे
प्रबंध संपादक
इण्डियन हेल्पलाईन न्यूज़

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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhartiyavivektiwari के द्वारा
June 4, 2015

जी बहुत सुन्दर लेख है आपका ,,,,,

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 5, 2015

    bhartiyavivektiwari जी, सादर अभिवादन ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद इस पोष्ट पर आने के लिए !!

yogi sarswat के द्वारा
June 3, 2015

भारतीय समाज में नारी स्थान अनुपम है स्त्री के साथ भेद दृष्टि और लैंगिक असमानता के सैकड़ों संदर्भ समस्त धर्म, साहित्य और परम्परा में बिखरे पड़े हैं। कोई भी धार्मिक मान्यता इससे अछूती नहीं है। सम्प्रदाय मानसिकता में जीने वाली परम्पराएं मानव के रूप में स्त्री को प्रतिष्ठित नहीं कर पायी हैं। जो सभ्य समाज नारी को देवी के रूप में पूजता है आज उसी सभ्य समाज से नारी को अपने आस्तित्व के लिए लडऩा पड़ रहा है, कहने को ये सभ्य समाज होने वाले आडंबरों में सर्वप्रथम ‘कन्या देवी’ का पूजन करते हैं लेकिन इसी पूजन करने वाले आडंबरी समाज में अपनी इन कन्या देवियों को जन्म से पहले ही उखाड़ फैंकने की पुरजोर कोशिश करते हैं। बेटी के नाम पर सौ-सौ कसमें खाने वाला समाज बेटी को उसकी मां की कोख में ही दफनाने में गुर्रेज नहीं करता बिल्कुल सत्य और सही लिखा है आपने आदरणीय सुनीता दोहरे जी , और जागरण ने भी आपकी पोस्ट का उचित पारितोष दिया है ! हार्दिक बधाई

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 5, 2015

    yogi sarswat जी , माननीय आपका मेरी पोष्ट पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 1, 2015

आदरणीय सुनीता जी ,इस उत्कृष्ट आलेख की हर पंक्ति सार्थक एवं शाश्वत सत्य है ,हार्दिक बधाई .

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 1, 2015

    Nirmala Singh Gaur नमस्कार जी , आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ आपका बहुत -बहुत धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
May 31, 2015

अब ऐसे हालातों में भारतीय नारी को अपनी आत्मशक्ति पहचानने की आवश्यकता है क्यूंकि इस संस्कृति व संस्कारों को केवल भारत की पूज्य नारियां ही अपनी आत्मशक्ति को जगाकर साहस, र्धेय, संयम, त्याग और तपस्या से ही जीवित रख सकती है- बिलकुल सही लिखा है आपने आदरणीया सुनीता दोहरे जी, आपके इस पोस्ट को सम्मान मिलना ही चाहिए था. आपको बहुत बहुत बधाई!

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 31, 2015

    “बहुत बहुत आभार आदरणीय jlsingh जी , आप की पारखी नज़रों से गुजरने के बाद लेख की महत्ता और भी मुकम्मल हो जाती है । शुक्रिया आपका ..”

Shobha के द्वारा
May 30, 2015

प्रिय सुनीता जी आपके शानदार लेख का सम्मान दे कर अपने को सम्मानित किया हैं आप के हर लेख पठनीय होते है और बड़ी मेहनत से लिखे होते है डॉ शोभा

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 31, 2015

    Shobha दीदी, नमस्कार जी , आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ आपका बहुत -बहुत धन्यवाद”

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
May 30, 2015

सुनीता जी निबंध लिखा जाये तो उत्तम है किन्तु सत्य यही है क़ि जो तुलसीदास ने समझा यानि ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी | किन्तु इसके लिए नर को भी नारायण अवतार होना चाहिए | या देवी सर्वभूतेषु ……….नमस्तश्यै नमस्तश्यै ,नमस्तश्यै नमो नमः से पूजते अहंकार ग्रस्त नारी चण्डी अवतार ही दिखती है | रूप लावण्य के फ़िल्मी अंदाज के रोमांटिक गीत गाते दीवाने नर गुलाम बनकर प्रताडना सहते हैं। क्या नर क्या नारी दोनों मानवीय ,भावनाओं मै ही जी सकते हैं , ना नर नारायण बन सकता है ,ना नारी देवी । पढ लिख कर ,कपडे पहिन घर बार बनाते मनुष्य अवस्य कहलाते हैं किंतु सामान्य जीव जंतुओं से अलग नहीं हैं । ओम शांति शांति का अहसास तीनों लोकों मैं विचरते नारद मुनी भी नहीं कर पाये । कभी नर रूद्र कभी नारी चंडी । …….बस ओम शांति शांति शांति जपो और मुॅह ढककर सो जाओ ………ओम शांति शांति शांति 

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 31, 2015

    PAPI HARISHCHANDRA जी, माननीय आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम

sadguruji के द्वारा
May 30, 2015

आदरणीया सुनीता दोहरे जी ! सादर अभिनन्दन ! ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने की बहुत बहुत बधाई !

Sonam Saini के द्वारा
May 28, 2015

नमस्कार मैम ………..नारी के प्रति बढ़ते इन अपराधो के लिए कहीं न कहीं नारी भी जिम्मेदार है …विचारणीय लेख हेतु बधाई ……….

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 28, 2015

    sonam saini जी सादर नमस्कार , सर्वप्रथम तो आपका मेरी पोष्ट पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! शायद आपने मेरी रिपोर्ट को ठीक से नहीं पढ़ा मैंने स्वयं इस रिपोर्ट में लिखा है की “”"”"”"”"मुझे लगता है कि पुरूष निर्मित आधार तल पर खड़े होकर, स्वयं को उत्पाद मानकर, देह को आधार बना कर स्त्री विमर्श, नारी मुक्ति की चर्चा करना भी बेमानी सा लगता है इसलिए यहाँ मैं इस वर्ग को हटाकर अपनी बात कह रही हूँ सही मायने में देखा जाये तो पुरूष वर्ग के विरोध में खड़ी नारी शक्ति स्वयं को नारी हांथों में खेलता देख रही है l आज नारी योग्यताओं के शिखर पर जा कर भी, दहेज़ की बलि चढ़ी तो कभी, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, बलात्कार से छली गई तो कभी, परित्यक्ता बनी, तो कभी किसी के घर को उजाड़ने का कारण बनी, बजह अगर देखी जाये तो यही निकल कर सामने आती है कि स्त्री ने कभी पुरुष और पुरुष ने स्त्री पर जहाँ विश्वास नहीं किया वहाँ नारी ना श्रद्धा बनी ना पुरुष को ही मान सम्मान मिला।”"”"”"”

Shobha के द्वारा
May 22, 2015

प्रिय सुनीता जी बहुत अच्छा लेख डॉ शोभा

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 24, 2015

    Shobha जी , आपका बहुत बहुत धन्यवाद !सादर अभिवादन !

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
May 22, 2015

बहुत सुन्दर लेख / आपका आकलन बिलकुल सही है / नारी अश्तित्व खतरे में है / समस्या है लेकिन समाधान नजर नहीं आ रहा है /

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 22, 2015

    Rajesh Kumar Srivastav जी , सादर अभिवादन ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
May 21, 2015

तुम्हारे एहसास का तजुर्बा यूँ मिला, सर तक भीग गई हूँ एक बार देख ले आके, तेरे आसुओं को मैं नमन कर रही हूँ ! आदरणीया इस रचना को पढ़कर क्या कहूँ, कोई शब्द नहीं मिल रहा है ! आपकी हर रचना गंभीरता से सोचने पर विवश कर देती है ! आपकी लेखनी को नमन ! बहुत बहुत साधुवाद और शुभकामनाओं सहित !

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 21, 2015

    sadguruji जी, माननीय आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम


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