sach ka aaina

अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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मृगतृष्णा सी छलती घूमे, ये कैसी कस्तूरी है ?

Posted On: 26 Aug, 2014 Others में

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१- मृगतृष्णा सी छलती घूमे, ये कैसी कस्तूरी है ?

अब तक जो कथा अधूरी है, बस वो मेरी मजबूरी है
सच की महिमा बाहर आये, तो करना तर्क जरूरी है

खुली सियासत बैठ के खेले, इन्हें होती नहीं सबूरी है
धन दौलत के प्यादों की, यहाँ खून से सनी तिजोरी है

कुर्सी-कुर्सी करते-करते, मजबूरों के हाँथ से छीनी रोटी है
इनका हो जाता है पतन तभी,  इन पर चढ़ती जब अंगूरी है

तन और धन की प्यास न बुझती, ये कैसी मजबूरी है
इन बेपैन्दों की क्या बात करूँ, जिनकी  हर हरकत लंगूरी है

छप्पन छुरी, बहत्तर पेंच उसमें, इसलिए चलती छप्पन छुरी है
जिस्म में ज़मीर रहे ना रहे, जेब में रूपया होना बहुत जरूरी है

इन्हें चढ़ते हैं छप्पन भोग थाल के, कभी चांदी वर्क गिलौरी है
हित अनहित भी नहीं सूझता, मृगतृष्णा सी ये कैसी कस्तूरी है

चैन-ओ-सुकूं से घर के भीतर नींदे, अब लेना बहुत जरूरी है
भटक ना प्राणी, मृगतृष्णा सी छलती घूमे, ये कैसी कस्तूरी है

ये चिलमन और वो चिलमन सबकी हर तस्वीर अधूरी है
बफादारी की क्या बात करूँ, ये तो अब केवल दस्तूरी है !

२- बूढ़े बरगद की आँखें नम हैं

गाँव गाँव पे हुआ कहर है, होके खंडहर बसा शहर है
बूढा बरगद रोता घूमे, निर्जनता का अजब कहर है

नीम की सिसकी विह्वल देखती, हुआ बेगाना अपनापन है
सूखेपन सी हरियाली में, सुन सूनेपन का खेल अजब है

ऋतुओं के मौसम की रानी, बरखा रिमझिम करे सलामी
बरगद से पूंछे हैं सखियाँ, मेरा उड़नखटोला गया किधर है

सूखे बम्बा, सूखी नदियाँ, हुई कुएं की लुप्त लहर है
निर्जन बस्ती व्यथित खड़ी है, पहले सुख था अब जर्जर है

शहर गये कमाने जब से, गाँव लगे है पिछड़ा उनको
राह तके हैं बूढ़े बरगद, व्यथित पुकारे विजन डगर है

कैसी ये ईश्वर की लीला न्यारी, मन में मेरे प्रश्न प्रहर है
तोड़ के बंधन माँ का आंचल, इनके लिए बस यही प्रथम है

घर-घर दिल हैं लगे सुलगने, बच्चों की किलकारी कम है
उजड़ गयी कैसे फुलवारी, पहले घर था अब बना खण्डहर है ….

सुनीता दोहरे …..


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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
August 31, 2014

सुनीता जी दोनों ही खंड बहुत भावपूर्ण हैं साभार

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    August 31, 2014

    yamunapathak जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम !!!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
August 30, 2014

दोनो कविताएं मन को छूती हैं । 

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    August 31, 2014

    एल.एस. बिष्ट् जी, सादर प्रणाम , आपका बहुत बहुत आभार !!!!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
August 30, 2014

चैन-ओ-सुकूं से घर के भीतर नींदे, अब लेना बहुत जरूरी है भटक ना प्राणी, मृगतृष्णा सी छलती घूमे, ये कैसी कस्तूरी है सुनीता जी बहुत सुन्दर भाव लिए ..जीवन की विविध दशा दिखती अच्छी रचना ..बधाई गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभ कामनाएं भ्रमर ५

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    August 31, 2014

    surendra shukla bhramar5 जी, सादर प्रणाम , आपका बहुत बहुत आभार !!!!

sanjay kumar garg के द्वारा
August 28, 2014

“मृगतृष्णा सी छलती घूमे, ये कैसी कस्तूरी है” सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीया सुनीता जी!

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    August 30, 2014

    sanjay kumar garg जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद, सादर नमस्कार !!!!!

juranlistkumar के द्वारा
August 27, 2014

नमस्कार मेम ,    मेरे दैनिक समाचार पत्र के लिए आपके लेख की आवश्यकता है मेरी आपसे गुजारिश है कि कृपया आप मेरी इस बात पर ध्यान अवस्य देंगी मैं आपका सदैव आभारी रहूँगा सादर नमन llllllllllll

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    August 28, 2014

    juranlistkumar जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद, सादर नमस्कार !!!!!

juranlistkumar के द्वारा
August 27, 2014

इन्हें चढ़ते हैं छप्पन भोग थाल के, कभी चांदी वर्क गिलौरी है हित अनहित भी नहीं सूझता, मृगतृष्णा सी ये कैसी कस्तूरी है….इतनी गहराई छुपी है आपकी रचना में , मेम इसे मैंने करीब दस बार पढ़ा है उसके बाद भी लगा की फिर पढूं ..आपको मेरा सादर नमन है llllll

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    August 28, 2014

    juranlistkumarजी , आपका बहुत बहुत धन्यवाद .. सादर प्रणाम !!!

Shobha के द्वारा
August 27, 2014

सुनीता जी राजनीतिक तंज से परिपूर्ण भाव पूर्ण कविता डॉ शोभा

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    August 28, 2014

    Shobha जी , आपका बहुत बहुत धन्यवाद .. सादर प्रणाम !!!

sadguruji के द्वारा
August 27, 2014

गाँव गाँव पे हुआ कहर है, होके खंडहर बसा शहर है बूढा बरगद रोता घूमे, निर्जनता का अजब कहर है ! बहुत सुन्दर और उपयोगी रचना ! बहुत बहुत बधाई !

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    August 28, 2014

    sadguruji जी, आपका बहुत -बहुत धन्यवाद, सादर नमस्कार !!!!!

pkdubey के द्वारा
August 27, 2014

गहन शिक्षप्रद रचनाएँ आदरणीया .सादर आभार .

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    August 28, 2014

    pkdubey ,जी, आपका बहुत -बहुत धन्यवाद, सादर नमस्कार !!!!!


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