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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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तेरे वादे पे करके भरोसा {पहली किश्त} (contest)

Posted On: 30 Jan, 2014 Others में

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तेरे वादे पे करके भरोसा {पहली किश्त} (contest)

अपनी लेखनी से पाठक को मंत्रमुग्ध करने की ताकत लेखक को बखूबी आनी चाहिए ! दिल के हर जज़्बात को शब्दों में ढालकर बयान करना इतना आसान नही होता फिर भी लेखक हर पंक्ति को खुद जीता है और हर अहसास को शब्द देने की भरपूर कोशिश करता है तो मैंने भी कोशिश की है ! मेरी रचनाएं व्यंग्य का सहारा लेकर किसी भी चरित्र को उधेड़ती नहीं है बहुत सारी आशाओं, सपनो और कसमों से जरा अलग हटकर सांस लेना चाहती है !  मेरी रचनाएं संबंधों को अनेक स्तरों तक ले जाने के लिए बहुरंगी और मानवीय चरित्र में अपने आपको कितना विचित्र बना डालने के लिए आतुर हैं मेरी हर रचना एक दर्द समेटे हुए होती है बहुत लोगों ने मुझसे कहा है कि आपकी रचनाये इतनी दर्द भरी क्यों होती हैं इसकी हकीकत मैं आपको तीन किश्तों में बयाँ करुँगी ! मैं जानती हूँ एक लेखक के लिए सच्चाई लिख पाना कितना कठिन होता है वो भी जब, जब वो इस दौर से गुजरा हो !

पहली किश्त…..

अपने मम्मी पापा की लाडली सुनी यानि कि मैं घर की जिम्मेदारियों से बेखबर, अपनी माँ के आंचल की छाया में सारे दुखों का अंत कर देती थी छोटी छोटी फालतू की बातें मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती थी मोम और डैड की छाया ऐसे लगती थी जैसे एक विशाल वृक्ष की टहनियां मुझे अपने में समेटे हुए है इसलिए दुनियां की कोई ताकत मुझे कष्ट नहीं दे सकती ! समय व्यतीत हो रहा था मैं जैसे जैसे बड़ी होती गयी इस संसार की हकीकत से रूबरू होते हुए स्कूल से कालेज मैं पहुँच गयी….. इन्ही दिनों मुझे तुम मिले, कालेज में टॉप आने वाले तुम अपने दोस्तों के साथ हँसी-मजाक, मौज मस्ती करने में मशगूल रहते और कालेज टॉप भी करते ! मेरी ये समझ नहीं आता कि आखिर कैसे ? मैं भी हाई स्कूल और इन्टर टॉपर थी पर मैं तो दिन भर किताबों में ही घुसी रहती थी इसलिए मुझे लोग किताबी कीड़ा भी कहते थे ! मेरे मन में ये सवाल उठता कि इसकी क़ाबलियत के आगे मैं इस साल टॉप नहीं कर पाऊँगी ! लेक्चर सुनते समय वो मुझे अजीब सी निगाहों से घूरता रहता, ये देखकर मुझे उससे और चिढ हो गयी इसी चिढवश जब भी वो मुझे सामने नजर आता मैं उसे देखकर नजरें फेर लेती ! दिन यूँ ही बीतते रहे उसने फिर टॉप किया और मैं दूसरे नम्बर पर !
साल के अंत में कालेज फंक्सन था मुझे भी मौका मिला एक रोल करने का नाटक का नाम था “आज के युग में नारी कितनी स्वछंद है“ जिसमें मुझे एक शादीशुदा महिला होने के साथ साथ नौकरी करने वाली महिला बनना था घर और ऑफिस में समय को कैसे एडजस्ट करना है इसी पर जोर देते हुए पूरी स्टोरी थी ! कालेज में वो भी सज संवर कर अपने दोस्तों के सामने आना मारे डर के बुरा हाल था लेकिन एक ख़ुशी ये भी थी कि मुझे चूड़ियाँ पहनने को मिल रही थी क्योंकि मुझे चूड़ियाँ पहनने का बहुत शौक था !
उस दिन अचानक ऐसा न जाने क्या हुआ कि तुम्हे अपने सामने देखकर मैं सहम गयी थी जब तुमने कहा था “सुनी” हाँ इसी नाम से पुकारा था तुमने मुझे और कहा कि सुनी तुम मुझसे नजरें क्यों चुराती हो क्या मैं इतना बुरा हूँ मेरी सुबह तुमसे होती है शाम तुमसे होती है तुम्हे देखे बिना अब मैं कैसे जी पाउँगा ! तुमने प्यार, इश्क, मोहब्बत का नाम तो सुना होगा मुझे वही हो गया है और वो भी तुमसे ! सुनी मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ तुम्हे प्यार करता हूँ ! एक थप्पड़ रसीद कर दिया था मैंने तुम्हे और मैं रिहर्सल करने चली गयी थी ! मेरा एक सपना था कि तुमसे बदला लूँ कि तुम्हारी बजह से मैं कालेज टॉप करने से रह गई थी और वो बदला आज थप्पड़ मार कर पूरा कर लिया था मैंने …. मानों जैसे इसी का इन्तजार था मुझे ! सच कहूँ तो उस समय तो बहुत सुकून मिला था मुझे ! लेकिन वो अवाक सा खड़ा रह गया पलट कर कुछ न बोला उस दिन से वो उदास सा रहने लगा ! उसकी उदासी देखकर ना जाने क्यों मुझे उस पर तरस आने लगा मैं समझ नहीं पा रही थी कि ये अचानक मुझे क्या हो गया है उसकी भोली सूरत मेरी आँखों के सामने हर पल तैरती रहती ! मैं उससे बात करने की बहुत कोशिश करती लेकिन वो मुझे अनदेखा कर देता ! दिन रात मैं ग्लानि में डूबी रहती ! मेरी रातों की नींद और दिन का चैन न जाने कहाँ खो गया था ! सिर्फ एक ही सपना कि मुझे वो मुकाम हासिल करना है जो मुझे तुम तक पहुंचा सके !
सुना है अजीब शै है ये मोहब्बत भी,  जिसकी इबादत करे आशिक, वो नहीं मिलता है तसव्वुर मैं नज़र भी वही आता है जो मुकम्मल नहीं होता !
तरह तरह से मन को समझाने में लगी रहती कि छोडो जाने दो लेकिन उसे भूल ही नहीं पा रही थी एक दिन कालेज के लॉन में वो मेरे सामने से गुजरा मेरी कुछ ना समझ आया बस मैं उसके पैरों से गिर पड़ी और मांफी मांगते हुए जोरो से रो पड़ी, मुझे रोते देख उसके साथी हैरान और वो परेशान क्योंकि उसने सोचा भी नहीं था कि मैं ऐसा कर सकती हूँ ! मेरा प्यार परवान चढ़ने लगा ! दोनों साथ साथ कालेज जाते ! कालेज के हर लड़के लड़की की जुबान पर मेरे इश्क के चर्चे होने लगे !
मुझे याद है तुम्हारी जिद पर मैंने बिना शादी के तुम्हारे नाम का करवाचौथ का व्रत रखा था सुबह की पहली किरण देखने से पहले मैं  तुम्हें देखना चाहती थी कि अचानक सुशीला का फोन आया सबसे पहला सवाल उसका था कि तुमने टॉपर के लिए वृत नहीं रखा क्या ? मेरे मन के तार झनझना उठे ! वो कहते है कि…….

“जो जिक्र घडी भर तेरा कोई कर ले
फिर कहां जज्बातों का दौर ठहरता
जलजला आता है समुन्दर की पनाहों में
जब कभी तूफानों का दौर चलता है”

उस दिन मैंने भर भर हाँथ चूड़ियाँ पहनीं थी मुझे याद है वो शाम जब चौखट पर मेरा हाँथ था, लाल और हरी चूड़ियों को देखकर बरबस तुम्हारा हाँथ मेरी उन चूड़ियों पर चला गया जो तुम्हारी आदत में शुमार था तुम मेरी उन चार चूड़ियों को हर रोज खनकाया करते थे और उस रोज भी तुमने वही किया जब मैंने भर भर हाँथ चूड़ियाँ पहनीं थीं मैं झुन्झला उठी थी ! शायद तुम कुछ कहना चाहते थे लेकिन मेरा झुंझलाना देखकर तुम चुप हो गये थे उस समय तो मेरे कुछ समझ नहीं आया और मैं तुम पर झुंझलाती हुई वापस लौट गई लेकिन तुम कितने शांत हो गये थे और तुम्हारा यही शांत स्वभाव मुझे बेहद रास आता था तुम्हारा घर, परिवार, यार, दोस्त सभी से नाप तौल कर बात करना, दूसरों को अपनी बात कहने का मौका देना ये सब तुम्हारे व्यक्तित्व में चार चाँद लगा देता था ! तुम्हारी इन्ही अदाओं पर तो मरती थी मैं…
कई बार ऐसा होता है कि आदमी कुछ कह नही पाता है बस महसूस करता जाता है ! मुझे क्या पता था कि तुम्हारे अन्दर इतनी उथल पुथल चल रही है…. लेकिन थोड़ी देर बाद जब मेरा गुस्सा शांत हुआ तो तुम फिर मेरे सामने खड़े होकर अपने मासूमियत भरे चेहरे से कुछ कहना चाहते थे तुम अनायास ही बोले सुनी sssss  एक हंसी ख्वाब मैंने अभी अभी देखा है सुनोगी ????????????????????????
एक हल्की सी मुस्कराहट उभर आई थी मेरे चेहरे पर मैंने हाँ में सर हिला दिया ! और तुम अहिस्ता से अपने कान पकड कर बोले “गुस्ताखी मांफ हो हुजुर” कहकर मेरे द्वारा लिखी हुई रचना मुझे ही सुनाने से पहले बोले तो अर्ज किया है कि…….

ख्वाहिश है दिल की
कि चूम लूँ उन अधरों को
मगर ये चाह सिमट के रह जाती है
जब उनकी सुर्ख लाली का सवाल आता है …..

इल्तजा है मेरी उनसे
कि उनकी जुल्फों से मैं खेलूं
मगर बड़ी गुस्ताख हैं जुल्फें
मेरे शाने पे बिखर जाती हैं ……

तमन्ना है दिल की
कि थाम लूँ में हाँथ उनका जोर से
मगर ये हसरत अधूरी रह जाती है
जब उनकी चूड़ियों का ख्याल आता है…..

एक हसीं ख्वाब है मेरा
कि मेरे आँगन में रुनझुन हो
हंसी हैं पाँव जानम के
कयामत रोज ढाते हैं ……

बेताबी है मेरे दिल की
तेरे घूँघट को खोलूं मैं
मगर हाय वो शर्मों हया का बादल
जो दिल में आग लगाता है……..

दीवानगी है मेरे दिल की
चली हैं नजरों का सितम सहने
बड़ी गुलफाम हैं तेरी नजरें
दिल में एक आह सी जगाती है ……

और जानती हो सुनी क्या क्या सितम न हुआ मेरे साथ ? अब देखो न तुम्हारी इन लाल चूड़ियों ने मुझे बहुत सताया है पता है तुम्हारी इन सुर्ख लाल चूड़ियों ने मुझे प्रेम का ग्रन्थ पढाया है जब ये चूड़ियाँ खनक खनक कर ये कहतीं है कि सुनी एक निश्छल ह्रदय की मलिका है वो तुम्हे प्रेम करती है और वो भी निश्चल प्रेम ….मैंने हर पल इन चूड़ियों की खनक में पाया है ये सच्‍चाई का मंत्र, जिसमें नहीं है कोई तंत्र !  और एक बार फिर तुमने चुने हुए सशक्त और सुंदर शब्दों में गुँथे हुए भाव से अपने दिल की अभिव्यक्ति बयाँ कर दी थी. मैं हैरान हो जाती कि तुमको गुस्सा क्यों नहीं आता मेरे झुंझलाने पर ? मैं ये भी जानती थी कि तुम अपने दिल की बात किसी से नही कहते थे मेरे सिवा ! जब तक में नही आ जाती तब तक तुम घर में शांत शांत बने रहते ! मेरे आते ही तुम्हे जैसे पंख लग जाते ! बस यही बात
आज भी याद आती है ! तुम्हे तेज़ कार चलाना बहुत पसंद था जब भी मैं तुम्हारे साथ होती तो तुम हवा से बाते करते .. मैं रोकती इतनी तेज़ गाडी नही चलाओ, मुझे डर लग रहा है तुम बहुत जोर से हसते हुए कहते पगली कहीं की …….
तुम्हे कोहरे में लॉन्ग ड्राइव करके जाना अच्छा लगता था हम दोनों अक्सर लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाते घंटों बातें करते…….
छोटी छोटी बातों को लेकर तकरार होती रही जिन्दगी अनवरत यूँ ही चल रही थी कि तुम मुझसे खिंचे खिंचे रहने लगे !
मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि कैसे इतने पवित्र रिश्ते की नींव हिल गई ????????????
सम्बन्ध जब बोझ बन जाते हैं  तो नैतिकता घुलने लगती है और दर्द असहनीय हो जाता है ! रिश्तों की मार्मिकता फिर नजर नहीं आती ! मैं यही समझती रही कि तुम मुझसे दूर होकर खुश हो तो मैं क्यों रोऊ तुम्हारे लिए ?????
और ये भी सत्य है कि अंत तो निहित है अग्नि में फिर चाहे विरह की अग्नि हो या प्रेम हवन हो ! प्रेम तो अपने आप में वो पवित्र अग्नि है जिसमे मिल कर सब कुछ पवित्र हो जाता है ! मेरी रचनाएं इन्हीं अभिव्यक्तियों से ओत-प्रोत होकर मन के उदगारों को प्रकट करती हैं ! ……..

१ एक वो भी दौर था……

एक वक़्त था जब
महफ़िल-ए-गुल हुआ करते थे हम
हर परिंदे की जुबां में
चर्चा-ए-ख़ास हुआ करते थे हम……

कुछ चन्द हस्तियों की निगाहों पे
सवाल हुआ करते थे हम
बस एक तुझको छोड़कर सबकी
नजरों का नूर हुआ करते थे हम…..

अचानक ऐसा क्या हुआ है आपकों
बिन बात पलकों की छाँव दे रहे
एक दौर था उस दौर में
कोसने का जरिया हुआ करते थे हम …….

दिल को आज एक सुकून है
कि तू सच्चे इश्क को मोहताज है
तू भी तरसे उम्र भर
ये दुआ हर बार किया करते थे हम………

———————————————–
२ तेरे घर की रौशनी

सोचती हूँ हाँथ में
टुकड़ा उठाऊं पत्थर का
जोर से फैंकूं कि कर दे
सुराख सूरज में
कतरा-कतरा रौशनी भर दूँ
तेरी उदास दुनियां में
जब कायनात अँधेरी हो जाये तो
मैं सांसों को समेटने की खातिर
दूर से निहारूं तेरे घर की रौशनी….

____________________________

नसीब था अपना-अपना….

दर्द भरे मंजर में
खुद को समेट कर
इश्क की गली को
फतेह करने के वास्ते
जुनूं था अपना-अपना
किसी ने इश्क किया.
किसी ने इबादत, किसी ने चाहत
कोई नाकाम हुआ
कोई हुआ आबाद
नसीब था अपना-अपना……..

फर्ज है अपना-अपना
किसी ने संवारा
बुढ़ापा माँ बाप का
किसी ने पूजा
ईश्वर की तरह
किसी को माँ का आँचल मिला
किसी को खुला आसमां
कोई दुआओं से लबालब हुआ
कोई बागवान के अश्कों से गरीब
बस कर्म था अपना-अपना……..
————————————————–क्रमशः >>>>>>
सुनीता दोहरे …..

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