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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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अतीत का ये पन्ना इतना बैचैन क्यूँ ?

Posted On: 10 May, 2015 Others में

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सुनीता दोहरे

अतीत का ये पन्ना इतना बैचैन क्यूँ ?

बात थोड़ी पुरानी है उस समय में कई पत्रिकाओं और न्यूज़ पेपरों में लेखन का कार्य किया करती थी साथ ही टीवी चैनल के लिए डोक्युमेंटरी की स्क्रिप्ट भी लिखा करती थी मेरी लिखी हुई स्क्रिप्ट पर तुम कभी कोई सवाल खड़े नही करते थे क्यूंकि एकमात्र तुम ही चैनल के सर्वेसर्वा थे और तुम ना जाने मुझपर इतना विश्वास क्यूँ करते थे इसे आज तक मैं ना समझ पाई !
आज फिर इतनी बैचैनी सी क्यूँ है ना जाने क्यूँ अतीत का ये पन्ना इतना बैचेन है मेरी हर सुबह धीमी हवा के झोंकों से बैचेन हो उठती है और याद की मसौन्दी सी डली मेंरे सीने में अपनी मिठास निचोड़ देती है मेरी पलकों के अन्दर एक दर्द समेटे हुए मेरे अश्क मोती से बिखर जाते है !……..इक याद भली सी मुस्कराने लगती है…..
यही कोई सन २००९ की बात रही होगी सोशल साईट में मेरी राजनीतिक पोस्ट पर अक्सर तुम्हारे द्वारा दिए हुए तीखे कमेन्ट मुझे भीतर तक आहत कर जाते समय की कमी के कारण मैंने कभी भी तुम्हारी टाइम लाइन को खोलकर नहीं देखा और ना ही तुम्हारे नाम पर ध्यान दिया अपनी प्रोफाइल पिक से तुमने अपना चेहरा नादारद रखा था ! हाँ एक बार कमेन्ट में तुमने लिखा था बड़े ही घमंड से कि “मैं भी एक राजनीतिक पत्रकार हूँ और जनता की सेवा करता हूँ मुझे आपके द्वारा की हुई पोस्टों से किसी एक को निशाना बनाकर उसे आहत करने की बू आती है” तब ही मुझे लगा था कि ये कोई पत्रकार है जो मुझसे फालतू में उलझ रहा है इसलिए मैंने उस ओर ध्यान नही दिया लेकिन बार बार ये सोचती कि ये शख्स भी उसी पेशे से जुड़ा है जिस पेशे से मैं जुडी हूँ फिर भी ये चिढ़कर मेरे विरोध में उलटे कमेन्ट करता है, इसे देख मैं तिलमिला जाती जबकि मेरी पोस्ट से किसी का मान सम्मान आहत नही होता क्यूंकि मैं हमेशा सच्चाई ही बयाँ करती थी, मैं मानती हूँ कि सच्चाई हमेशा कडुवी होती है और सुनने में अत्यंत कष्टप्रद, लेकिन ये सोचकर लिखती कि मेरी ये छोटी सी कोशिश समाज में कुछ जागृति ला सके पर वो हमेशा मेरा विरोध करता इतनी नफरत हो गई थी मुझे उससे और उसे मुझसे, इसका कारण नही समझ पाई थी मैं, लेकिन मैंने धीरज रखा क्यूंकि मैं ये जानती थी कि सोशल साईट पर अगर आपने कोई न्यूज़ पोस्ट की है तो उस पर हर व्यक्ति अपनी राय दे सकता है एक हद तक और उसने ये हद अभी पार नहीं की थी ! मुझे भी उसकी उसी हद को क्रास करने का इन्तजार था एक दिन उसने मेरी एक पोस्ट पर सवाल खड़ा कर दिया मेरा वजूद तिलमिला उठा लेकिन मैंने कोई जवाब ना दिया कुछ दिनों तक मैंने लिखना ही छोड़ दिया ! कई दिनों बाद मैंने सोशल साईट को खोल कर देखा तो पाया कि…
जनाब ने इन बॉक्स में मुझे लिखकर ये कहा कि…. तुमने लिखना क्यूँ छोड़ दिया इतनी कमजोर हो तुम कि अपने सामने वाले से टक्कर नही ले सकतीं अगर तुमे मेरा कमेन्ट करना बुरा लगता है, तो अब कुछ नही कहूँगा लेकिन बात को समझो, देखो आखिरी बार कह रहा हूँ “तुम लिखती तो अच्छा हो लेकिन सीधा प्रहार करती हो जो कभी भी तुम्हारे लिए हानिकारक हो सकता है क्यूंकि तुम राजनीती के फंडों से वाकिफ तो हो लेकिन उस दलदल की छीटें तुम तक अभी पहुंची नहीं हैं ! सुनी तुम इतना तो जानती हो कि राजनीति के भीतर जो शून्य है, उसका एक वीभत्स जबडा है  जिसके भीतर अंधेरी खाई में रक्त का एक तालाब है और उस तालाब में जो शून्य है  वो एकदम काला, बर्बर और नग्न है। और तुम जिन सत्ताधारियों और नेताओं पर अपने शब्दों से प्रहार करती हो उनसे मेरा रोज़ का मिलना होता है उन लोगों में तुमको लेकर हो रही चर्चा ने ही सोशल साईट पर तुम्हे ढूढने को मुझे मजबूर कर दिया था ना जाने क्यूँ मुझे तुमसे विशेष लगाव है इसलिए मैं तुम्हे आगाह कर रहा हूँ, लिखिए लेकिन थोडा होशियारी से, फिर ना कहना कि आगाह नही किया मैं तुम्हारे लिए चिंतित इसलिए हूँ कि मैं एक समाजचिन्तक की चिंता करता हूँ एक अच्छे जर्नलिस्ट को किसी गुमनामी के अँधेरे में जाने से बचाना चाहता हूँ आगे आपकी मर्ज़ी ! आपका शुभ चिन्तक”….
उसके द्वारा लिखा हुआ अपना “सुनी” नाम देखकर मेरा पारा चढ़ना स्वाभाविक था इसलिए मैं तिलमिलाकर ना जाने क्या क्या लिख बैठी ! जब मेरा गुस्सा ठंडा हुआ तो सोचा कि कहीं ना कहीं मैं गलत हूँ ये शख्स आखिर है कौन जो मेरी इतनी निगरानी कर रहा है जब पूरी प्रोफाइल खोलकर देखी तो एकबारगी मुझे विश्वास न हुआ कि ये तुम हो जिसने कभी मेरे कैरियर को वो ऊँची उड़ान दी थी जिसे पाने के लिए मैंने दिन रात एक कर दिया था और फिर किन्ही विशेष परिस्तिथियों वश मैंने अपना ट्रांसफर तुम्हारी हद से दूर करवा लिया था मैं चली आई थी तुमसे और तुम्हारे द्वारा खींचे हुए उन दीवारों के स्केच से परे, जहाँ तुम तक पहुँचने की कोई गुंजाईश ही नहीं थी और आज तुम एकबार फिर मेरे सामने एक सवाल बनकर खड़े हो, जिसका जवाब सिर्फ तुम्हारे पास है l
काश ! तुम इस क्वेश्चन मार्क को मिटा सकते…..
सुनीता दोहरे
प्रबंध सम्पादक
इण्डियन हेल्पलाइन
लखनऊ

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