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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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अब मुहब्बत भी हंसने लगी है ...

Posted On: 16 Jul, 2014 Others में

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सुनीता दोहरे प्रबंध सम्पादक

अब मुहब्बत भी हंसने लगी है …

आज उसे ऑफिस मैं न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि उसके इन्तज़ार की घड़ियाँ अब समाप्त हो चुकी हैं वो तेज़ी से कार ड्राइव करती हुई घर को जा रही थी ! शाम के धुंधलके में थक हार कर घर पहुँचते ही उसके हाथ में एक लिफाफा आया तो लगा कि जैसे सब कुछ सिमट कर एक लाल घेरे में घूमने लगा है इस लिफ़ाफ़े को अपने हाथों में लेकर, उसके भीतर बसी शब्दों की ऊष्मा को उसने अपने अंतरमन में महसूस किया ! एक भीनी भीनी सी खुश्बू “जानू” के हांथों की छुअन को महका रही थी हाँ “जानू” ही नाम दिया था सुनील ने उसे ! सुना है प्रेम में वस्तुएं भी जीवित हो उठती हैं पत्थर और वृक्ष तुमसे बातें करने लगते हैं  सूर्य, चन्द्रमा, यह सारी सृष्टि सजीव हो उठती है आज बरसों बाद सुनील के ख़त को अपने दोनों हांथों में उठाकर रो पड़ी थी वो ! आंसुओं को थाम कर उसने जैसे ही लिफाफा खोला …. अनगिनत दर्द की तड़फ ने सहला दिया था उसे…….
“उस प्रेम के ग्रन्थ में जब “जानू” ने सिर्फ “मैं” की आह्मियत देखी तो उसकी पलकों से ढलके आंसुओं ने “मैं” की परिभाषा को ही बदल दिया !!!!
“हम” शब्द ना जाने कहाँ विलीन हो गया और रह गया तो सिर्फ मैं का वजूद !!!!!
उसके मुंह से अनायास ही निकला “सुनील काश तुम मुझे सच्चा प्यार दे पाते तो मैं तुम्हारे क़दमों में बिछ जाती तुमने मुझे कभी प्रेम किया ही नहीं लेकिन मैं तुम्हे रूह से प्यार करती रही और मैं तुममें उस प्यार की रूह को तलाशते-तलाशते अपने वजूद का अंत कर बैठी, किसी ने ठीक ही कहा है कि “जब प्रेम नहीं होता तो जीवित लोग भी वस्तु बन जाते हैं” ख़त में लिखे तुम्हारे शब्द “मैं” ने “हम” शब्द की हत्या न जाने कब कर दी…….
और फिर जनम हुआ तिरस्कार, नफरत का…..

अचानक वो बडबडा उठी कि…..
ख्वाहिशें बहुत थी आँचल में सजाने के लिए
लेकिन इंसान तो इंसान,
ये खुदा भी खुशियाँ किश्तों में अदा करने लगा !!!!

अचानक तेज़ी से निशा ने सुनील की तस्वीर को उठाकर फैंक दिया और चिल्लाई अब और नहीं !!!! नहीं सुनूंगी तुमको ! तुम्हारे हर ख्वाब को मैं जमींदोज कर दूंगी….क्योंकि अब सामने खड़ी है सच्चाई जिसे सहने की ताकत है मुझमें…
तुम सुन रहे हो तो सुन लो
तुम हाँ तुम ! तुम वो कटी हुई पतंग हो
जिसे पकड़ने की जदोजहद में
मैं बार-बार भागती रही, गिरती रही
बे-बजह परत-दर-परत तुम्हारे सामने
अपने अस्तित्व को नकारती रही

अब मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद ही मेरी ताकत बनेगा, दुनिया की वो उंचाई मैं हासिल करुँगी जिस तक तुम्हारी परछाईं भी नही पहुँच सकती…….
दूर होते हुए सूरज को अँधेरा निगल चुका था शाम की ठंडी बयार निशा को एक सुकून दे रही थी क्योंकि अपने अनसुलझे सवालों के जवाब उसे मिल चुके थे  और निशा की माँ के चेहरे पर चिंता की लकीरें जंवा हो रहीं थी माँ सोच रहीं थी कि बेटी अपना पहाड़ सा जीवन कैसे व्यतीत करेगी ! माँ के चेहरे पर निगाह गड़ाते हुए निशा ने कहा माँ मैं कमजोर और लाचार नहीं हूँ तुम्हारे प्यार और विस्वाश की छत्र छाया के रहते हुए “हम” शब्द की परिभाषा का अर्थ मुझे बखूबी मालुम है…...
सुनीता दोहरे ….

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 19, 2014

 स्वभाब से नारी अपने अंदर की शक्तियों का उपयोग अपने प्यारों के कल्याण में ही करती है ,इस लघु कथा में उन शक्तियों का उपयोग अपने प्रिय से मिले बिश्वास घात के दर्द से  स्वयं को सम्हालने ने में कर रही है ,लेकिन फिर भी उसकी शराफत को नमन  कि उस शक्ति से वो प्रतिशोध नहीं ले रही जबकि वो ऐसा कर सकती थी . सुनीता जी भावनाओं को भिगोने वाली ,बहुत ह्रदय स्पर्शी लघु कथा .हार्दिक अभिनन्दन .

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    July 19, 2014

    Nirmala Singh जी, आपका बहुत -बहुत धन्यवाद, सादर नमस्कार !!!!!

sadguruji के द्वारा
July 18, 2014

अब मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद ही मेरी ताकत बनेगा, दुनिया की वो उंचाई मैं हासिल करुँगी जिस तक तुम्हारी परछाईं भी नही पहुँच सकती ! प्रेम की बलिवेदी पर स्त्री अपना सर्वस्व मिटा देती है और पुरुष अपना मैं तक मिटा नहीं पाता है ! स्त्री प्रेम में जीती है और पुरुष सिर्फ उसके साथ समय बिताता है ! आदरणीया सुनीता दोहरे जी ! इस सार्थक और शिक्षाप्रद रचना के लिए बधाई !

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    July 18, 2014

    sadguruji जी, आपका बहुत -बहुत धन्यवाद, सादर नमस्कार !!!!!

anilkumar के द्वारा
July 17, 2014

आदरणीय सुनीता जी , जब दर्द हद से गुजर जाती है , तब कभी वह किसी इन्सान को मिटा  देता है और कभी वह किसी इन्सान को फौलाद का बना देता है । इन्सान के फौलाद बनने की  बेहतरीन दास्तां । बहुत बहुत आभार । 

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    July 17, 2014

    anilkumar जी, आपने मेरे लेखन को पढ़कर दो शब्दों में उसकी एकदम सटीक व्यख्या कर दी, आपके लेखन से मुझे सदैव प्रेरणा मिलती है….. आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ! सादर प्रणाम !!!!

pkdubey के द्वारा
July 17, 2014

बहुत प्रेरणादायक और सुन्दर जीवन चित्रण और अनूठी साहित्य शैली और अद्भुत शब्द वह भी गद्य में ,सूरज ,निशा , शाम ,अधेरा,मैं ,हम ,तुम आदि -आदि . सादर आभार आदरणीया | सादर बधाई |

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    July 17, 2014

    pkdubey जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद, सादर नमस्कार !!!!!


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