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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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अमृता राय ने आखिर दिग्विजय सिंह में क्या देखा ????

Posted On: 30 Apr, 2014 Others में

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सुनीता दोहरे प्रबंध सम्पादक

अमृता राय ने आखिर दिग्विजय सिंह में क्या देखा ????

प्रत्येक की अपनी निजी जिंदगी होती है तथा उसका सम्मान होना चाहिए. भारत में निजी जिंदगी में तांक-झांक के कारण कई जिंदगियों में भूचाल आ रहे हैं तथा कई प्रतिभाएं मर रही हैं.. हमारे भारतीय समाज में स्वस्थ मानसिकता है ही कहाँ ? कई सारी बुराईयों के पीछे भी यह मानसिकता है , अभी कुछ समय से कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह और टीवी एंकर अमृता राय ने ट्वीटर पर धमाल मचा दिया है
कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने टीवी एंकर अमृता राय से रिश्‍ते की बात कबूल करते हुए ट्वीट कर कहा कि, मुझे यह स्‍वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि अमृता राय से मेरे रिश्‍ते हैं अमृता ने अपने पति से तलाक के लिए केस फाइल कर दिया है एक बार तलाक की प्रक्रिया पूरी हो जाए तो हम इस रिश्‍ते को औपचारिक रूप दे देंगे, लेकिन अपनी निजी जिंदगी में किसी तरह की दखल की मैं निंदा करता हूं. और वहीँ दूसरी तरफ राज्यसभा की टीवी में एंकर अमृता राय ने भी ट्वीट करके अपने पति से अलग होने की बात कबूल कर ली है उन्‍होंने ट्वीट किया, मैं अपने पति से अलग हो गई हूं और हमने तलाक के लिए कागजात दाखिल कर दिए हैं उसके बाद मैंने दिग्विजय सिंह से शादी करने का फैसला किया है !!!!!
इन दोनों चर्चित व्यक्तियों की हरकत से इनकी कितनी बदनामी हो रही है इसका इन्हें शायद अंदाजा नहीं है इन दोनों के रिश्तों को लेकर ट्वीटर पर भी इनकी निजी तस्वीरें दिखाएँ जा रहीं हैं ! इतना सब होता तो ठीक था लेकिन दिग्विजय सिंह और अमृता के निजी जीवन की जिस तरह की तस्वीरों को न्यूज चैनल पर दिखाया जा रहा है। ऐसे में लानत है IIMC के उन सीनियर्स पर जो देश के हर मीडिया में उच्च पदों पर विराजमान हैं। इनमे से कई IIMC में आनंद प्रधान सर से मीडिया इथिक्स की पढाई भी पढ़ चुके हैं, ये सब देख सुनकर क्या आपको नहीं लगता कि मीडिया की जिन घिनौनी प्रवृत्तियों पर आप लगातार ऊँगली उठाते रहे हैं, वह समय के साथ और अमानवीय और क्रूर होती जा रही हैं…….
लेकिन इन सब बातों का असर एक प्रतिष्ठित व्यक्ति जो अमृता राय की जिन्दगी से कभी जुड़ा था उसकी मान मर्यादा को कितनी ठेस पहुँच रही है इसका अंदाजा शायद इस कांग्रेसी नेता और अमृता राय को भी नहीं है !!
आनंद प्रधान जो मीडिया जगत की एक जानी मानी हस्ती हैं खुद उन्होंने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर पोस्ट लिखकर अपनी बात रखीं है कि……
((((((मैं एक बड़ी मुश्किल और तकलीफ से गुजर रहा हूँ यह मेरे लिए परीक्षा की घडी है मैं और अमृता लम्बे समय से अलग रह रहे हैं और परस्पर सहमति से तलाक के लिए आवेदन किया हुआ है एक कानूनी प्रक्रिया है जो समय लेती है लेकिन हमारे बीच सम्बन्ध बहुत पहले से ही खत्म हो चुके हैं अलग होने के बाद से अमृता अपने भविष्य के जीवन के बारे में कोई भी फैसला करने के लिए स्वतंत्र हैं और मैं उनका सम्मान करता हूँ उन्हें भविष्य के जीवन के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं !!!!
मैं जानता हूँ कि मेरे बहुतेरे मित्र, शुभचिंतक, विद्यार्थी और सहकर्मी मेरे लिए उदास और दुखी हैं, लेकिन मुझे यह भी मालूम है कि वे मेरे साथ खड़े हैं मुझे विश्वास है कि मैं इस मुश्किल से निकल आऊंगा मुझे उम्मीद है कि आप सभी मेरी निजता (प्राइवेसी) का सम्मान करेंगे शायद ऐसे ही मौकों पर दोस्त की पहचान होती है उन्हें आभार कहना ज्यादती होगी,
लेकिन जो लोग स्त्री-पुरुष के संबंधों की बारीकियों और स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व और व्यक्तित्व को सामंती और पित्रसत्तात्मक सोच से बाहर देखने के लिए तैयार नहीं हैं, उसे संपत्ति और बच्चा पैदा करने की मशीन से ज्यादा नहीं मानते हैं और उसकी गरिमा का सम्मान नहीं करते, उनके लिए यह चटखारे लेने, मजाक उड़ाने, कीचड़ उछालने और निजी हमले करने का मौका है लेकिन वे यही जानते हैं उनकी सोच और राजनीति की यही सीमा है. उनसे इससे ज्यादा की अपेक्षा भी नहीं)))))))))
कभी-कभी व्यक्ति अपने विचारों से इतना ऊपर उठ जाता है कि उसके लिये कोई भी शब्द छोटा लगने लगता है अहसास होता है हम विचारों और भावनाओं से कितने दूर होते जा रहे हैं, हाँ मैं जानती हूँ कि आनन्द प्रधान जी को किसी सहानभूति की ज़रूरत नहीं है वो खुद मैं बहुत ही सुलझे हुए व्यक्ति हैं, लेकिन आपकी इस पोष्ट ने मुझे झकझोर दिया है, वो इसलिए कि कितने दिनों से इस दर्द को सहने के बाद आपने तब इस बात को जाहिर किया जब तक स्वयं इस कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह और अमृता राय ने खुद ट्वीटर पर कुबूल नहीं किया !!!!!
आनन्द सर, हम क्या सारी दुनियां ये बखूबी जानती है कि आपके लिए यह फैसला लेना हरगिज़ आसान नहीं रहा होगा क्योंकि सच्चाई को स्वीकार करते हुए उसका सामना करने की हिम्मत कम ही लोगों में होती है जो यकीनन आप में है, देखा जाए तो सच्चे अर्थों में आपने नारी की स्वतंत्रता का सम्मान किया हैं इसलिए ऐसे व्यक्तियों को ये समझना चाहिए कि उनकी मर्दानगी इसी में है कि वो दूस्र्रों की स्वतंत्रता का सम्मान व रक्षा करें न कि हनन करें !
वो कहते हैं कि भावनाओ को समझने और महसूस करने की शक्ति सिर्फ मनुष्यो में ही होती है तभी सभ्य समाज में एक मर्यादा होती है हम कभी कभी अपने मर्यादा को कब पार कर लेते हैं हमे इसका एहसास तक नहीं हो पाता और हम पशुवत व्यवहार करने लगते हैं हमें ये सब सोचने समझने का समय ही नहीं मिल पाता कि हम कितने लोगों की भावना को आहत कर रहे हैं हम इतने असंवेदनशील कैसे और कब हो जाते हैं ? ये सोचना बहुत ही आवश्यक हो गया है आज फेसबुक पर आनंद प्रधान जी का पोस्ट ह्रदय को स्पर्श करने वाला था पढ़कर थोड़ी देर तो मैं कुछ सोच ही नहीं पाई, नम आखों के साथ ये दर्द झलका, कि एक व्यक्ति के लिए ये कितना कष्टप्रद होगा जब उसका जीवनसाथी जिसने उसके साथ सात फेरे लेकर कसमें खाई हों, वो प्रेम का झूठा नाटक कर एक ऐसे व्यक्ति को अपना ले जहाँ उसकी जिन्दगी में काले अँधेरे के सिवा कुछ न हो और वो भी मात्र सियासत, शोहरत और धन का ढेर लगाने के लिए !!!!!! कभी-कभी सोचती हूँ कि क्या इसी देश में सीता माता जैसी महान नारियों ने जन्म लिया था ? सीता माता अपने पीछे एक आदर्श छोड़कर गयीं हैं क्या जनका दुलारी से इस देश की नारियों ने कुछ न सीखा !
इस बात में कोईं संदेह नहीं कि आपके विचार वर्षों तक पत्रकारिता के विद्यार्थियों को प्रेरणा देते रहेंगे ये महज एक घटनाक्रम है और इससे आपके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। दुनिया में लाखों लोगों के साथ ये सब हो रहा है मेरा मानना है कि इससे देश की आवाम और खास तौर मीडिया हाउस को कोई लेना देना नहीं होना चाहिए लेकिन मामला दिग्विजय सिंह से जुड़ा है तो टीआरपी जरूर मिलेगी लेकिन समाज का कोई हित होने वाला नहीं है ऐसे तो देश में हर दिन हजारों लोगों कीं पत्नियां अलग़ होती है किसी के साथ शादी रचाती हैं थानों के रजिस्टर ऐसी वारदातों से भरे पड़े है और यही मीडिया जगत गरीबो के मामलों को कभी तबज्जो नही देती है मै भी इस मीडिया व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण अंग हूँ इसलिए बेहतर जानती हूँ।
पत्रकारिता लाइन में होने के कारण आनद प्रधान जी एक बात तो मैं आपसे अवश्य कहूँगी कि किसी एक रिश्ते के अंत के साथ जीवन का अंत नहीं होता बल्कि एक नयी शुरुत होती है संबंध बनते हैं, संबंध टूटते हैं और संबंधो का टूटना दुख देता है पर संबंधो की लाश ढोने से अच्छा है कि अलग हो जाना ही बेहतर है !
अगर आप उनसे ईमानदारी से निपट रहे हैं, तो इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लोग क्या कह रहे हैं आप एक विद्वान व्यक्ति हैं, आप इस स्थिति का सामना सफलता पूर्वक करने में सक्षम हैं मेरा नैतिक समर्थन आपके साथ हैं
आप कल भी हमारे मार्गदर्शक थे आज भी है और कल भी रहेंगे। इन खोखली बातों से आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ये हम सब जानते हैं,  हमारे दिलों में आपके प्रति श्रद्धा सदैव रहेगी।

सुनीता दोहरे …….

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

juranlistkumar के द्वारा
June 25, 2014

बहुत सुन्दर आपके विचार हैं आपके लेख पश्कर एक प्रेरणा मिलती हैआपने सही कहा है-पत्रकारिता लाइन में होने के कारण आनद प्रधान जी एक बात तो मैं आपसे अवश्य कहूँगी कि किसी एक रिश्ते के अंत के साथ जीवन का अंत नहीं होता बल्कि एक नयी शुरुआत होती है संबंध बनते हैं, संबंध टूटते हैं और संबंधो का टूटना दुख देता है पर संबंधो की लाश ढोने से अच्छा है कि अलग हो जाना ही बेहतर है ! सादर नमन

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    June 28, 2014

    juranlistkumar जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमस्कार

munish के द्वारा
May 8, 2014

इनकम और दिनकम

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 8, 2014

    munish जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम …

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 7, 2014

सुनीता जी कौन किसमे कब क्या देख लेता है उसमे क्या रस मिलता है क्या से क्या हो जाता है समय ही निर्धारित कर देता है लोग अस्त्र शस्त्र रख चल पड़ते हैं ….लेकिन अचानक ऐसे मोड़ न आएं तो बेहतर हो …ये भी सच कहा आप ने की रिश्तों की लाश न ढोया जाए ये भी सच है लेकिन जब तक गुंजाईश हो बनाने की कोशिश हो … विचारणीय आलेख , बेस्ट ब्लागर आफ दी वीक के लिए बधाई .. भ्रमर ५

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 8, 2014

    surendra shukla bhramar5 जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम …

tejwanig के द्वारा
May 3, 2014

आपने वाकई सही सवाल उठाया है

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 3, 2014

    tejwanig जी ,आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम …

Ravindra K Kapoor के द्वारा
May 3, 2014

पता नहीं क्यों मुझे ऐसा प्रतीत होता है की श्री दिग्विजय जी इस समाया ये सब जान भुज कर मीडिया का ध्यान नरेंद्र मोदी से हटाने के लिए कर रहे हैं. हो सकता है की ये मेरी धारणा सही न हो पर इस समय जब की कांग्रेस हार की कगार पर खड़ी है दिग्विजयसिंघ अपने प्रेम प्रसंग को सारे देश को क्यों दिखाना चाहते हैं. आपने अपने सुन्दर लेख मैं निजी संबंधों को जिस गरिमा को बचाये रखने की कोशिश की है वो तो आज के दौर मैं फेसबुक और ट्वीटर आदि के द्वारा लगभग समाप्त की जा चुकी है पर आपके इस सुन्दर प्रयास की मैं सराहना करता हूँ. सुभकामनाओं के साथ ….रवीन्द्र के कपूर

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 3, 2014

    Ravindra K Kapoor जी ,आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम …

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
May 3, 2014

सुनीता जी कलम की जादूगरी है आप मैं …प्यार  जीव का स्वाभाविक अभिव्यक्ति है मनुष्य को अवष्य बंधनों मै बॅधना पडता है प्यार दबाये नही दब पाता है एक समय ऐसा आता है जब लगता है चीखो चिल्लाओ और गीत गाओ ..प्यार किया कोई चोरी नहीं की ,छुप छुप आहें भरना क्या ..महत्वाकांक्षाऐ और पेट्रोल काम करती है कामनाओ की पूर्ती हेतु कुटनीतिकता भी होती है ओम शांति शांति करते प्रवाह देखना पडेगा

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 3, 2014

    PAPI HARISHCHANDRA जी ,आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम …

sadguruji के द्वारा
May 3, 2014

आदरणीया सुनीताजी,बहुत बहुत बधाई.आपने सही कहा है-पत्रकारिता लाइन में होने के कारण आनद प्रधान जी एक बात तो मैं आपसे अवश्य कहूँगी कि किसी एक रिश्ते के अंत के साथ जीवन का अंत नहीं होता बल्कि एक नयी शुरुआत होती है संबंध बनते हैं, संबंध टूटते हैं और संबंधो का टूटना दुख देता है पर संबंधो की लाश ढोने से अच्छा है कि अलग हो जाना ही बेहतर है !

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 3, 2014

    sadguruji जी ,आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर प्रणाम …

May 3, 2014

पहली बात तो यह है कि एक औरत बहुत जल्द ही बिना विचार किए किसी दूसरी औरत के चरित्र का विश्लेषण करने लगती है। मीडिया और राजनीति का किस हद तक जुड़ाव है इस बात को आपको समझाने की जरूरत नहीं होंगी। आंनद प्रधान जी को आप इतने करीब से जानती है सुनीता जी, तो आप यह भी जानती होगी कि अमृता और आनंद प्रधान जी ने प्रेम विवाह किया था। फिर ऐसा क्या हुआ कि अपनी उम्र के 35 साल किसी पुरुष के साथ व्यतीत करने के बाद किसी अन्य पुरुष का सहारा लेने की जरूरत पड़ी। खैर आपने इन सब तमाम विषयों पर विचार नहीं किया होगा। यदि आप वास्तव में निजता का सम्मान करती तो आप इस प्रकार के विषय पर अपनी कलम चलाने की जरूरत नहीं समझती। मीडिया ने टीआरपी के लिए इस मामले को एक खेल का रूप दिया और आप जैसे खिलाड़ियों ने इस खेल में भाग लिया। सोचिए यदि आप जैसे लोग इस विषय को यह सोचकर नकार दें कि यह किसी के निजी जीवन से संबंधित है तो मीडिया कभी भी ऐसे मामले से टीआरपी नहीं ले पाएगी। लेकिन सुनिता जी आपको भी इस गर्मागर्म विषय पर लिखकर एक आदि कमेंट मिल ही गई बस वो ही काम मीडिया करती है। आपके लिए एक सलाह है कि इस प्रकार के विषयों पर लिखने से पहले पूर्ण जानकारी लीजिए नहीं तो फिर किसी अन्य विषय का चुनाव कर लीजिए क्योंकि मुझें यकीन है कि आपकी कलम को केवल चलने मतलब है..अब क्या लिख रही है इस विषय पर भला कौन ध्यान दें। मुझें संतोष मिल जाता यदि आप जैसी एक भी स्त्री इस विषय पर लिखने से पहले समाज, समाज द्वारा निर्मित की गई स्त्री की सीमा रेखाएं, पुरुष का नजरिया, एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का कारण या फिर मीडिया और राजनीति का संबंध जैसे तमाम विषयों पर विचार करती और फिर इस विषय पर टिप्पणी करती। खैर आपने भी बिना विचार किए, अपनी चुनौती में किसी अन्य औरत को सामने पाकर उसके चरित्र का विश्लेषण कर दिया।

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 3, 2014

    गुजारिश (कीर्ति चौहान) जितने भी आरोप आपने मुझ पर लगाये हैं क्या ये सही हैं ??? आप अपनी अंतरात्मा से पूछिए कि किस जगह मैंने क्या गलत लिखा है ? ज्यादा तो मैं कुछ कहना नहीं चाहती हूँ बस इतना कहूँगी कि किसी भी रिपोर्ट को पढ़े बिना किसी पर कोई भी गलत कमेन्ट मत करिए … आपके इस तरह के कमेन्ट से आपकी नियति व् आपकी सोच का पता चलता है …. एक बात और मेरी ध्यान से सुनिए मैं ऐसे किसी भी विषय पर तब तक नहीं लिखती हूँ जब तक उसके सुबूत और उसका गहन अध्यन न कर लूँ और मैडम इतना भी जान लीजिये मुझे कमेन्ट और टी आर पी की जरूरत नहीं दुनिया मुझे मेरी कलम की ताकत और सच्चाई से जानती है ….. मेरा वजूद ही मेरी ताकत है ,….

Shivendra Mohan Singh के द्वारा
May 3, 2014

हकीकत बयानी ये है की अमृता राय जी, दिग्विजय सिंह की करनी का फल भुगत रहीं हैं, मैं नहीं समझता हूँ की अगर दिग्विजय सिंह के अलावा और कोई होता तो इतना हल्ला गुल्ला और गुल गपाड़ा मचता, यहाँ तक की साधारण जन को तो ये भी नहीं पता था की आनंद प्रधान जी कोई विशेष शख्शियत हैं, मिडिया के भाई बंधू ही उन्हें जानते होंगे. हमारे सरीखे तो उनसे अनजान थे. लेकिन अब हाल ये है की अमृता राय और अशोक प्रधान जी की ज्यादा छीछालेदर हो गई है, बनिस्बत दिग्विजय सिंह के.

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 3, 2014

    Shivendra Mohan Singh जी , समय देकर प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद ………सादर प्रणाम …

OM DIKSHIT के द्वारा
May 3, 2014

आदरणीया सुनीता जी,आप के विचारों से सहमत हूँ.यह एक ऐसी भावना है, जो कब और क्यों पैदा होती है,कब स्त्री-पुरुष अपने मर्यादा की हदें पार करते हैं,कहना मुश्किल है.यह वह भी नहीं सोच पाते.दुर्घटना के बाद जब तक चेतते हैं,बहुत देर हो चुकी होती है.यह ऐसा मुकाम है,जहाँ से वापसी भी नहीं होती,लोगों की बातों को सुनने के अलावा कोई रास्ता नहीं सुझाई देता.बेस्ट ब्लॉग की बधाई.

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 3, 2014

    OM DIKSHIT जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद , सादर नमन ..

yamunapathak के द्वारा
May 2, 2014

suneeta ji best blogger ke roop mein chayanit hone aur ek sameekshatmak blog ke liye bahut bahut badhaii sabhar

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 3, 2014

    yamunapathak जी , आपने अपना कीमती समय देकर मुझे बधाई दी …… आपका बहुत -बहुत धन्यवाद , सादर नमन ..

jlsingh के द्वारा
May 2, 2014

आदरणीया सुनीता दोहरे जी, सादर अभिवादन! सर्वप्रथम आपको साप्ताहिक सम्मान की बधाई …आपने इस विषय को काफी गंभीरता से उठाया है और उम्मीद करता हूँ कि अनेक स्वच्छंद महिलाएं इनसे सीख लेंगी …पर दुःख होता है सुनंदा पुष्कर के लिए, अनुराधा बाली(उर्फ़ फिजा) के लिए और एयर होस्टेस गीतिका के लिए ऐसे अनेक उदहारण हैं … यह अवैद्य सम्बन्ध भी क्या बला है…. सादर!

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    May 3, 2014

    jlsingh जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद …. सादर प्रणाम ….

ranjanagupta के द्वारा
May 1, 2014

सुनीता जी मै सहमत हूँ ,आपकी बातो से !लोग अपने घरो को न देख कर दू सरो पर कीचड़ उछालते है ,किसको कितनी तकलीफ होती है ,ये कोई नही जानता !और रही नैतिक पतन की बात तो नैतिकता अब हमारे समाज में पिछड़ेपन का प्रतीक मानी जाती है ,ये सब आधुनिक महिलाये है ,जिन्हें अपने लिए पद धन की लालसा इतना पीड़ित किये रहती है कि वे कोई भी कदाचार को सदाचार मानने की जिद पर अदि रहती है !सादर !


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