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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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(दूसरी किश्त) तेरे वादे पे करके भरोसा CONTEST…

Posted On: 7 Feb, 2014 Others में

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(दूसरी किश्त) तेरे वादे पे करके भरोसा CONTEST…

गतांक से आगे……

मुझे याद है वो दिन जब कालेज के पहले दिन सब एकदूसरे का इंट्रो ले रहे थे ग्राउंड में करीब २५ से ३० लड़के लड़कियों का ग्रुप खड़ा था और उस ग्रुप के लीडर तुम थे इतना तो मैं समझ गयी थी ! तुम्हारे चमचों ने मुझे बुलाकर तुम्हारी ओर इशारा करते हुए कहा कि ये सीनियर हैं हमारे, इन्हें झुककर सलाम करो… मैंने सलाम किया.. तो फिर किसी ने कहा तीन बार करो समझीं… मैंने झुंझलाते हुए कहा एकबार काफी नहीं है क्या ? मेरे जवाब को सुनकर तुम तिलमिला उठे थे और बोले ए लड़की तुम्हारा नाम क्या है होश में बात करो…… मैं भी थकी हुई थी सो जवाब में मैंने बोल दिया “सुनी” नाम है मेरा और इस नाम से मुझे बेइन्तहां नफरत है और कुछ पूछना है कि मैं जाऊं……इतना कहकर मैं क्लासरूम में चली आई थी थोड़ी देर बाद पीछे पीछे तुम्हारी टोली भी सीटों पर आकर बैठ गयी थी ! तुम निगाहों निगाहों में बहुत कुछ कहने की कोशिश कर रहे थे और मुझे तुमसे पता नहीं क्यों चिढ़ सी लगने लगी थी !…….
हम भी लोगों से सुनते थे मोहब्बत के किस्से, लेकिन हमने भी एक ऐसा ही किस्सा तैयार कर लिया ! क्या करते ? अब जानबूझ कर तो किया नहीं, हो गया ! पहली क़िस्त “तेरे वादे पे करके भरोसा” मैं हमने बीते हुए कुछ पलों को दर्शाया है….
मुझे एक वकया और अक्सर याद आ जाता है जब मैं नीले आकाश के नीचे खड़ी होकर ये नही समझ पा रही थी कि मैं यहाँ क्यों खड़ी हूँ हवाएं बारी बारी मेरे आँचल को छूकर वापस चली जाती थीं अचानक एक तेज़ हवा का झोंका बारिश की बूंदों के साथ आया और ढेर सारी बूँदें छिटके हुए पारे की तरह मेरे चेहरे पर फैल गईं। मैंने उन्हें छूने को हाथ बढ़ाया, तभी तुमने मेरा हाथ थाम लिया था मैंने पलटकर देखा तुम ही तो थे एकदम सीधी नजर से मुझे देखते हुए तुम्हारी आँखों में गहरा प्यार था और चेहरे पर उतनी ही गहरी आत्मीयता लिए हुए बोले, न न छुओ नहीं ये चेहरे पर आकर अभी सूखी नहीं हैं बल्कि सात रंगों की आभा लिए झिलमिल कर रही हैं देखो तो जरा तुम्हारे चेहरे का रंग सिंदूरी सा हो गया है उसकी बातों का जादू मुझ पर ऐसे चलता था मानों कोई काला जादू कर देता हो, अपनी सुध बुध खो बैठती थी मैं…….
प्यार, जिसे अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, सिर्फ महसूस किया जा सकता है। क्योंकि मोहब्बत का सुरूर ही कुछ अजब होता है, बिन पिए ही आदमी नशे में चूर होता है……………

दिन को रात कहता है बेदर्द, और घनी रात को उजाला !
कहनी थी जो बात प्रिय उनसे, वो मन ही मन में रम डाला !!
हद तो तब हो गई जब आशिक ने, रवि को चाँद कह डाला !
इक अजनबी से बने ख़ास की चाहत में, वादे पे वादा कर डाला !!

मन जब व्यथित होता है जब उसकी परवाह करने वाला या यूँ कहें कि जिस पर पूरा भरोसा हो कि वो हर दुःख सुख में मेरा साथ निभाएगा जब वो ही बदल जाये तो रोजमर्रा की भागती दौड़ती जिन्दगी में दिन-प्रतिदिन समस्याओं की रफ़्तार और चुभने लगती है मेरे दिमाग में बार बार तुम्हारे साथ गुजारे पल घूम जाते, उनमे से एकपल के लिए ये दृश्य दिमाग से नहीं उतरता है जहाँ से हमारे प्यार की खबर सबको लग गयी थी, जब कालेज की तरफ से हुई पिकनिक के दौरान भ्रमण करते हुए तुम जोर से ये गाना गाने लगे थे…..

“वहमों गुमां से दूर दूर, यकीं की हद के पास पास,
दिल को भरम ये हो गया, उनको हमसे प्यार है”…

“देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए, दूर तक निगाह में हैं गुल खिले हुए”

और पलभर को मुझे कोई नजर नहीं आया सब कुछ भूलकर मैं आगे की लाइने गाने लगी थी……..

“ये गिला है आपकी निगाहों से, फूल भी हों दरमियाँ तो फासले हुए”

मुझे ये भी याद नहीं था कि पूरा क्लास मेरे और तुम्हारे गाने को सुन रहा था और इसी गाने से मेरे और तुम्हारे रिश्ते की महक सबको लग चुकी थी हर शख्स की जुबां पर तेरे मेरे प्यार किस्से थे… कुछ तेरे मेरे इश्क को समझते थे, कुछ सहानुभूति रखते थे, कुछ मजे लेते और कुछ हिम्मत बंधाते थे और उनमे से ही कुछ लोग ऐसे भी थे जो मेरे प्यार की कसमें खाते थे….
मेरी सबसे करीबी दोस्त थी भावना जो मेरे साथ ही कालेज में पढ़ती थी उसकी छोटी बहिन को मुझसे कुछ पढाई को लेकर पूछना था तो एक दिन भावना के साथ वो घर आई, थोड़ी देर तो वो चुप बैठी रही वो छूटते ही बोली दीदी ये ‘ये प्रेम क्या होता है..?’ सुरभि के इस प्रश्न से मैं चौंक गई लेकिन जवाब तो देना ही था, मैं मुस्कराते हुए बोली ‘प्रेम…? अभी पांच छह साल रुक जाओ, सब पता चल जाएगा, वैसे अभी मुझे भी पता नहीं है कि ये क्या बला है……………इतना कहकर मैं चुप हो गई लेकिन मेरा मन अब किसी से बात करने को नही हो रहा था क्योंकि मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी थी तुम्हारी बेसिर पैर की कोई बात याद आ जाती तो मैं अपने आप में ही मुस्कराने लगती……
मेरे चेहरे को सुरभि बहुत ध्यान से देख रही थी, मेरी इस तरह की बातें सुनकर सुरभि इतनी जोर से हँसी और बोली तुम्हे कैसे नहीं पता ? तुम्हारे तो चेहरे पर ही पूरा प्रेमशास्त्र लिखा है…
मुझे याद है उसने कहा था कि “प्रेम एक ऐसी खुश्बू है जो महकती जरुर है”…. दीदी जिस तरह हवा को बाँध नहीं सकते उसी तरह प्रेम भी बाँधा नहीं जा सकता थोड़ी होशियार रहना…..मैंने उसकी बातों को कोई तवज्जो नहीं दी क्योंकि मुझे तुम पर अपने से ज्यादा विस्वाश था !!
प्रेम तो अपने आप में वो पवित्र अग्नि है जिसमे मिल कर सब कुछ पवित्र हो जाता है ! पर तुम क्यों न समझ सके कि मेरी तुम्हारे बारे में चिंता करना एक निस्वार्थ भावना थी, तुम कभी न समझ सके कि ये दर्द क्यों है ? और अगर है तो आज भी क्यों है ?????

हाँ मैं जानती हूँ कि हर व्यक्ति का अपना एक दायरा होता है, जिसमें वह किसी को आने नहीं देना चाहता लेकिन जब आप किसी की चाहत में डूबे हों तो इस तरह के दायरे अपने आप सिमटने लगते हैं। दिल चाहता है वो इस दायरे को तोड़कर उसके करीब, बिलकुल करीब आ जाएँ ! तुम्हें याद होगा कि उन दिनों तुम्हारा एक ही सवाल रोज रोज पूछना मुझे कितना व्यथित करता था और तुम थे कि रोज ही ये सवाल करके एक बम फोड़ देते थे और मैं नाराज होकर पूरे दिन के लिए तुमसे जुदा हो जाती थी मुझे ये लगता था कि तुम ये जानबूझकर पूछते हो ताकि मैं गुस्सा हो जाऊं ! वो दिन तो तुम्हे जरुर याद होगा तुमने खुद मुझसे दूर जाते समय ये फिर दुबारा सवाल किया था कि क्या तुम्हें मुझसे प्यार है ? मुझे तो लगता है तुम मुझे चाहती ही नहीं हो ? सिर्फ दिखावा है तुम्हारी चाहत…………..ये सिरफिरा सवाल और आरोप सुनकर तिलमिला उठी थी मैं, मैंने बिना सोचे समझे तपाक से बोला था कि ये क्या बेहूदगी है क्या बेवकूफ हो तुम ? तुम और तुम्हारे फ़ालतू के सवाल मुझसे झेले नहीं जाते ! तुम फिर शांत हो गये चुपचाप एकटक मुझे निहारते रहे मेरी ये समझ न आया कि तुम इस तरह के बेहुदे सवाल क्यों करते रहते हो मुझे क्या पता था कि तुम्हारी इन बातों में भी कई राज छुपे हुए हैं !
तुमने फिर गुस्से से कहा “सुनी” मेरी बात को ध्यान से सुनो और समझो ताकि सही से सोच समझकर जवाब दे सको “क्या तुम्हें मुझसे प्यार है ? मुझसे शादी करोगी ? अगर नहीं करना चाहती हो तो साफ़ मना कर दो ताकि मैं निश्चिन्त होकर कुछ और सोचूं” एक सांस मैं तुम इतना सब कह गये थे……. ठीक ही सोचा मेरे दिल ने उस पल कि …..

नज़र आता है तेरी आँखों में ये सारा जहां मुझे
मगर अफ़सोस है कि तेरी इन आँखों में हम नहीं
सज जाते कभी मेरे भी वास्ते तेरे ये घर आँगन
मगर कहें क्या तेरी आँखों में पल भर को भी हम नहीं….

सारा माजरा समझते मुझे देर न लगी सब कुछ आईने की तरह साफ़ हो चुका था फिर भी मेरे परेशान दिल ने यकीं नही किया अब बोलने की मेरी बारी थी मैंने जो कहा उसकी तुमने कल्पना भी नहीं की होगी…. शादी और तुमसे, तुमसे शादी करने का अर्थ है अपनी पूरी जिन्दगी को नरक में डाल देना मैं कोई तुमसे प्यार व्यार नहीं करती ! मैं गुस्से में अंधी हो चुकी थी गुस्सा तो मुझे पहले की बातों पर भी था और सबसे अहम् बात ये कि तुम्हे पुलिस में उच्चाधिकारी की पोस्ट मिली थी और मुझे तुमने एक बार भी अपने मुंह से नहीं बताया था तुम ये समझते थे कि मुझे पता नहीं है और ऊपर से तुम्हारा तुर्रा ये कि “तुम अगर मुझसे शादी नहीं करना चाहती हो तो साफ़ मना कर दो ताकि मैं निश्चिन्त होकर कुछ और सोचूं” !!!!!!!!!
मेरे साथ एक पल में इतनी बड़ी घटना, कैसे क्या करूँ ? कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था दोस्ती थी प्यार था और दोस्ती, प्यार सब एक दायरे तक सीमित था शादी के बारे में कभी सोचा ही नही था और ये सब तुम्हारे मुंह से सुनकर डर के मारे बुरा हाल था शादी के पवित्र फेरे माँ बाप के पवित्र रिश्तों की दहलीज पर सिमट कर बैठे थे ! मैं अपने दिल का हाल किससे बयाँ करती ? कौन था मेरा ? एक तुम ही तो थे और वो भी तुम सवाल बनकर मेरे सामने खड़े थे !
मैं यही सोच कर तसल्ली कर रही थी कि मेरे जैसे लाखों होंगे जो इसी उधेड़बुन में अपने रिश्तों की बलि चढ़ाकर अन्दर ही अन्दर उधड़ रहे होंगे……..

दर्द सबके सीने में तड़पता है, पर बयां कोई नहीं करता !
अपने महबूब के दीदार की हसरत तुझे भी है मुझे भी है !!
कहना मुश्किल सा होता है दिखाकर आँहें कोई नहीं भरता !!!

जैसे एक मजबूत मकान बनाने के लिए मजबूत नींव का होना बहुत जरूरी होता है ठीक वैसे ही प्यार का महल खड़ा करने के लिए सत्य और विश्वास की नींव का होना बहुत जरूरी है। अगर आपके प्यार रूपी महल की नींव कमजोर होगी तो प्यार के इस महल को गिरने में कुछ पल ही लगेंगे।

मुश्किल बहुत था इश्क़ की बाजी का जीतना,
हम जीतने के शौक में हरदम हारा ही किये………
क्रमशः …

सुनीता दोहरे ……

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

atifkhan के द्वारा
February 14, 2014

सुनीता जी तेरे वादे पे करके भरोसा कि तीसरी किश्त का इंतज़ार है.

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    February 14, 2014

    atifkhan जी , जरुर जरुर ….. जल्दी ही आपके सामने होगी ……..

atifkhan के द्वारा
February 12, 2014

सुनीता जी आज इत्तेफ़ाक़ से पहली बार जागरण ब्लॉग खोला पढ़ कर बहुत अच्छा लगा . कमाल का लेखन है आप का. वैसे तो मैं कनाडा मैं रहता हूँ लेकिंन जब भी हिंदी पढ़ने का मन करता है तौ समाचार पत्र खोल लेता हूँ . आज ब्लॉग खोल कर मज़ा आ गया क्योंकि बहुत दिन से कोई कविता नहीं पढ़ी थी. अगर आप का कोई प्रकाशित संकलन है तो कृपया मुझे उस की डिटेल भेज दीजिये. मेरे एक दोस्त दिल्ली से अगले महीने आ रहे हैं मैं उनको लाने के लिए बोल दूंगा. आप मुझे मेल से डिटेल भेज सकती हैं . मेरा मेल है atif underscore khan at hot mail dot ca

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    February 13, 2014

    atifkhan जी , आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन ,…..

sadguruji के द्वारा
February 12, 2014

बहुत रोचक और काव्यमय संस्मरण.इस मंच पर कविता,लेख,गीत और ग़ज़ल शुद्ध साहित्यिक हिंदी में सबसे बेहतर आप लिखतीं हैं.कांटेस्ट में भी आप की रचनाएं शामिल होती हैं.मुझे आश्चर्य होता है कि चयन मण्डली आपकी इतनी उत्कृष्ट रचनाओं पर विचार क्यों नहीं करती है.विजेता सूची में आपका नाम न देखकर मुझे बहुत दुःख और आश्चर्य होता है.इतना अच्छा लिखने के लिए आपको बधाई.

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    February 12, 2014

    sadguruji , सर , सबसे पहले तो आपको बहुत -बहुत धन्यवाद क्योंकि आपने मेरी रचनाओं को पढ़ा और सराहा ….. सद्गुरु जी , मुझे चयन मंडली से कोई शिकायत इसलिए नहीं है कि मैं ये सोचकर कभी नहीं लिखती हूँ कि मैं चयनित की जाऊं …. यहाँ पर एक से एक लेखक है जो मुझसे ज्यादा कहीं माहिर हैं और उनसे मुझे जो सीख मिल रही है वो मेरे लिए बहुत बड़ा गिफ्ट है ….. और मेरे लिए सबसे बड़ी बात ये भी है कि “जागरण जंक्शन ब्लॉग” पर मैं खुल कर लिख सकती हूँ …….. ऐसा भी नही कि मैं कभी चुनी नहीं गयी …. कई बार बेस्ट ब्लॉगर भी बन चुकी हूँ ….. मेरी पोस्ट टॉप पर कई बार रही है …… मुझे ख़ुशी है कि इस मंच के जरिये मैं अपने विचारों से सभी को अवगत करा पा रही हूँ और साथ ही साथ समाज को कुछ दे प् रही हूँ ……… सादर नमन ….


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