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अपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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क्योंकि दंगे सिर्फ दर्द दे कर जाते हैं ...

Posted On: 1 May, 2013 Others में

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क्योंकि दंगे सिर्फ दर्द दे कर जाते हैं …
आज जहाँ देखो वहां देखने और सुनने को मिलता है कि गुजरात की सरकार को टी.वी. हो या गूगल या फेसबुक हर जगह गुजरात के दंगों को लेकर मोदी को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है. रोज नई बहस रोज नए खुलासे सुनने में आ ही जाते हैं. असल में भाजपा के एक कद्दावर और दबंग नेता होने के कारण सबका निशाना केवल नरेंद्र मोदी ही होते हैं. पर क्या आप सच में जानते हैं कि गुजरात दंगों का सच क्या था. और ये गुजरात दंगा हुआ क्यों. देखा जाये तो ये अपने आपमें सबसे बड़ा सवाल है कि 27 फरवरी २००२ को साबरमती ट्रेन के S6 बोगी को गोधरा रेलवे स्टेशन से करीब 826 मीटर की दुरी पर जला दिया गया था….जिसमे 57 मासूम, निहत्थे और निर्दोष हिन्दू कारसेवकों की मौत हो गयी थी… !
प्रथम द्रष्टा रहे वहाँ के 14 पुलिस के जवान जो उस समय स्टेशन पर मौजूद थे.. और उनमे से 3 पुलिस वाले घटना स्थल पर पहुंचे और साथ ही पहुंचे अग्नि शमन दल के एक जवान सुरेशगिरी गोसाई जी! अगर हम इन चारो लोगों की मानें तो “म्युनिसिपल काउंसिलर हाजी बिलाल” भीड़ को आदेश दे रहे थे…. ट्रेन के इंजन को जलाने का……!
साथ ही साथ…. जब ये जवान आगबुझाने की कोशिश कर रहे थे….. तब भीड़ के द्वारा ट्रेन पर पत्थरबाजी चालू कर दी गई ……!
अब इसके आगे बढ़ कर देखें तो…. जब गोधरा पुलिस स्टेशन की टीम पहुंची तब 2 लोग 10 ,000 की भीड़ को उकसा रहे थे…. ये थे म्युनिसिपल प्रेसिडेंट मोहम्मद कलोटा और म्युनिसिपल काउंसिलर हाजी बिलाल…..!अब सवाल उठता है कि….. मोहम्मद कलोटा और हाजी बिलाल को किसने उकसाया और ये ट्रेन को जलाने क्यों गए.. ? सवालो के बाढ़ यही नहीं रुकते हैं…..
इसके पहले भी एक हादसा हुआ 27 फ़रवरी 2002 को सुबह 7 .43 मिनट 4 घंटे की देरी से जैसे ही साबरमती ट्रेन चली और प्लेटफ़ॉर्म को छोड़ा तो प्लेटफार्म से 100 मीटर की दूरी पर 1000 लोगो की भीड़ ने ट्रेन पर पत्थर चलाने चालू कर दिए पर यहाँ रेलवे की पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर कर दिया और ट्रेन को रवाना कर दिया लकिन ट्रेन जैसे ही 800 मीटर मुश्किल से चली. बाक़ी की कहानी जिस पर बीती उसकी जुवानी सुनिए. १५-१६ साल की बच्ची जो कक्षा ११ में पढने वाली गायत्री पंचाल उस समय अपने परिवार के साथ अयोध्या से लौट रही थी जिसने देखा कि एकदम से चैन खींची गयी और एक भीड़ हथियारों से लैस होकर ट्रेन की तरफ बढ़ रही थी. तलवार डंडा नहीं बल्कि लाठी, गुप्ती, भाले, पैट्रोल बम्ब, एसिड बम्ब आदि लिए हुए थे. भीड़ को देखकर कर ट्रेन में सवार यात्रियों ने खिड़की दरवाजे बंद कर लिए पर भीड़ से जो अन्दर घुस आये थे काटो के नारे लगा रहे थे. लोगों को मार रहे थे और लोगों का सामान लूट रहे थे. पास की एक मस्जिद से बार-बार ये आदेश दिया जा रहा था “मारो दुश्मनों ने मारो, काटो”साथ ही बाहर कड़ी भीड़ ने पैट्रोल डालकर ट्रेन की बोगी में आग लगा दी जिससे कि कोई जिन्दा न बचा. और दरवाजों को बाहर से बंद कर दिया ताकि कोई बाहर न निकल सके. एस-6 और एस-7 के वैक्यूम पाइपों को तेज हथियारों से काट दिए गया था ताकि ट्रेन आगे न बढ़ सके. जो लोग जलती ट्रेन से किसी प्रकार बाहर निकल भी गये वो वहीँ मारे गये और कुछ बुरी तरह घायल हो गये.
अब सवाल उठता है कि हिन्दुओं ने सुबह 8 बजे ही दंगा क्यों नहीं शुरू कर किया बल्कि हिन्दू उस दिन दोपहर तक शांत बना रहा ये बात किसी को क्यों नही दिखी. असल मे. हिन्दुओं ने जवाब देना तब चालू किया जब उनके घरों , गावों , मोहल्लो में वो जली और कटी फटी लाशें पहुंची…! क्या ये लाशें हिन्दुओं को को मुसलमानों की तरफ से गिफ्ट थी जो हिन्दुओं को शांत बैठना चाहिए था …..सेकुलर बन कर
हिन्दू सड़क पर उतरे 27 फ़रवरी 2002 की दोपहर से! पुरे एक दिन हिन्दू शांति से घरो में बैठे रहे….
अगर ये दंगा हिन्दुओं ने या मोदी ने करना था तो 27 फ़रवरी 2002 की सुबह 8 बजे से ही क्यों नहीं चालू हुआ ?
जबकि मोदी ने 28 फ़रवरी 2002 की शाम को ही आर्मी को सडको पर लाने का आदेश दिया थाजो कि अगले ही दिन १ मार्च २००२ को हो गया और सडको पर आर्मी उतर आयी. १मार्च २००२ पर भीड़ भारी पद रही थी तो गुजरात को जलने से बचाने के लिए मोदी ने अपने करीबी राज्यों से सुरक्षा कर्मियों की मांग की थी ये पड़ोसी राज्य थे महाराष्ट्र (मुख्यमंत्री-विलासराव देशमुख-कांग्रेस शासित) मध्य-प्रदेश (मुख्यमंत्री-दिग्विजय सिंह-कांग्रेस शासित) राजस्थान (कांग्रेस शासित ) और पंजाब ( मुख्यमंत्री-अशोक गहलोत- कांग्रेस शासित)…
अब सवाल उठता है कि उस विपदा की घडी में इन माननीय मुख्यमंत्रियों ने अपने सुरक्षाकर्मी क्यों नहीं भेजे गुजरात में. जबकि गुजरात उस समय जल रहा था और गुजरात ने इन लोगों से सहायता मांगी थी. या फिर ये एक सोची समझी गूढ़ राजनितिक विद्वेष का परिचायक था प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों का गुजरात को सुरक्षाकर्मियों का ना भेजना. उसी १ मार्च २००२ को हमारे राष्ट्रीय मानवाधिकार (National Human Rights) वालों ने मोदी को अल्टीमेटम दिया कि ३ दिन में घटना की पूरी रिपोर्ट पेश की जाए. लेकिन बड़ी आश्चर्य की बात है कि राष्ट्रीय मानवाधिका वाले २७ फ़रवरी २००२ और २८ फ़रवरी २००२ को क्यों गायब रहे इन मानवाधिकार वालों ने तो पहले ही दिन के ट्रेन को फूंके जाने पर ये रिपोर्ट क्यों नही मांगी क्यों नही पूछा कि इतने बड़े हादसे को लेकर क्या कदम उठाये गए गुजरात सरकार द्वारा. एक ऐसे ही सबसे बड़े घटना क्रम में दिखाए गए या कहे तो बेचे गए “गुलबर्ग सोसाइटी” के जलने की इस बात ने पूरी मिडिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया.
उन दिनों प्रकाश में एक बात आई थी कि कारसेवक गोधरा स्टेशन पर चाय पीने उतरे थे और चाय बेचने वाले के पैसे मांगने पर कार सेवकों ने यूज़ पीटना शुरू कर दिया जिससे शोर-शराबा सुन कर उस बूढे की सोलह साल की एक लड़की वहां पर आ गयी और अपने बाप को बचाने की नाकाम कोशिश करने लगी. वह उन ज़ालिम कार-सेवकों से दया की भीख मांग रही थी और कह रही थी कि उसके बाप को छोड़ दीजिये, जिसको वे कार-सेवक अभी भी मार रहे.और सुना था कि चाय पीने वाला एक मुस्लिम था पर ये भी बात सोलह आने सच है कि गुजराती अपनी इमानदारी के लिये ही जाने जाते हैं. पिटाई ही एक कारण था जिस बजह से बोगी में आग लगा दी गयी और ५८ लोगों को मार दिया गया जिन्दा जलाकर और काटकर. अब अगर इस मनगढ़ंत कहानी को मान भी लें तो कई सवाल उठते हैं: कि उस बूढ़े चाय वाले ने रेलवे पुलिस को इत्तिला क्यों नही दी. और उस बूढ़े चाय वाले ने 27 फ़रवरी 2002 को कोई FIR क्यों नहीं दाखिल किया…? 5 मिनट में ही सैकड़ो लीटर पेट्रोल और इतनी बड़ी भीड़ आखिर जुटी कैसे….? सुबह 8 बजे सैकड़ो लीटर पेट्रोल आखिर आया कहाँ से. एक भी केस 27 फ़रवरी २००२ की तारीख में मुसलमानों के द्वारा क्यों नहीं दाखिल हुआ ?
और सबसे आश्चर्य की बात तो ये कि रेलवे पुलिस कि जांच में ये बात सामने आई कि उस दिन गोधरा स्टेशान पर ऐसी कोई घटना हुई ही नही थी. ना तो चाय वाले के साथ कोई झगडा हुआ था और ना ही किसी लड़की के साथ में कोई बदतमीजी या अपहरण की घटना हुई…..!
सबसे बड़ी कष्ट की बात कि इस दंगे में कितनी मासूम जाने गयी कितनो के घर उजाड़ गए.
ऐसा ही कुछ हाल गुलबर्ग की दूसरी इमारतों का भी हुआ था. इन घरों को दस साल पहले आग लगाई गई थी लेकिन जलने के निशान आज भी देखे जा सकते हैं. घरों के बाहर लंबी घास और झाड़ियाँ उगी हैं. सामने गंदा पानी भी है जहाँ मच्छर और मक्खियों ने अपना घर बनाया हुआ है. लेकिन इमारतों की मज़बूत दीवारों और घरों की बनावट से यह अब भी साफ़ पता चलता है की यहाँ कभी ख़ुशहाल लोग रहा करते थे. लेकिन गुलबर्ग और जामा मस्जिद और मुसलमान मोहल्लों के बाहर हिन्दू समुदाय में नरेन्द्र मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हैं. मोदी सभी समुदाय को साथ लेकर चल रहे हैं. कई मुसलमान उनके साथ हैं. कई हिन्दू उनसे नाराज़ हैं. नरेंद्र मोदी की राजनीति को लेकर राज्य में काफ़ी लोग बँटे हुए हैं. सियासत में यह आम बात है. लेकिन सच यह है की मोदी ने पिछले दस सालों में गुजरात में बहुत प्रगति लाई है. इसका फ़ायदा मुसलमानों को भी हुआ है. मुसलमान और हिन्दू समाज के लोगों से बात करने के बाद समझ आया की दोनों समुदायों में उतना मदभेद नहीं है जितना गुजरात से बाहर लोगों को समझ में आता है. गोधरा में क्या हुआ और उसके बाद क्या हुआ गुजरात में सत्य शायद कभी भी सामने नहीं आयेगा. क्योंकि दोनों पक्ष अपनी सुविधा से सत्य गढ़ने में माहिर हैं. याद होगा कितनी बार बयान बदले जाहिरा शेख ने. तंग आकर अदालत को उसे सजा देनी पड़ी. यह बात तो सच है कि गल्तियां सभी से हुई. और ये भी ये सत्य है कि व्यक्ति, समाज हो या देश के हर धर्म और हर तबके के लोग कभी भी किसी धर्म के अनुनायीयों को देख कर उस धर्म को विश्लेषित न करें बल्कि उस धर्म के असल स्रोतों के ज़रिये उसे समझो. अगर ऐसा सभी ने किया तो वह दिन दूर नहीं कि हम समझ जायेंगे कि हम सभी एक ही ईश्वर के बनाये हुए हैं. “राजनीति से ऊपर राष्ट्र नीति होती है. हर चीज़ को राजनीति से नहीं तौला जाना चाहिए. सबका साथ, सबका विकास और सबको जोड़कर चलने से जो विकास होता है, वो देश की सरकार को दिखाना चाहिए और इसे गुजरात प्रदेश की सरकार ने करके दिखाया है……
सुनीता दोहरे…..

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sunita dohare sub editor के द्वारा
October 15, 2013

अनिलकुमार जी ,आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सादर नमन …..

anilkumar के द्वारा
May 2, 2013

आदर्णीय सुनीता जी , वास्तव में प्रत्येक दंगा दुर्भाग्यपूर्ण होता है , परन्तु गुजरात और गोधरा के संदर्भ में  सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण तीस्ता शीतलवाद जैसे तथाकथित सैकुलरवादी और मानवअधिकारवादियों की भूमिका है । वे गुजरात मे एक राष्ट्रवादी दल और उसके प्रखर राष्ट्रवादी नेता की चुनावी सफलता को स्वीकार  नहीं कर सके । उन्हो ने गोधरा उपरान्त गुजरात दंगों को , उस दल और उस नेता को पूर्णरूप से बदनाम करने के एक अवसर के रूप में प्रयोग किया । क्या इससे पहले गुजरात में दंगे नही हुए ,या  देश के किसी अन्य भाग में दंगे नही हुए । परन्तु जिस प्रकार यहां पर बिना किसी जांच सबूत के महज कुछ लोगों के आरोपों के आधार पर एक व्यक्ती को प्रारम्भ से ही इन समस्त दंगों का जिम्मेदार ठहरा दिया गया , ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ  था । यह तथाकथित सेकुलरवादी गत दस वर्षों इस व्यक्ती को बदनाम के एक सूत्रीय अभियान में लगे हुए हैं । परन्तु आज तक सफल नहीं हो पाए हैं । यह अपनी हठधर्मिता से दंगे के जख्मों को कुरेद कर बराबर हरा रखना चाहते हैं , जिससे गुजरात के विकास और उस नेता के सबको जोड कर चलने के प्रयासों को झुठलाया जा सके । परन्तु वे इसमें कभी सफल न हो पाए गें , क्यो कि वे न तो प्रजातंत्र का सम्मान करते है , और न ही न्यायालय  का ।    


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