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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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मानव बनके जालिम ने, दानव की शक्ल चुरा ली

Posted On: 13 May, 2014 Others में

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सुनीता दोहरे प्रबंध सम्पादक

मानव बनके जालिम ने, दानव की शक्ल चुरा ली

ये आइना है रंगमंच का, बचा न कोई  खेल से इसके खाली
रंग के इसमें, छल कपट की, सब भ्रष्टों ने खूब ही होली खेली

सब मेरा है सब मेरा है करके, रिश्तों में आग लगा ली
महंगाई के इस दौर में, रोटी से उसकी थाली रही थी खाली

शहर था उसका, गाँव था उसका, पर मिला न कोई माली
मरता क्या न करता, भूख ने रिश्तों की बलि चढ़ा दी

ये माली और वो माली, फिर गया ना कोई खाली
मानवता को मार के उसने, दौलत ही दौलत भर डाली

यूँ तो ख़ुदा ने बख्शी थी, उसको रंग-ए-वफा की लाली
पर मानव बनके जालिम ने, दानव की शक्ल चुरा ली

क्या खूब तूने आवाम के क़त्ल की तरकीबें निकाल ली
मर जाएँ बिन पानी के ये बन्दे, पानी से भी दौलत संभाली

हर बूथ पे एक-एक चमचा बैठा, बूथ कैप्चरिंग करा ली
फंस के झूठे वादों पे, जनता ने अपनी कुगति करा ली

हाँथ जोड़ के खड़ा जुआरी, दांव जाए न कोई खाली
हमें देखना, हमें है करना कह, झूठों की सरकार बना ली

हादसों के इस देश में जब से, आई छटा निराली
टूजी, धरनी और कैग से, खूब छक के करी दलाली

मेरी कुर्सी मेरी ही रहेगी, तूने उसपे नजर क्यों डाली
जाति-धर्म की डगर पे चलके, सियासत की डोर संभाली

वी०आई०पी० नेताओं ने इससे अपने धंधे की आस लगा ली
लोकतंत्र की हड्डियों, खाल और मांस की खुले आम दुकान लगा ली

अपराधी जगत के दबंगों ने, हर पार्टी में अपनी धौंस जमा ली
बोफोर्स, चारा, टेलीकॉम, हवाला जैसे घोटालों की घोंट पिला ली

अदालत में जज, वर्दी में फर्ज, आज इंसान ने इंसानियत बेच डाली
कानून जेल में, खिलाड़ी खेल में, सन्तरी ने मंत्री की कुर्सी बेच डाली

सुनीता दोहरे
प्रबन्ध  सम्पादक
“इण्डियन हेल्पलाइन”
राष्ट्रीय मासिक पत्रका

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

juranlistkumar के द्वारा
June 25, 2014

बहुत खूब लिखा आपने ! सादर नमस्कार सुनीता दोहरे जी !! मैं आपकी हर रचना पढता हूँ कभी मेरे ब्लौग पर भी पधारे !! सादर अभिनन्दन !!

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 28, 2014

    juranlistkumar जी , मेरे लेख पढने के लिए दिल से आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम

deepak pande के द्वारा
May 14, 2014

कोसता है हर कोई एक दूजे को अजब ये धरती निराली अबकी स्वयं में लाएंगे परिवर्तन hamne kasam ये kha lee

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 22, 2014

    deepak pande जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम


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