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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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बन संवर के जब तुम आये, हजार आँखें जवां हुई थीं

Posted On: 27 Feb, 2014 Others में

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बन संवर के जब तुम आये, हजार आँखें जवां हुई थीं

स बार तो हमने ठान ही लिया है कि केजरीवाल का बखान करना है तो इस अंक में हमने मिस्टर दिल्ली को चुना है क्योंकि ‘मिस्टर दिल्ली ने बहुत ही उथल पुथल मचा रखी है अभी ज्यादा दिन नहीं हुए केजरी नामक सुनामी को आये हुए जो उन्चास दिनों तक दिल्ली में हलचल मचाते हुए आवाम के दिलों पर नश्तर चुभा गया और छोड़ गया अपने पीछे दिल्ली की सिसकियाँ जिन्हें अभी भी लोग दबी और धीमी जुबान में आह भरते हुए कह ही लेते है कि “हाय आम आदमी पार्टी तूने कहीं का न छोड़ा”,…
मिस्टर दिल्ली के राजनीती में काम करने की क्षमता जनता ने देखी नहीं थी, इसलिए सपनों के सहारे 28 सीटें मिल गईं मिस्टर दिल्ली को, जिससे “बिल्ली के भाग से छींका टूट गया और सरकार बन गई” !!!!!!!!!!!!!!
लेकिन धरने देना, आन्दोलन करना, सरकार चलाने से बिल्कुल विपरीत है ये सत्य है कि धरने करके जनता का ध्यान मूल मुद्दों से हटाकर अपनी जबाबदेही से बचना ही राजनीति की चालें हैं जो मिस्टर दिल्ली बखूबी सीख चुके हैं !
दिल्ली पुलिस दिल्ली सरकार के अधिकार में नहीं है, यह तो शीला दीक्षित और उससे पहले की सरकार के समय से दिल्ली वासी जानते है जब यही बात शीला दीक्षित कहती थी तो मिस्टर केजरी उनका मजाक उड़ाया करते थे बलात्कार जैसे घिनौने कृत्य तो शीला दीक्षित की सरकार में भी होते थे उस समय मिस्टर केजरी शीला दीक्षित के सिर पर मढ़ देते थे लेकिन अब जो बलात्कार हो रहे हैं तो केजरीवाल खुद के सिर पर न लेकर केन्द्र के सिर धरना करके खुद बचने का तरीका अपना रहे थे अब इसे क्या कहा जाता क्या ये राजनीति नहीं है ?
राजनीति तो सभी दल करते हैं, फिर मिस्टर केजरी की आप और अन्य पार्टियों में अंतर क्या हुआ ? यह तो वही हुआ कि दिल्लीवासी आसमान से गिरा और खजूर पर लटक गया ! शीला दीक्षित अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर डालती थी (बकौल केजरीवाल जब सरकार में नहीं थे) तो अब केजरीवाल अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर डाल कर पल्ला झाड़ रहे है !
अंतर वही “ढाक के तीन पात” फिर इन हालातों में कैसे केजरीवाल को उन्चास दिनों का सफल मुख्यमंत्री माना जाय……..
वैसे दिल्ली की आवाम सहित देश की आवाम ये भी जान गई है कि……

अंधे बैठे छाप रहे, बहरों की तकदीर ! ढोल के अन्दर पोल है, जाने सभी फकीर!!

भारत के दिल दिल्ली ने अपने उन्चास दिनों के शहंशाह को इतने अरमानों से अपना विश्वास, अपना प्यार, अपना मत दिया था या यूँ कहे कि मिस्टर दिल्ली पर आवाम को निहायत भरोसा था पर आप ने दिल्ली को धरनों का अखाड़ा बना कर रख दिया ! मैं तो यूँ कहूँगी कि…

खुद “खास’ बनके हमें “आम” बनाने का हुनर खूब सही
तेरे जाने का दर्द भी जनता के, कंधों पे आया खूब सही
यूॅं “आम” का बीज बो के, वो चल दिए दूर होके
आवाम के हिस्से में तो, सिर्फ रोना आया ये खूब रही……

आप की कितनी खूबियों का बखान करूँ मैं, आप के दिल में दिल्ली के लिए प्यार तो बहुत उमड़ा था देश से भ्रष्टाचार खतम करने की कसमें भी बहुत खाई थीं, फिर कहाँ गया “मिस्टर दिल्ली” आपका ये देश प्रेम ?
ओ भैया, या मिस्टर दिल्ली, या अवाम के खास या फिर यूँ कहूँ कि “हमें बना के आम और आप बन गए खास” ये दिल्ली है दिल्ली, बड़ी-बड़ी पार्टियों के दिग्गजों को नसीब ना हुई और तुम्हें मिली, वो भी पहली बार में, इसलिए ताश के पत्तों से घरौंदा बना बैठे तुम ! अरे मैं तो कहती हूँ दिल्ली ने दिमाग लगाया ही नहीं और आ गई तुम्हारे झांसे में, फंस गई बेचारी जो तुम जैसे बेबफा से दिल लगा बैठी बेचारी ने बिना आगे-पीछे की सोचे तुम्हारे इस बेबफाई से भरे पहले प्रपोजल को ही स्वीकार कर लिया और तुम अपने आपको शहंशाह समझ बैठे ! अब क्या कहें, दिल दिया था तभी तो अपनी बेबसी पर आंसू बहा रही है अगर दिमाग लगाती तो तुम्हें घुमाती रहती दो-चार चुनावों तक, तब कहीं जाकर तुम्हारे हाथ आती और तब ही तुम्हें दिल्ली की असली कीमत भी पता चलतीं, तुम समझ न पाए दिल्ली के दिल का दर्द, वरना दिल्ली आज यूँ ये न कहती कि ………

‘बन संवर के जब तुम आये, हजार आँखें जवां हुई थीं,

किये थे वादे दिल्ली से दिल के, क्या हुआ जो नजरें उस तरफ थीं”

तो मिस्टर दिल्ली अब हम आते हैं अपने टाॅपिक पर सच कहूँ, तो उन दिनों यानि उन उन्चास दिनों की बात कर रही हूँ मैं, उन दिनों एक बात जरुर थी जो हमें धीरे-धीरे टीस रही थी जिसका अंदाजा था मुझे वही हुआ जैसे कि जिस दिन मिस्टर दिल्ली ने यह घोषणा की थी कि जनलोकपाल के रास्ते में अगर कोई अड़चन आएगी तो मैं इस्तीफा दे दूंगा ! मैं उसी दिन समझ गई थी कि दिल्ली जल्दी ही बेवा हो जायेगी क्योंकि दिल्ली के इस नए सनम ने अपनी महबूबा से वादे इतने कर दिए थे जिन्हें पूरा करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था मैं ये अच्छे से समझ चुकी थी कि मिस्टर दिल्ली कुर्सी छोड़ो रूपी अपना लक्ष्य अवश्य भेदने में कामयाब हो ही जाएंगे। मात्र उन्चास दिन की उठा पटक में ही दिल्ली के शहंशाह उल्टे हो लिए और वो भी क्यों क्योंकि दिल्ली की रानी शतरंज की मशहूर खिलाड़ी जो ठहरी, तो ऐसे में बेचारे आम आदमी की क्या बिशात जो इतने सालों के बवन्डर के सामने ये छोटा सा अंधड़ अपने पैर गाड़ कर खड़ा रह पाता ! वो कहते है कि…..

“बनाने चले थे रेत पर हम घरौंदा , निशां भी ना बाकी रहे उसके पाँव के !!!

वैसे देखा जाए तो मिस्टर दिल्ली सियासत की चालों से अनजान थे और इस्तीफे से पहले वह अपने भावी वोटर बैंक के जज्बात में आग लगा चुके थे जिससे ये साबित हो चुका है कि इस नौसिखिये खिलाड़ी को प्रशासन का कतई अनुभव नहीं है ये प्रशासक कम आंदोलनकारी ज्यादा हैं, और इनमें आर्थिक नीतियों की समझ न के बराबर है महत्वाकांक्षी होने के कारण उनकी नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर ज्यादा अवाम की सुनवाई पर कम है सबसे बड़ी बात तो ये है कि आवाम की नजरों में बरकरार रहने के लिए ये जानबूझ कर विवाद खड़ा करते हैं और मीडिया के कैमरों की चमक में अपने वजूद को तलाशने की फिराक ही ने इनको कहीं का ना छोड़ा!
वैसे आपको एक बात बता दूँ कि तरह-तरह के लोग होते हैं और उनके तरह-तरह के नशे होते हैं जैसे किसी को सियासत का नशा, किसी को नेतागीरी का नशा, किसी को ऊँचे उठने का नशा आदि लेकिन हमारे मिस्टर दिल्ली को चर्चा में बने रहने का नशा है अब नशा जो ठहरा !
आप की राजनीति विचारधारा की राजनीति नहीं है आप सबको एक जैसा समझते हैं और हर एक को एक ही झाड़ू से बुहार देने की बात करते हैं ! खैर जो भी हो आप ने बड़ी सूझ-बूझ से काम लिया और मौके की नजाकत को भांपते हुए 2014 की दीवानगी में दिल्ली की बलि चढ़ा दी ! लेकिन ये सब देखते हुए तो यही कहावत सिद्द हो गयी कि….

“दूल्हा रोज घोड़ी नहीं चढ़ता और बराती रोज साथ नहीं होते !

कभी कभी तो मैं ये सोचकर सिहर सी जाती हूँ कि यदि जनलोकपाल बिल पास हो जाता तो क्या होता? सबसे शर्मनाक बात तो यह होती कि अगला विधानसभा सत्र किसी स्टेडियम में या रामलीला मैदान में न होकर तिहाड़ जेल में होता फिर क्या था कुछ समय पश्चात दिल्ली के इतिहास की किताब में एक प्रश्न और जुड़ जाता कि कोई तो बताओ ये भाजपा और कांग्रेस क्या हैं? कुछ तो यूँ भी कहते हैं कि जिस दिन मिस्टर दिल्ली ने सरकार बनाई थी, उसी दिन से उनकी सरकार गिराने की कोशिशें भी शुरू कर दी गई थीं । वरना किसी की मजाल नहीं थी कि 10 दिन के धरने को 2 दिन में समेटकर उसे अपनी जीत बताने वाले मिस्टर दिल्ली को जनलोकपाल के मुद्दे पर हारा हुआ महसूस कराते हुए इस्तीफा देने पर मजबूर कर दे ! खैर छोडो अब इस्तीफा तो दे ही दिया हुजूर ने और कर ली अपने मन की, लेकिन हमारा क्या है हम भी हुजूर यानि कि मिस्टर दिल्ली के सम्मान में दो चार कसीदे गढ़ ही देते है तो हाजिर हैं कि …..

“एक शमां रोशन की थी, आप ने उजाले के लिए, क्या हुआ जो, हर शख्स के हिस्से में अँधेरा आया !

अब तो मेरे हिसाब से मिस्टर दिल्ली को आराम फरमाने के लिए राजनीति से विदा लेकर हर रोज सुबह शाम बस इन चंद लाइनों का जाप करना चाहिए कि ….

“सूकूं मिलता है मुझे, उस परम शक्ति के बीच ! हाँथ पसारे सब खड़े, जहां मिले शांति की भीख !!

क्योंकि मिस्टर दिल्ली आज के युग में भ्रष्टाचार से मुक्त भारत की कल्पना करना ठीक वैसा है जैसे बिना तेल के चिराग को प्रज्वलित करना ! लेकिन क्या कोई भी राजनीतिक पार्टी लोकपाल जैसी किसी संस्था को इतना ताकतवर बनाने की हिम्मत कर सकती है कि वो सत्ता में रहने पर उनके भ्रष्टाचार पर भी नकेल कस सके ! लेकिन एक बात तो कहना चाहूॅंगी कि पहला जी हाँ देश का पहला “लोकपाल” इस शब्द में बहुत बड़ा चार्म है, जिससे बच पाना भी मुश्किल है !
जाहिर है ऐसा होना नामुमकिन ही नहीं मुश्किल भी है क्योंकि देश के नेता अपना कर्तव्य भूल चुके हैं और दौलत, शानोशौकत, दबंगई एवं कुर्सी का स्वाद चखकर मगरूर हो चुके हैं जो भी नया-नया आता है वो भी इसकी चपेट में आकर मदमस्त हो जाता है !
वैसे एक बात तो माननी पड़ेगी आप लोगों को कि मिस्टर दिल्ली “आप-आपश” करके सरेआम शीलाजी और सोनियाजी के क्षेत्र में कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए बिजली के खंभे पर चढ़ जाते है और जबरन बिजली विभाग द्वारा किसी की काटी गई बिजली जोड़ने के बाद वहाँ खड़े होकर मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाते हैं फिर पत्रकारों को इंटरव्यू देकर बड़े ही इत्मीनान से निकल जाते हैं क्या किसी ने ऐसा कारनामा देखा है ? और तो और इतना सब होने पर भी उस व्यक्ति के खिलाफ एक भी “एफआईआरश” तक दर्ज नहीं होती है क्यों ? आम परिस्थितियों में कोई भी आम आदमी ऐसा नहीं नही सकता, लेकिन यदि उस आम आदमी को खास आदमी बनाकर परदे के पीछे से किसी बजनदार कुनबे का पूरा समर्थन हासिल हो तब तो अवश्य हो सकता है !!!!
महत्वपूर्ण ये नहीं है कि कालिदास-विद्योतमा शास्तार्थ मे मौन कालिदास के समर्थक (जैसे केजरीवाल जी केे समर्थक ) क्या साबित कर रहे थे मगर ये महत्वपूर्ण है कि आखिर एक राज्य का मुख्यमंत्री अपने ही राज्य में धरने पर जिन मुद्दो को लेकर बैठा क्या उनमें गंभीरता थी ?
और सबसे अहम बात कि मुख्यमंत्री के पास हस्ताक्षर के लिये गोपनीय फाइलें भी आती है और पद और गोपनीयता की शपथ खाने के बाद क्या सड़क पर उन फाइलों के आने से उस शपथ पर सवाल नही उठता ?
गौरतलब हो कि दिल्ली पुलिस अगर राज्य के कानून मंत्री के आधीन नही आती तो इस बारे मे केंद्र सरकार से कभी कोई स्पष्टीकरण का जिक्र हुआ था कि बिना पुलिस के राज्य का कानून मंत्री कैसे व्यवस्था दुरुस्त कर पायेगा ? अगर नही में जवाब है तो दूसरे को जवाबदेह किसी भी पुलिसवाले पर रौब झाडना 100 प्रतिशत गलत है चाहे वे भारती जी हो या कोई और ………
वैसे केन्द्र शासित राज्यों मे कानून मंत्री की आवश्यकता ही क्या है जब उसके पास अधिकार ही नही है “धरना” इस मुद्दे पर होता तो लगता कि कुछ दम है !!!!!!!
देखा जाए तो इन धरनों के द्वारा मिस्टर दिल्ली ने कई तीर मारे है और इन तीरों से विपक्षी पार्टियाँ बुरी तरह से घायल हुई है
अंत में चंद लाइनों को नजर करते हुए आपसे विदा लेना चाहूंगी कि ……

हो रहा नैतिक पतन, घोटालों के बीच !
बैठे हैं शातिर यहाँ, दोनों आँखें भींच !!
देख हकीकत देश की, सोचूं बारम्बार !
मन के मैले हो गए, बड़े-बड़े किरदार !!
अंधे बैठे छाप रहे, बहरों की तकदीर !
ढोल के अन्दर पोल है, जाने सभी फकीर !!
ढुलक गई सरकार है, बिन पैंदी की तकदीर !
बड़ो-बड़ों का बिक गया, बीच बजार जमींर !!

सुनीता दोहरे…..

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