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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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तेरी याद के वो सुर्ख गुलाब......

Posted On: 30 Nov, 2013 Others में

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sunita 1

तेरी याद के वो सुर्ख गुलाब…...

“हर किसी पे ये दिल हो मेहरबां ये मुनासिब तो नहीं
फिर इस सफ़र में तू आके मिले ये भी मुमकिन तो नहीं”


इस इश्क रूपी प्रेम का डंक जिसे लगा बस वो ही तो असल में जी उठा के भाव को मुखरित करती मेरी ये रचना “तेरी याद के वो सुर्ख गुलाब”  प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती है. जैसे एक रूह के कत्लेआम पर रूह भी कसमसाती है. इश्क के विभिन्न आयामों से गुजरती एक प्रेमिका के समर्पण और प्रेम का आख्यान है. अपनी इबादत में अपने इष्ट देवता से अपने इश्क की दास्ताँ को बयाँ कर अपने महबूब की ख़ुशियों को मांगती है.

“यूँ तो उनकी बेवफाई का अंदाजा न था
दिल में आह जगाई और साथ छोड़ गये”

इश्क की आग में तपकर निखरी नायिका सोना न बन सकी मगर अन्दर ही अन्दर सुलगकर राख बन गई. जाने वेदना कौन ? और क्यों जाने ? अंतर्मन की चिंगारी आज भी सुलग रही है. जहाँ वो खुद को हर पल जी रही है वक्त के खेल में जीने की जिजीविषा लिए नफरत के घूँट भर भर कर पी रही है मगर फिर भी ना तृप्त हुई.

“जब आये मेरे हाँथ वो तेरे नाम के गुलाब
सूख कर भी सुर्ख हुए अपनी चाहतों के ख्वाब”

राह में चलते चलते संवेदनशील मन प्रहार करता है. और इस तरह करता है कि बरबस दिल की खूंटियों पर लापरवाही से टंगे अरमान बेखबर होकर मचलने लगते हैं.  “सुनी” के दिल में उसके इश्क की गहराई को झांककर देखो निकल पड़ते हैं वो शब्द जो दिल को छलनी करते हुए अश्कों के समुन्दर में मोती बनकर उसके आँचल पे बिखर जाते हैं. और पीछे छोड़ जाते हैं वो रचनाओं की माला जिसमें पढने वाले को अपना अक्स, अपनी पीड़ा, अपनी ज़िन्दगी नज़र आती है . अर्थों का ज्ञान रखने वाले के मन में एक सवाल उभरता है कि जब……..

“स्त्री प्रेम करती है तो पूरी शिद्दत से करती है
कोई टूटकर उसे चाहे ये मुमकिन न हुआ” !!

तेरे दिए सुर्ख फूलों के लिए….

न जाने क्यों कभी कभी लगता है मुझे
फिर से कोरा कागज़ हो गयी हूँ मैं
तुम ही बताओ क्या सच है ये ?
सुनो…. मुझे लगा तुम ही हो
जो आईने में रोज नजर आते हो
ताउम्र तुझे ढूँढा हर गाँव हर गली
वो न मिला और अब न ही तलाश है मुझे
अब तो हद हो गई यूँ अचानक बिन बताये
वो अक्स मेरे घर के दर्पण में उभर आया
निढाल बेसुध एकटक निहारत रही उसे
न जाने क्यों हर अक्स उस पर सिमट जाता है
जिसने एक राह बनाई और दम भर को मिला
तोड़कर बंधन सारे दुश्मनों से जा मिला
फिर भी ? फिर भी ? फिर भी ?????
अनायास ही मेरे मन ने पुकारा
सुनो क्यों नही बन जाते हो फिर से मेरे
क्यों न तुम मेरे मन के कोरे कागज़ पर
कुछ बूंदे ही बनकर उतर आओ
बन जाओ मेरे ख़्वाबों की ताबीर,
न न अब अदृश्य न होना
यूँ ही नजर आते रहो सुबह हो शाम हो
बस एक ही किताबी चेहरा पढ़ती रहूँ
और उस चेहरे में इबारत लिखी हो “तुम सिर्फ मेरे हो”
सुनो तो क्या होगा ऐसा ? या यूँ ही
बेखबर हूँ मैं इस इश्क के तिलिस्म से
अपने इर्द गिर्द बुनना चाहती हूँ मैं एक ऐसा जाल.
जिसमें मैं जिधर नजर उठाऊं तो तुम दिखो
सिर्फ तुम ही तुम नजर आओ असलियत में
ध्यान से सुनो छलावे में नहीं
पूछा नहीं तुमने ऐसा क्यों ?
जानते हो क्यों ? क्योंकि तुम
“ईद का चाँद” जो बन जाते हो
न न मैं खवाब को पकड़ना नहीं चाहती क्योंकि
मैं जानती हूँ रेतीली जमीन पर गुलाब उगाना
और वो गुलाब जो सूखकर सुर्ख हो गये हैं
सुनो आज अपने ईश्वर अपने प्रभु के
चरणों में अर्पित करुँगी तेरे दिए वो सुर्ख गुलाब
ताकि तुम्हे सदा खुश रहने का वरदान मिल सके
और सुरक्षित रह सकें तेरे दिए…
तेरी याद के वो सुर्ख गुलाब……

सुनीता दोहरे…..

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

December 6, 2013

और उस चेहरे में इबारत लिखी हो “तुम सिर्फ मेरे हो” सुनो तो क्या होगा ऐसा ? या यूँ ही बेखबर हूँ मैं इस इश्क के तिलिस्म से अपने इर्द गिर्द बुनना चाहती हूँ मैं एक ऐसा जाल. …….अच्छा है………………..

    sunita dohare sub editor के द्वारा
    December 6, 2013

    अनिल कुमार ‘अलीन’ , जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..

sadguruji के द्वारा
December 5, 2013

आदरणीया सुनीता दोहरे जी,एक अच्छी रचना के लिए बधाई.ये पंक्तियाँ मुझे पूरी रचना का सार लगीं-“स्त्री प्रेम करती है तो पूरी शिद्दत से करती है कोई टूटकर उसे चाहे ये मुमकिन न हुआ” !!बहुत सुंदर प्रस्तुति.

    sunita dohare sub editor के द्वारा
    December 6, 2013

    sadguruji ,जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..

ranjanagupta के द्वारा
December 4, 2013

सुन्दररचना!दिल की असली आवाज !और उसका दर्द बयान करने का अंदाज भी सुन्दर !!

    sunita dohare sub editor के द्वारा
    December 5, 2013

    ranjanagupta ,जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..

yamunapathak के द्वारा
December 4, 2013

यह बहुत भावपूर्ण रचना है सुनीता जी

    sunita dohare sub editor के द्वारा
    December 5, 2013

    yamunapathak ,जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..

abhishek shukla के द्वारा
December 3, 2013

बेहद खूबसूरत रचना

    sunita dohare sub editor के द्वारा
    December 5, 2013

    abhishek shukla ,जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
December 3, 2013

खूबसूरत रचना /

    sunita dohare sub editor के द्वारा
    December 5, 2013

    Rajesh Kumar Srivastav, जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..

Ravindra K Kapoor के द्वारा
November 30, 2013

प्रेम या इश्क किसी भी इंसान में वो जज्बात पैदा करते हैं जो एक लेखक या लेखिका aur uski rachna shakti के लिए प्रेरणा भी बन सकते हैं. सुभकामनाओं के साथ…Ravindra K Kapoor

    sunita dohare sub editor के द्वारा
    December 1, 2013

    Ravindra K Kapoor , जी आपका बहुत -बहुत धन्यवाद सादर नमन …..


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