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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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मुझे इश्क है तुम्हीं से (contest)

Posted On: 26 Jan, 2014 Others में

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kk

मुझे इश्क है तुम्हीं से (contest)

ये मोहब्बत जिसको हो जाए उसे अपनी जिन्दगी बहुत सुखद लगती है! कारण ये मोहब्बत कुदरत की दी हुई एक नायाब अनमोल दौलत है ! जो हर एक शख्स को कुदरत ने तोहफे में दी है ! जब तक इश्क सर चढ़कर बोलता रहता है तब तक आशिक कुछ इस तरह के ख्वाब देखते हैं. चन्द चार लाइनों में पेश करुँगी कि ……..
“इश्क है मुझे तुझसे,
तेरे हर रिश्ते से मेरा नाता है
कर दी है जिन्दगी तेरे नाम हमने
मेरी आँखों में तू ही तू नजर आता है”……….

लेकिन ये इश्क का जादू जल्द ही सर से उतर भी जाता है पर अपने पीछे एक तबाही छोड़ जाता है कारण जिसने इसकी कद्र की इसने उसी के दिल पे राज किया है जिसने नहीं की उसे जिन्दगी भर का ऐसा जख्म दिया जो नासूर बनके कसकता रहा है……..इस दर्द को भी महज चंद लाइनों में पेश करना चाहूंगी कि ……
“क्यों बिक गये शजर कौड़ियों के दाम
अब न जाने किस शजर की तलाश है
ये मेरा भ्रम है या किसी नगमें की गूँज
प्रेम की बाजी में ये कैसी शह और मात है”

१ एक बार बता दीजिये हमें…

मुमकिन हो आपसे, तो भुला दीजिये हमैं !
पत्थर पे तराशीं हू, मिटा दीजिये हमैं !!
हर एक बात पे मुझसे शिकायत है आपको !
मैं क्या हूँ सिर्फ एक बार, बता दीजिय़े हमें !!
मेरे सिवा भी कोई और है,  मौजौ-ए-गुफ्तगू !
अपना भी नूरे-जिगर, दिखा दीजिये हमैं !!
मैं कौन हूँ,किस जगह हूँ, मुझे कुछ खबर नहीं !
हैं आप कितने दूर, य़े एहसास दिला दीजिये हमें !!
हाँ—–मैनैं अपने जख्मों को नासूर किया है !
अब मैं मानती हूँ , जुर्म सजा दीजिये हमें !!………

ये सब देखते हुए जहाँ तक मैंने यही जाना है कि “प्यार, चाहत, मोहब्बत, इबादत जज्ज्बातों से भरी एक अस्पष्ट सी अधूरी कहानी है जिसने भी खाई मोहब्बत की कसमें उसकी जिन्दगी में क्रमशः ही आया है. जब-जब मोहब्बत बेबफा हुई तो जख्मी आशिक के दिल से यही बात निकलती रही कि …..
“तलाश कर मेरी कमी को अपने दिल में
अगर दर्द मिले तो समझ लेना
तेरे दिल में मेरे लिए मोहब्बत अब भी बाकी है
और तू तो दगा दे गया मुझे
अब भी थोडा सा भरम बाक़ी है
ये निगोड़ी निगाहों का क्या करूँ
इनमें तेरी अदाओं का अक्स बाक़ी है
कह चाहें ले दुनिया कुछ भी
कुछ न बिगड़ेगा कहने वालों का
जख्म दे के अश्क ले के
दर्द सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढें जवाब उनके दर्द की इन्तहां का
लोगों का काम है, लोग तो बस सवाल करते हैं
—————————————————-


२ मन सूना-सूना….

सब कुछ है अपना,फिर भी ये मन सूना-सूना लगता है !
सूना सजर्, सूना आँगन, रोज ही ऐसा होता है !!
दिल की तन्हा राहों में, गुलजार गली का रास्ता है !
दूर कहीं से आयेगा कोई,  हर आहट पर लगता है !!
सुबह की धूप, शाम का धुंधलका, आँगन में रोज फैलता है !
वो मौसम और ये मौसम,  कुछ कहता-कहता लगता है !!
सब कुछ किसमत का लेखा है, हर आँसू ये समझता है !
बाजार-ए- इश्क में देखा जाये, तो रोंयां-रोंयां बिकता है !!
कहते हैं सब मेरे लेखन में,  है इतनी तन्हाई क्यों !
बरसों से चुप-चुप थी तुम, अब हर शब्द से दर्द टपकता है !!

और इसी के साथ अपनी एक पुरानी रचना आपके समक्ष दुबारा रखना चाहूंगी. जो मुझे बेहद पसंद है…..

http://sunitadohare.jagranjunction.com/2012/11/11/%E0%A4%AA%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9B%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5/

३ पलकों की छाँव :–

अश्रु प्रवाह में डूबी पलकें , आस भरे निहारें पलकें !
पलकों कि पगडण्डी पर , पलक बिछाए बैठी पलकें !!
बंद पलक हों या खुली हों पलकें , देखन को तरसें है पलकें !
प्रेम दिवाकर उदित करने को , मिलन की मांग पुकारे पलकें !!
त्याग दिया इस यौवन तन को , विरह वेदना देखीं पलकें !
शपथ तोड़कर स्वपन है तोडा ,व्याकुल हो गयी विरहन पलकें !!
प्रेम आस दृढ़ करती पलकें , सांझ ढले जलती हैं पलकें !
नित नए ख्वाब सजातीं पलकें ,नीर मैं गोते खाती पलकें !!
छवि सामने आती जब है , मंद-मंद मुस्काती पलकें !
सोचा छवि को कैद कर लूँ , विछोह की तड़फ दिलातीं पलकें !!
प्रेम राग की आहट छेड़ें , नित नई अलख जगाती पलकें !
तन पर डाले सतरंगी चूनर ,इंद्रधनुष दिखलाती पलकें !!
राह तके दिन रैन ये पलकें , पत्थर सी पथराई पलकें !
कदम चूमने को आतुर हैं , हो गयीं उन्मत्त मन पागल पलकें !!
दबे पाँव लिए प्रेम चिराग , रूह बिछोड़ा सह गयी पलकें !
सांझ ढले मन आतुर होता
, ह्रदय की ताप बढ़ाती पलकें !!
सुनीता दोहरे…….


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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yatindrapandey के द्वारा
January 28, 2014

बेहद सुन्दर सत्य भावनाओ से भरी पड़ी है ये रचनाये

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    January 30, 2014

    yatindrapandey जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..

सौरभ मिश्र के द्वारा
January 28, 2014

बहुत खूबसूरत प्रेम से परिपूर्ण,भावो से भरी कविता

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    January 28, 2014

    सौरभ मिश्र, जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..

sadguruji के द्वारा
January 28, 2014

“क्यों बिक गये शजर कौड़ियों के दाम अब न जाने किस शजर की तलाश है ये मेरा भ्रम है या किसी नगमें की गूँज प्रेम की बाजी में ये कैसी शह और मात है” और छवि सामने आती जब है , मंद-मंद मुस्काती पलकें ! सोचा छवि को कैद कर लूँ , विछोह की तड़फ दिलातीं पलकें !! बहुत बेहतरीन रचनाए.मन को स्पंदित और स्पर्श करती हुई.आपको बहुत बहुत बधाई और कांटेस्ट के लिए मेरी और से हार्दिक शुभकामनायें.

    sunita dohare Management Editor के द्वारा
    January 28, 2014

    sadguruji जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..


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