sach ka aaina

अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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क्या आम आदमी होना अभिशाप है ?

Posted On: 23 Apr, 2014 Others में

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सुनीता दोहरे प्रबंध सम्पादक

क्या आम आदमी होना अभिशाप है ?

हाँ मैं एक आम आदमी हूँ मेरी ही अँगुलियों की स्याही के बल पर इन भ्रष्ट नेताओं की गाथा लिखी जाती है मेरी लम्बी कतारों के बल पर ही इनकी किस्मत टिकी रहती है और हमारी ही करतल की ध्वनियों से इनकी जीत का शंखनाद बज उठता है लेकिन अफ़सोस ! हमारे ही द्वारा बोये गए हमारे ही द्वारा सींचे गए और हमारे द्वारा पोषित किये गए पौधों को विकास रुपी फसल के रूप में काटने का सौभाग्य हमें क्यों नहीं मिलता तुम मेरे द्वारा रचित मुकुट पहनकर सरताज हो गए हो हमने जब भी अपनी हुंकारों से अपनी करतल से तुम्हारी करतल मिलाई है तभी तो तुमने ये सुहागिन रुपी राजनीति की दुल्हन पाई है इसलिए जरा गौर इधर भी करियेगा कि …हमीं से है अस्तित्व तुम्हारा और हम ही है तुम्हारे कर्ता धर्ता !!!!
मैं फिर कहूँगी कि हाँ मैं एक आम आदमी हूँ मैं देश को अनाज देता हूँ क्योंकि मैं एक किसान हूँ, मैं देश की सुरक्षा के लिए कुर्बान होने को अपनी संतान देता हूँ क्योंकि मैं देश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हूँ, हाँ और मैं ही देश की राजनीति को संवारने में अपना अतुल्य योगदान देता हूँ क्योंकि मैं एक आम आदमी हूँ तो फिर आम आदमी की किस्मत को, उसके विकास को कब अहमियत देंगे ये बगुलाधारी, जो मौका मिलते ही गरीब के मुंह से रोटी छीन लेते हैं !
मैं आम आदमी सिर्फ आम रह गया हूँ और तुम इस्तेमाल कर खास हो गये हो ! हम जैसे आम आदमी के दारोमदार पर इस राजनीति का आगाज और अंजाम हमेशा से टिका रहा है और रहेगा भी, तो फिर हमारी गणना राजनीति से परे क्यों की जाती है!
जो आम आदमी में गरीब, बीमार, बेरोजगार  तथा  अशिक्षित जैसी संज्ञायें लगाकर भेद करते हुए उनके कल्याण के नारे लगाने के साथ ही नारी उद्धार की बात करता है उनको ही खास बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है। लेकिन आज का आम आदमी इसी सोच पर अपने वजूद को मिटाकर चुप बैठ गया है कुछ पंक्तियों में बताना चाहूंगी कि ….
कर दी मैंने धन की माया कुटुंब हेतु न्योछावर,
तन घर की चारदीवारी हेतु किया है अर्पण !
मन का तर्पण कर दिया ईश्वर हेतु न्योछावर,
फिर शेष बचा क्या जो करूँ समाज हेतु मैं अर्पण !!

आम आदमी की इसी सोच ने कि मैं “आम आदमी हूँ क्यों मैं खास की आस लगाऊं” खुद आम आदमी को अपंग बना दिया है और नेताओं को भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी, सियासतखोर बनाकर आम आदमी के लिए हर खास आदमी को चिंतित कर दिया है और आम आदमी की चिंता ने ही इन नेताओं को “खासमखास” की परिभाषा को बखूबी समझा दिया है दुनियां की नजर में आम आदमी के लिए सारी योजनायें बनतीं हैं लेकिन कागजों पर, आम आदमी के नाम पर सैकड़ों योजनाये पनपती हैं लेकिन कागजों पर, आम आदमी उसका सुख भोगे उसके पहले ही खास आदमी की ताकत आम आदमी को हाथ पसारे खड़ा कर देती है फलस्वरूप आम आदमी मुंह बाए खड़ा रहता है क्योंकि वो आम आदमी होता है वैसे नए–नए आंदोलनों के चलते आम और खास का अंतर मिटाने की कवायदें लगातार जारी हैं ! इन खास आदमियों की नीयत इतनी बजनी है कि इनकी छाया से मुझे डर लगता है मेरी आत्मा इनकी झलक से डरती है इसलिए कि मैं “एक आम आदमी हूँ”….
सुनीता दोहरे……

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