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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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मोदी क्या आवाम की इन उम्मीदों पर खरे उतरेंगे ?

Posted On: 10 Jun, 2014 Others में

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sunitaaaaaa

मोदी क्या आवाम की इन उम्मीदों पर खरे उतरेंगे ?

उन दिनों देखते-देखते हवा का रुख बदल गया, देश अचानक गुजरात की महिमा गाने लगा विपक्षी पार्टियाँ अवाक रह गई और एक दूसरे पर दोषारोपण करतीं रही इन्ही आरोप और प्रत्यारोपों के चलते मोदी शांत भाव से बाजी मार ले गये, विपक्ष सोचता ही रहा कि कौन से सवाल करूँ जिसका जवाब आवाम की निगाहों में मोदी की असफलता जाहिर कर दे, लेकिन मोदी की लहर ने तो भारत के राजनीतिक समीकरण को ही बदल कर रख दिया |…..
२०१४ के लोकसभा चुनाव में मोदी की आंधी इतनी तेज़ थी कि कि छोटे बड़े पौधे और मजबूत पेड़ भी बह गये। एक ऐतिहासिक जीत के साथ जबर्दस्त प्रदर्शन किया भाजपा के धुरंदरों ने, सिर्फ मोदी ही मोदी छाये रहे पूरे चुनावी सफ़र में मतदाताओं ने दिल खोलकर मोदी को मतदान किया जिसे उनकी छवि “मोदी वन मैन शो” की बन गई, जनता से बड़े-बड़े वादे किये गये जनता के साथ-साथ उनका वक्त भी उनका हो गया यहाँ एक ही कहावत फिट बैठ गई कि…. ….“वन मैंन शो जहां से खड़ा होता है लाइन वहीं से शुरू हो जाती है” !!!! ऐसा क्यों कि विश्व चकित है विरोधी भ्रमित हैं क्या हुआ कि कोई अकिंचन शीर्ष पर जा बैठा ! लेकिन ये उन लोगों के मुंह पर तमाचा था कि जो ये लोग भ्रम पालकर बैठे हैं कि सत्ता धनबल, बाहुबल और छल से पाई जाती है ! ऐसा क्या हुआ कि अचानक दृश्य बदल गए और लोग सम्मोहन में खिंचे चले गये इस व्यक्ति का सम्मोहक-व्यक्तित्व सबको कैसे जंचा, ये कैसी आंधी है जो सब कुछ ज़ादू सरीखा तब से घटा चला आ रहा है जब से मोदी की लहर चली है| बात चाहे सियासत की हो या शहंशाह की, जब भी कोई पार्टी हारती है तो उसमें शहंशाह का बहुत बड़ा हाँथ होता है क्योंकि बादशाह से यही अपेक्षा की जाती है कि वह आवाम को अपने पूरे राज-काज के दौरान अनदेखा न करे और अगर करता है तो नतीजा हार होती है भारत देश की विपक्षी पार्टियाँ करारी हार के बावजूद ये नहीं समझना चाहतीं कि जनता ने मतदान द्वारा उनको क्या संदेश दिया है। अगर वे इसी तरह से नादानी करते रहे तो उन्हें निकट-भविष्य में विधानसभा चुनावों में भी उनको सिर्फ पराजय और निराशा ही हाथ लगेगी | माना कि भाजपा ने एक अविस्मरणीय अप्रत्याशित और बहुत बड़ी जीत पाई है और उसके एवज में जनता भी हर पल पलक पांवड़े बिछाकर उम्मीदें सजाये खड़ी है लेकिन मोदी के लिए ये पांच साल एक परीक्षा के सम्मान हैं अवाम को चाहिए कि अब भाजपा या मोदी-मोदो रटना बंद करे क्योंकि अत्यधिक चाटुकारिता अच्छी नहीं होती जब भी मोदी एकांत में होते होंगे तो आईने में निहारकर ये कहते होंगे कि “सम्पूर्ण भारत मुझे नमो के नाम से जानता है और नमो-नमो कहते हुए थकता नहीं है उदाहरण आपके सामने है गुजरात मैं चार बार सियासत सँभालने के बाद अब सम्राट के रूप मैं अपनी योग्यता, गुजरात विकास, दहाड़ती भाषण शक्ति से ही मैंने जनता को मोहित किया है, सच तो ये है कि पहली बार जनता ने वास्तविक समस्याओं को जाना है, माना है स्वीकारा है और उन्हीं पर ध्यान रखते हुये अपने मताधिकार का प्रयोग किया है उन्होंने पहली बार व्यक्तियों को नहीं सिद्धान्तों को, लागू नीतियों और प्रस्तावित नीतियों को अस्वीकारा है वास्तविक समस्याओं को समझने और सुलझा सकने वालों को स्वीकारा है जनता पढी-लिखी हो या न हो अपने दर्द को, अपने कष्ट को समझती है और मैं उनके इस दर्द को हरने की पूरी कोशिश करूंगा”  इतना कहकर खुलकर कहकहे लगाते होंगे नमो, नमो, नमो !!!!
देखा जाए तो हमारा देश एक बड़े ही अहम् दौर से गुज़र रहा है क्योंकि देश में राजनीतिक  शास्त्र की अहमियत आज तक किसी पार्टी ने नहीं समझी अगर समझा है तो सिर्फ कुर्सी की अहमियत को, और इसीलिए अवाम की निगाहों में भारत का पूरा राजनीतिक शास्त्र और समाज शास्त्र दुबारा लिखने की कोशिश की जा रही है मुझे ये सोचकर हैरानी होती है, कि दिल्ली की सत्ता तंत्र से बाहर एक मुख्यमंत्री का इस मुकाम तक पहुंचना कि उसे आवाम अपने सर आँखों पर बैठा ले और एक सुपरमैन का दर्जा देते हुए लोग उसके चमत्कार पर इस कदर भरोसा कर बैठे, आवाम सोचती है कि मोदी जादू की छड़ी लेकर आये हैं जो चारों दिशाओं में घुमा देंगे और पल भर में काया पलट हो जायेगी भारतीय राजनीति में भाजपा और मोदी पर गहन अध्ययन करने के बाद बस एक ही बात मेरे सामने उभर कर आई है कि संयोग और मेहनत जब साथ साथ चलते हैं तो हांथों की लकीरें अपने आप अपनी कहानी बयाँ कर देती हैं और वैसे भी जनता राजनीतिक पार्टियों से पस्त हुई बैठी थी जनता को बदलाव चाहिए था और इसी का फायदा भाजपा के दिग्गजों ने उठाया उनकी जंग में उतरने की समझदारी और मेहनत ने मोदी को इस नामुमकिन कहानी का महानायक बना दिया है मोदी को एक ऐसा राज्य (गुजरात) मिला जो मोदी के इरादों को कामयाब कर सकता था क्योंकि गुजरात परंपरागत तौर पर संपन्न और विकसित रहा है जिसके चलते एक लंबे समुद्र तट और कारोबारी कम्युनिटी के रहते ट्रेड-कॉमर्स का काफी बोलबाला रहा है कारण कि देश की बड़ी कंपनियों के वहां आने से शेयर मार्केट में गुजरातियों का बहुतायत मात्रा में पैसा लगाया जाता है, ये कहीं से नही छुपा है कि आज का भारत पूर्ण सुदृढ़ है वो चाहे आर्थिक पक्ष हो या सुरक्षा की दृष्टि से हो, हमारी सारी सीमाएं महफूज हैं क्योंकि हमारा नाम विश्व में हैं इसलिए विश्व की नजरें हमारे भारत पर टिकीं हुई हैं चाहे वह राजनैतिक व्यवस्था हो या कूटनीतिक व्यवस्था के जरिये हो, पूंजीपतियों के लिये भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है इसलिए जो भी भारत के बाजार की चकाचौंध से दूर है वह अपने विकास के पायदान से उतनी ही दूर खड़ा है ये बात मोदी अच्छे से जानते हैं इसलिए एक बड़े पैमाने पर प्लान बनाकर मोदी ने अपना दिमाग लगाया और जुट गए अपनी मुहिम में, उन्होंने गुजरात की इस परंपरागत हैसियत का आंकलन करते हुए मन में ठान लिया कि मैं गुजरात को उस उंचाई पर ले जाऊँगा कि दुनिया देखती रह जाएगी और फिर इसी को मद्देनजर रखते हुए उन्होंने वायब्रेंट गुजरात समिट का सालाना सिलसिला शुरू कर दिया जो देश का सबसे बड़ा और चर्चित “बिजनेस इवेंट” बन गया लेकिन मीडिया की भूमिका के कारण इन्वेस्टमेंट की हकीकत और वादों को लेकर बहस छिड़ती रही सवाल-जवाब होते रहे हलांकि मोदी को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि उन्हें तो बस एक मिसाल कायम करने का जूनून था और इसी जद्दोजहद में मोदी ने गुजरात को इंडस्ट्री का सबसे पसंदीदा ठिकाना बना दिया। जिसके चर्चे विदेशों में होने लगे क्योंकि इन समिट में देश के टॉप बिजनेस लीडर शामिल हुए थे और इन टॉप बिजनेस लीडरों ने मोदी की तारीफ के ऐसे गुण गाये जिससे मोदी खबरों में छा गये और देखते-देखते मोदी ऊँचाइयों को छूने लगे फिर एक अहम् तैयारी करते हुए मोदी ने इन्वेस्टमेंट और डवलपमेंट का हाईवे तैयार किया जिस पर धीरे-धीरे चलते हुए उन्होंने “विकास पुरुष” के टाइटल पर अपना कब्जा कर लिया, जिसे दरअसल भूतपूर्व प्रधानमंत्री यानि कि मनमोहन सिंह ने कभी भी लेने की कोशिश ही नहीं की सच कहें तो ये सत्य है कि इन्हीं समिट और गुजरात के विकास की दर ने मोदी की इमेज को पीएम कैंडिडेट के तौर पर तैयार करके अवाम के सामने पेश कर दिया ये कहने की बात नहीं मोदी को फलक पर पहुँचाने की क्षमता बिजनेस के एनडोर्समेंट के कारण ही मिली है जो भाजपा के किसी भी दिग्गज के पास नहीं थी नमो के यहाँ तक पहुँचने का एक मतलब ये भी है कि कांग्रेस के ये अश्वधारी भ्रष्टाचारी जमींदोज हो गये कांग्रेस राज में हाईकमान अगर कुंभकरण की नींद सोये तो उसे जगाने के लिए नमो जैसे की हुंकार भी बहुत जरूरी थी अब विपक्षी पार्टियों को ये बात अच्छे से अपने गले में उतार लेनी चाहिए कि नमो स्वयं तो सत्तासीन नहीं हुए उन्हें देश की जनता ने स्वयं ही सत्ता भेंट की है अब आज अगर आप बाहरी मीडिया ताकतों को देखें तो मोदी को बिजनेस फ्रेंडली लीडर बताते हुए उनकी जीत की पड़ताल इकॉनमिक नजरिए से ही की गई है अगर सही आंकलन किया जाए तो आप पायेंगे कि दुनिया में सबसे बड़ा मुद्दा इकॉनमिक्स ही है, भारत में मुंह बाए खड़े इस मुद्दे की तरह नहीं जो जाति, धर्म या क्षेत्र में सिमट कर रह गई है हमारे नेता ये नहीं जानते हैं कि भारत में युवाओं की आबादी बहुतायत मात्रा में हैं युवाओं के लिए इकॉनमिक्स ही सबसे बड़ा मुद्दा था जिस पर मोदी ने बिसात बिछाकर अपनी उंगली रखते हुए युवाओं को ये भरोसा दिलाया कि (आप हैं, तो हम हैं,आपकी समस्याएं हमारी है जिन्हें हम अपनी क्षमताओं के चलते हर संभव पूरा करने की कोशिश करेंगे आप हमारा साथ दीजिये हम इस देश को बदल कर रख देंगें) अब देखना ये है कि मोदी के सपनों का भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा या यूँ ही दूसरी पार्टियों के द्वारा दिए हुए लुभावने वादों की तरह सिमट कर रह जाएगा साम्प्रदायिकता के नाम पर मोदी का अंध बिरोध करने  वाली विपक्षी पार्टियाँ ये भूल गई थी कि भारत की आवाम खासकर युवा वर्ग को बरगलाना इतना आसान नही है देखते-देखते मोदी ने एक झटके से गुजरात की हदें पार कर लीं और पूरे देश की निगाहों में चढ़ गए उनकी हांथों की लकीरों ने और उनके होसलों ने वो उड़ान भरी कि फिर सीधे दिल्ली का तख्तोताज उनके लिए बेचैन हो उठा और उनके सितारों ने उनका नाम देश की चेतना में उकेर दिया! नतीजा आपके सामने है आवाम ने इस चुनाव में जम कर इसका उत्तर दिया लेकिन देश के युवाओं में थोडा खौफ बरकार है युवाओं ने अपने टोटल मतों का प्रयोग भाजपा पर एक नई किरण की उम्मीद लगाकर मोदी की झोली में डाला है क्योंकि भाजपा के पिछले शासन काल में नीतियों के अनुसार सभी सेक्टर में नौकरी में कमी देखी गयी थी इस बात का अंदाज़ा अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में “संघ लोक सेवा आयोग” में ही हजार सीट से दो सौ के पास आ गयी थी और कई मेधावी प्रतियोगी इस सेवा से वंचित रह गए थे फिर जब कांग्रेस सरकार आई तो थोड़ी स्थिति सुधरी थी परंतु इसमें भी आश्चर्यजनक कई बदलाव ने प्रतियोगीयों को घोर निराशा मे ला खड़ा किया वहीँ देखा जाए तो 2014 के “यूपीएससी”के नोटिफिकेशन भी अभी तक नही आ पाये है जिससे यह पता चल सके की बदलाव क्या हुआ है जबकि अगस्त में प्रारम्भिक परीक्षा होनी हैं हालांकि युवा वर्ग इन हालातों में भी मोदी की ओर एक आशाभरी निगाह से निहार रहा है  और वहीँ आवाम ये चाहती है कि अब मोदी आ गए है तो अच्छे दिन आ गए है यानि कि मोदी वो अलादीन का जादुई चिराग हैं जो पलक झपकते ही सारे सपनों को पूरा कर देंगे मैंने एक जगह पढ़ा था उसमें लेखक ने अपनी लेखनी के द्वारा मोदी से जो मांगें मांगी हैं उनको सिलसिलेवार में लिखती हूँ जरा पढियेगा आप लोग, लेखक कहता है कि…. ( इस देश की जनता और युवा पीढी ने क्या सोचा है हर वक्त एक ही नाम लेते हैं मोदी, मोदी, मोदी !!! मुझे लगता है कि पांच साल नहीं अब तो 10 साल तक यह मोदी नामा चलता रहेगा। लेकिन मैं एक आम आदमी और एक आदमी के नजरिए से ही सोचती हूं। भई मेरे लिए अच्छे दिन तब आयेंगे जब मेरे घर का बजट, सिलेंडर, पैट्रोल, डीजल के दाम नहीं बढ़ेंगे, खाद्य पदार्थों, बस व रेल किराया नहीं बढ़ेगा। सड़कों पर सफाई, अतिक्रमण बंद होगा। सर्विस टैक्स हटेगा, जो चैन से होटल में खाना भी नहीं खाने देता।  बिजली, पानी भरपूर मात्रा में मिलेगा। सड़कों पर गड्ढे नहीं होंगे सबसे बड़ी और खास बात जिस दिन मैं सड़क पर बेखौफ होकर सुरक्षित चलने का अहसास करूंगी, शायद तभी मैं कहूंगी कि अब अच्छे दिन आ गए हैं जिसका मैं पूरी उम्मीद के साथ इंतजार करूंगी, तब मैं भी इत्मीनान से कहूंगी, अब सचमुच अच्छे दिन आ गए हैं)….. ये सारी मांगे पढ़कर मेरा दिमाग घूम गया कि आज का युवा वर्ग और महिलाओं ने मोदी से कितनी उम्मीदें लगा रखी हैं आवाम ये क्यों नहीं सोचती कि इन उम्मीदों का पूरा होना इतनी जल्दी संभव नहीं है इसके लिए अभी हमें थोड़ा धीरज और इंतजार करना पड़ेगा, यह काम एक दो दिन या महीने में नहीं होगा बहुत समय लगेगा आप लोगों को ये तो समझना चाहिए कि नई सरकार अभी एक आद साल तो पिछली सरकार की कमियों को पूरा करने में जरुर लगाएगी और इन कमियों को दूर करने के साथ-साथ देश की तमाम योजनाओं पर कार्य करेगी अगर आवाम की मांगें जायज हैं तो मुझे लगता है कि मोदी को सबसे पहले इन समस्याओं को देखना होगा और धीरे-धीरे ही सही इन पर अमल करना होगा क्योंकि जनता एक साल नहीं पूरे पांच साल देती है और पांच साल बहुत होते हैं एक मुल्क को संवारने के लिए फिर चाहे वो राज्य की नायकी हो या देश की नायकी | क्या आपको नहीं लगता कि देश की जनता गजनी नामक रोग से ग्रसित होने के साथ-साथ उदार भी है लेकिन जब वक्त आता है तो नायक से खलनायक बनाने में देर नहीं लगाती | अभी ज्यादा दिनों की बात नहीं है पिछले वर्ष 29 दिसंबर को हमने हमारे देश की राजधानी दिल्ली में केजरीवाल के शपथ ग्रहण में जनता को केजरीवाल के प्रति अपार श्रद्धा के चलते भावना में बहकर रोते देखा था। वहां मौजूद हर एक शख्स ये कह रहा था कि अब हम सब आराम से सो सकते हैं क्योंकि देश को हमारा मसीहा मिल गया है लेकिन फिर क्या हुआ कुछ दिन सरकार चली बाद में लुढ़क गई और जनता को दे गई एक लम्बी वादों की लिस्ट जो कभी पूरी नही हो सकती, जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करना कहाँ तक उचित है अगर ये लोग इसी तरह की सियासत करेंगे तो क्या इतना अपार जन समर्थन फिर कभी मिल पायेगा देखा जाए तो युवा और उम्मीद दोनो एक-दूसरे के प्रतिरूप होते है देश जितना युवा है, उतनी ही उम्मीदे भी है, हमारी उम्मीदे जल्दी साकार हो !
आवाम का सकारात्मक भय सुरक्षा के लिहाज से उचित है और ये भी तय है कि बाजारवादी सभ्यता और पूंजीवादी सभ्यता को बढ़ावा देनी वाली भाजपा की जन-भावना देश के हित में है और इसी के चलते आम आदमी की ज़रुरतो को अब मोदी सरकार नकार नहीं सकती वरना जनता जनार्दन दुबारा होने वाले मतदानों के जरिये वापस उसी जगह पंहुचा देगी तो अब हम अपने मुद्दे पर आते हुए ये कह सकते हैं कि पहली बार अपनी दम से जीत चुकी भाजपा के लिए इस चुनाव परिणाम ने बहुत बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं भाजपा के लिए यह चुनाव परिणाम एक ऐतिहासिक जीत से ज्यादा कड़ी धूप की तपन में बेदम होने जैसा हो गया है क्योंकि तेज धार की तलवार पर नंगे पांव चलकर अपने पैरों को सुरक्षित रखना भी एक कला है जिसे इन्हें बखूबी आना चाहिए मैं अर्थनीति से भरे हुए बड़े-बड़े बोल नहीं बोलना चाहती हूँ लेकिन हाँ इतना तो अवश्य कहूँगी कि कुछ ऐसे प्वाइंट हैं जो एक सफल प्रधानमंत्री को मालुम होने चाहिए जिनको अजमाते हुए एक बेहतरीन शुरुआत हो सकती है जिससे मोदी आवाम की नजरों में खरे उतर सकते हैं लेकिन इन हालातों में अगर मोदी को आवाम की कसौटी पर खरे उतरना है तो मोदी को चाहिए कि आवाम को अपने प्रशासनिक सुधार का विस्तार से ब्यौरा देवे और नौकरशाही की धीमी चाल को बदलने के साथ-साथ काबिल बनाने के लिए अपनी नीतियों को आवाम के सामने  स्पष्ट करें क्योंकि आज के हिन्दुस्तान में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए यहां की लालफीताशाही, भ्रष्टाचारियों की तानाशाही, नेताओं की मौजमस्ती, प्रशासनिक अफ़रा-तफरी और सांसदों की अकुशलता ज़िम्मेदार है जिसे बदलने के लिए कड़े से कड़े कदम उठाये जाने चाहिए क्योंकि ये एक अहम् मुद्दा है जिसकी बजह से इतने भ्रष्टाचारी पल बढ़ रहे हैं इन रिश्वतखोरों के रूप में एक बड़ी तादाद में बिचौलिए और दलाल मौजूद हैं आप किसी भी सरकारी या गैर सरकारी दफ्तर में, सचिवालय में कोई भी कार्य को बिना मुठ्ठी गरम किये बिना नहीं करवा सकते और दूर क्यों जाते हैं प्रदेशों  के मुखियायों की नाक के नीचे ये कार्य होते हैं और मुखिया बेखबर होता है क्या ऐसा संभव है कि मुखिया इन बातों से बेखबर हो ? मुझे नहीं लगता कि मुख्यमंत्री इन बातों से बेखबर होता है मुख्यमंत्री के द्वारा लगाए हुए दरबार में मुख्यमंत्री से मिलने के लिए जाकर देख लीजिये बिना रिश्वत दिए व्यक्ति अन्दर नहीं जा सकता गरीब अपना दुखड़ा सुनाने के लिए महीनों इन्तजार करके अनुमति पाता है फिर घंटों लाइन में लगा रहता है और उसके बाद अन्दर जाने के लिए एक मोटी रकम हाँथ में दबानी पड़ती है तभी उसको उसके आका तक जाने की इजाजत मिलती है अब इस सबको देखते हुए क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि विकास के फायदे सबसे कमजोर तबकों तक पहुंच पाते होंगे, इस सबको मद्देनजर रखते हुए मोदी को ये स्पष्ट करना चाहिए कि इस बाबत वह क्या करने जा रहे हैं ? अब ऐसे बिगड़े हुए माहौल में मोदीमय सरकार को प्रशासनिक सख्ती पर विचार करना चाहिए, देश में खुशहाली और सम्रद्धि के साथ ही बेलगाम जनसंख्या वृद्दि पर अंकुश अवश्य लगना चाहिये क्योंकि इससे देश की अर्थव्यवस्था पर जोर पड़ता है, हर क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ ही मजदूरी का स्तर भी बढ़ना चाहिए, शिक्षा नीति में आमूल परिवर्तन की जरूरत है. क्योंकि अच्छी शिक्षा आज आम जनता की पंहुच से कोसों दूर है, एक ढांचागत विकास होना चाहिए और वहीँ सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि मोदी सरकार को चाहिए कि पीढ़ियों से जमे बैठे इन भ्रष्टों को चलता कर दे ये वो कोढ़ की जड़ हैं जिसमें हमेशा सरकारी फाइलें उलझ कर रह जातीं हैं ये वो कोढ़ के कीड़े हैं जो प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत काम करते हैं जैसे कि मैन्युफैक्चरिंग, एंटरप्राइज, स्किल डिवेलपमेंट, इन्वेस्टमेंट, आदि पर बनाई गयीं कमिटियां और ये कमिटियाँ कभी नहीं बदलतीं फिर चाहें सरकारें ही क्यों न बदल जाएँ क्योंकि इन कमिटियों में वही उद्योगपति राज करते हैं जो औद्योगिक संघों और लॉबीज़ पर भी काबिज रहते हैं  इन कीड़ों की जड़ें इतनी मजबूत होतीं है कि सरकारों को ऐसे-ऐसे फैसले लेने के लिए विवश कर देते हैं, जो देश के हित में नहीं होते, पीढ़ी दर पीढ़ी इन पर राज करने वाले इन चाटुकारों को अब मोदी सरकार को चलता कर देना चाहिए, गाँव में जो किसान अपनी जमीन का समुचित दोहन नहीं कर पा रहा है उस किसान सहित और जो भूमिहार है उसके लिये भी सम्मानपूर्वक अपने जीवन यापन के लिये कई मार्ग खोल देने चाहिये, और इसके साथ ही किसान को कृषि उत्पादन पदार्थों को लेकर बाजार में उचित दाम मिले एक ऐसा नियम भी लागू करना चाहिए, हेल्थ केयर के क्षेत्र में प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को आगे बढ़ाने पर काम अवश्य होना चाहिए अक्सर ये देखा गया है कि कुछ अल्पसंख्यकों का इस्तेमाल सिर्फ वोट बैंक के तौर पर किया जाता है किसी भी कम्यूनिटी को निशाना न बनाते हुए सब धर्मों का विकास होना चाहिये जिससे आपकी छवि पर विपक्षियों के द्वारा लगाए हुए दाग धुल सकें आर्थिक और सामाजिक विकास के सपने कितने भी आकर्षक क्यों न हों, उसपर धार्मिक द्वेष और विभाजन के छींटें नहीं पड़ने चाहिए नहीं तो उसकी भारी कीमत सत्तासीन सरकार के साथ-साथ समूचे देश को चुकानी पड़ती है इसलिए मोदी सरकार को ये समझना होगा कि राजनैतिक ताकत की इमारत सांस्कृतिक नींवों को नज़रअन्दाज़ करके नहीं बनाई जा सकती, इस बात को आने वाली सरकार को बड़ी गम्भीरता से लेना पड़ेगा, क्योंकि सत्ता की खासियत ये है कि वहां कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता जो सरकार जितने वादे करती है उसकी हकीकत साल भर में सामने आ जाती है और कुछ भले हो न हो लेकिन इससे आवाम के भ्रम की स्थिति तो दूर हो जायेगी! एक अहम मुसीबत जिससे आज के अधिकारी व मंत्री अछूते नहीं हैं ये कानून की सरेआम धज्जियाँ उड़ाते हुए अपराध करते हैं कानून न मानने वाले अधिकारियों और मंत्रियों को सजा अवश्य दी जानी चाहिए अपराधियों पर कानून के लिए डर और इज्जत पैदा करना आपकी प्राथमिकता होनी चाहिए! इस देश को उस उंचाई तक पहुँचाने के लिए आवश्यकताएं तो बहुत हैं सीधी सी बात है कि अब देश ना तो तुष्टिकरण से चल सकता है और ना ही उपेक्षा से, चाहे वो किसी भी समाज की हो, तो फिर कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि देश का विकास अत्यंत जरूरी है और उम्मीद करते है कि हमारे देश का भविष्य, हमारी आशा के अनुरूप ही हो वरना एक गलती का नतीजा अगले चुनाव में भाजपा को अपनी हार से भुगतना पड़ सकता है हालांकि आगे के लिए कुछ कहा नही जा सकता वैसे फिर पांच सालों तक सरकार से उम्मीद करना अवाम की मज़बूरी है मैं ये जानती हूँ कि आम आदमी ने मोदी को चुनते समय बहुत सोच विचार किया है आवाम को ये पता है कि जब गुजरात का विकास हो सकता है तो सम्पूर्ण भारत का क्यो नहीं हो सकता ? केन्द्र मे मजबूत सरकार होने से अर्थव्यस्था मे वैसे भी मजबूती आती है  मोदी अपने वादे में कहाँ तक खरे उतरते है इसका फैसला 2019 मे जनता स्वयम् कर देगी यहाँ पर अंत में यही कहना चाहूंगी कि मोदी या किसी अन्य का बिरोध या समर्थन करना किसी का भी निजी अधिकार है लेकिन सच्चाई को नकारते हुये केवल अंध बिरोध करना गलत है…….

सुनीता दोहरे..

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
July 17, 2014

बहुत गहन राजनैतिक विश्लेषण आदरणीया |राजनीतिक शास्त्र की अहमियत आज तक किसी पार्टी ने नहीं समझी अगर समझा है तो सिर्फ कुर्सी की अहमियत को,वास्तव में यही सच है |

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    July 17, 2014

    pkdubey जी, आपका बहुत -बहुत धन्यवाद, सादर नमस्कार !!!!!

juranlistkumar के द्वारा
June 25, 2014

आदयणीया सुनीता दोहरे जी !आपका लेख एक सुन्दर विस्तृत लेख है जिसमे आपने मोदीजी की सफलता के मूल को लोगों तक पहुँचाने का पूरा सफल प्रयत्न किया है और साथ में अपनी इन यतार्थपूर्ण लाइनों में वो प्रश्न भी कर दिया जो की मोदी की अब आने वाले दिनों की सफलता का लिटमस टेस्ट होगा– “मुझे लगता है कि पांच साल नहीं अब तो 10 साल तक यह मोदी नामा चलता रहेगा। लेकिन मैं एक आम आदमी और एक आदमी के नजरिए से ही सोचती हूं। भई मेरे लिए अच्छे दिन तब आयेंगे जब मेरे घर का बजट, सिलेंडर, पैट्रोल, डीजल के दाम नहीं बढ़ेंगे, खाद्य पदार्थों, बस व रेल किराया नहीं बढ़ेगा। सड़कों पर सफाई, अतिक्रमण बंद होगा। सर्विस टैक्स हटेगा, जो चैन से होटल में खाना भी नहीं खाने देता। बिजली, पानी भरपूर मात्रा में मिलेगा। सड़कों पर गड्ढे नहीं होंगे सबसे बड़ी और खास बात जिस दिन मैं सड़क पर बेखौफ होकर सुरक्षित चलने का अहसास करूंगी, शायद तभी मैं कहूंगी कि अब अच्छे दिन आ गए हैं” सुन्दर तर्कपूर्ण लेख के लिए साधुवाद.

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 28, 2014

    juranlistkumar जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमस्कार

samarpathan के द्वारा
June 13, 2014

GREAT WRITING! दीदी SALUTE YOUR THOUGHTS AND GREAT लेख ! SAMAR

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 22, 2014

    samarpathan जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम

sadguruji के द्वारा
June 13, 2014

आदयणीया सुनीता दोहरे जी ! सादर अभिनन्दन ! बहुत अच्छा और निष्पक्षतापूर्ण लेख ! प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत आने वाली भ्रष्ट और पूंजीपतियों के प्रभुत्व वाली कमेटियों को भंग करने का सुझाव बहुत अच्छा है ! इस सार्थक लेख के लिए आपको बधाई !

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 22, 2014

    sadguruji जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम

Ravindra K Kapoor के द्वारा
June 13, 2014

आपका लेख एक सुन्दर विस्तृत लेख है जिसमे आपने मोदीजी की सफलता के मूल को लोगों तक पहुँचाने का पूरा सफल प्रयत्न किया है और साथ में अपनी इन यतार्थपूर्ण लाइनों में वो प्रश्न भी कर दिया जो की मोदी की अब आने वाले दिनों की सफलता का लिटमस टेस्ट होगा– “मुझे लगता है कि पांच साल नहीं अब तो 10 साल तक यह मोदी नामा चलता रहेगा। लेकिन मैं एक आम आदमी और एक आदमी के नजरिए से ही सोचती हूं। भई मेरे लिए अच्छे दिन तब आयेंगे जब मेरे घर का बजट, सिलेंडर, पैट्रोल, डीजल के दाम नहीं बढ़ेंगे, खाद्य पदार्थों, बस व रेल किराया नहीं बढ़ेगा। सड़कों पर सफाई, अतिक्रमण बंद होगा। सर्विस टैक्स हटेगा, जो चैन से होटल में खाना भी नहीं खाने देता। बिजली, पानी भरपूर मात्रा में मिलेगा। सड़कों पर गड्ढे नहीं होंगे सबसे बड़ी और खास बात जिस दिन मैं सड़क पर बेखौफ होकर सुरक्षित चलने का अहसास करूंगी, शायद तभी मैं कहूंगी कि अब अच्छे दिन आ गए हैं” सुन्दर तर्कपूर्ण लेख के लिए साधुवाद. सुभकामनाओं के साथ ..रवीन्द्र के कपूर

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 22, 2014

    Ravindra K Kapoor जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम


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